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स्काउटिंग में क्या क्या सीखें

स्काउटिंग में क्या क्या सीखें

स्काउटिंग में क्या क्या सीखें - hFoch3bzc9zScKQ7e9myv rWKiE7nqLGVk1sep1f3hMAbkH3UcEnpw336UxBC9YVyJR9HdjJefZGlORmW GEtSFxFiWJCkcQjhjhJ7OYxw7WZU2eg51OV EE8Gnhll4t7Z9fZxT JJ5HWtnU6Gq6RUHTE6XjsN6i98fJH8xe4jqG8S3lPjlaMN8 m3BZSlPm7bb2YyfCeUOS14Cw401YZiKdD1a3rH2Lx WOuxEAd5D3OByZc6tn kOuen hLH3eZBaXo8cIPpRbIhF7NZD2Rn HCaDk03vxbWwbHMukb7pGlNX C0KeWjSELY2Q2Tt3IylvZfvO97ODLCrhZ3b3GqqBGYwJBA9zotHMN1ieAgVIjYFR1Bs1yL4tQUs Fj5Ls3ZKl5pzRBPYzgwPyNytCMGZbiyyuEYlWbdEmHqHXakVrw Blhoz 3qdPs5L 49YEwfOA4iQIquxINVTK0ClDGeZgYsRq8aUtIo93 FI3ABFAW1kcUqrcj CikaFRKBoOWs7fjUkJvAEWChDNget7kP2sr zC1Px9e4jl7vGrQcwlET3Zaey ar QOKgOYsVf7sSuCitOOVTLHdQwoFIi 8au pyWzytWe4IJzzP ETylEnZbVsufJpLz8JobIvB4tnQfoD gDMgaytM0it9KcVfSSuiYURemyrbokP4ZhpuVIz7EftZjGvKyCiU0fG8Gz70M6M4yFyLB4xG3etBgMZROUEd0DgTKRDGtx54CUxa xnzge8gmscc8ZkAGr8X zus5ymsIp87ZMQNIRr0Gt63F0QmwUhqa2d1qS ZPqtRkgDd5TPeKhH7PK5 nr4T9MmcaC Fy1JaOif8rrNX50a97U5v9tJm8jJqwsXdFmk7hIl9zk qngUFNtF bPzQi58YV8jDlS7GwgysLz8565l 2Lr GtcZmkDJZ2VqQS4=w960 h480 no?authuser=0 - हिन्दी माध्यम में नोट्स संग्रह

स्वास्थ्य के सामान्य नियम

चरक ने कहा है-

‘शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्’

अर्थात् धर्म के मार्ग पर चलने का सबसे पहला साधन शरीर है। अंग्रेजी में भी कहा गया है

‘A Healthy mind lives in a healthy body’

अर्थात् स्वस्थ तन होगा तो स्वस्थ मन रहेगा। स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए निम्नलिखित बातों की जानकारी होना, उन पर अमल करना और सतत् अभ्यास करना आवश्यक है:-

स्वच्छता (Cleanliness) –

अंग्रेजी में एक कहावत है

‘Cleanliness is next to godliness’

अर्थात् स्वच्छता एक ईश्वरीय कार्य है। अपनी स्वच्छता रखना प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य है किन्तु, दूसरों की स्वच्छता का ध्यान रखना एक अच्छी नागरिकता है। स्वस्थ व्यक्ति अपने लिये, अपने परिवार, पड़ोस, समाज तथा राष्ट्र के लिए सुख का आधार है। अच्छा स्वास्थ्य लेकर जन्म लेना एक बात है किन्तु, यदि उसे सुरक्षित रखने के नियम न आते हों और उनका पालन न किया जाये तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। स्वच्छता देवताओं को प्रिय है। हमारे धर्म-कर्म में भी स्वच्छता के अंतर्गत शारीरिक, मानसिक तथा आसपास की स्वच्छता सम्मिलित है।

शारीरिक स्वच्छता-

शरीर को स्वच्छ रखने के लिये प्रतिदिन स्नान करना अत्यावश्यक है। यदि प्रतिदिन स्नान करना सम्भव न हो तो स्वच्छ तौलिये को भिगोकर शरीर को रगड़ लेना चाहिए ताकि रोम छिद्र खुल जायें। रोम छिद्रों से पसीने के द्वारा शरीर का विकार बाहर निकलता है जिन्हें, स्वच्छ रखना अति आवश्यक है। शरीर के प्रत्येक अंग की स्वच्छता का ध्यान रखा जाना चाहिए। आँख, कान, नाक, जिव्हा, दाँत, गला आदि की भी स्वच्छता अत्यावश्यक है। बालों में प्रतिदिन कथा करना, नाखून कटे व साफ रखना, दांतों की सफाई सोने से पूर्व तथा प्रातः नाश्ता करने के बाद कर ली जानी चाहिए। रात्रि में सोने से पूर्व यदि गुनगुने पानी में थोड़ा नमक मिलाकर गरारे कर लें तो गला साफ रहता है। शरीर की भीतरी स्वच्छता के लिए पर्याप्त पानी पीना तथा आदतों को नियंत्रित और नियमित रखना आवश्यक है।

मानसिक स्वच्छता –

शरीर की स्वच्छता का प्रभाव मन पर तथा मन की स्वच्छता का शरीर पर पड़ता है। अतः स्वस्थ रहने के लिये मानसिक भोजन भी उतना ही आवश्यक है, जितना शारीरिक भोजन। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन, अच्छे मित्रों व दृश्यों का दर्शन तथा खाली समय में मन में अच्छे विचार लाना तथा सत्संग करना मानसिक स्वास्थ्य के लिये परमावश्यक है। माता-पिता और बड़ों द्वारा बच्चों को ऐसी पुस्तकें पढ़ने को दी जानी चाहिए जिससे उनका ज्ञानवर्धन हो। वीरता, करुणा, प्रेम, सहयोग, बड़ों का सम्मान और संवेगों का विकास हो सके। महान् विभूतियों की जीवनी, उत्तम कहानियाँ, ज्ञानवर्धक पत्रिकाएँ उन्हें पढ़ने को दी जानी चाहिए। अश्लील, कामोत्तेजक पुस्तकों को नहीं पढ़ना चाहिए।

आस-पास की स्वच्छता –

आसपास की स्वच्छता भी अति आवश्यक है। घर के आस-पास धूल, जाले, गन्दगी, मक्खी, मच्छर आदि न हों। रोशनी और प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था हो। कूड़ा-करकट को किसी गढ्ढे में भर कर कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है। यदि कहीं पर गन्दे पानी के पोखर-तालाब हों तो उन्हें मिट्टी से पाट देना चाहिए ताकि मच्छर न पल सकें। मच्छरों को मारने के लिए पोखर-तालाबों में मिट्टी के तेल तथा आसपास डी. डी. टी. छिड़क देनी चाहिए। वस्त्रों की स्वच्छता- वस्त्र व्यक्तित्व को निखारते हैं। अतः वे स्वच्छ, सही सिले, बटन लगे तथा प्रेस किये हों। मौसम के अनुसार हों। अत्यंत भड़कीले, फटे, गन्दे कपड़े न पहने जायें। वस्त्रों से भी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को आंका जा सकता है। शरीर को स्पर्श करने वाले भीतरी वस्त्रों-कच्छा, बनियान, मौजे आदि को प्रतिदिन धोना चाहिए।

बी. पी. सिक्स व्यायाम-

आधुनिक युग भौतिक युग है जहां मनुष्य माँस- पेशियों का काम मशीन से ले रहा है। थोड़ी दूर चलना हो तो वाहन का प्रयोग करना, बिजली के उपकरणों से अधिक से अधिक काम लेना-यहां तक कि कपड़े धोने में जो परिश्रम करना पड़ता था वह भी अब ‘वाशिंग मशीन’ कर रही है। परिणामस्वरूप व्यक्ति को जीने के लिये डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। शहरी क्षेत्रों में यह स्थिति अधिक भयावह है। गाँवों में लोग कृषि तथा पशु पालन के कार्यों में व्यस्त रहते हैं जिससे वे शहरी की अपेक्षा अधिक हृष्ट-पुष्ट तथा स्वस्थ रहते हैं।

शहर के व्यक्तियों के लिए स्वस्थ रहने हेतु एक ही उपाय है- प्रति दिन नियमित रूप से व्यायाम आसन करना।

व्यायाम से शरीर स्वस्थ व सुडौल होता है, चेहरे पर आभा, मन प्रसन्न, भोजन का ठीक प्रकार पच जाना तथा दूसरों की सहायता व रक्षा करने की क्षमता का विकास होता है। प्रातः टहलना, कोई खेल खेलना, तैरना, घुड़सवारी करना, बाक्सिंग, कुश्ती आदि भी व्यायाम के ही अंग हैं, इन्हें नियमित रूप से करने से रक्त-परिसंचरण सुचारु रहता है। जोड़ों में विकार नहीं होता, माँस-पेशियां सबल रहती हैं और, किसी भी कार्य को करने के लिये व्यक्ति में जीवटता आ जाती है। एक अंग्रेज विद्वान ड्राइडन (Dryden) ने कहा है कि-

“lts is better to turst fresh air and exercise than to pay doctors bill to keep yourself healthy.”ड्राइडन (Dryden)

स्वास्थ्य के बारे में लाई बेडेन पावेल ने कहा है कि, प्रत्येक स्काउट/गाइड को निम्नलिखित छः कार्य करने चाहिए:-

1. हृदय को मजबूत बनाओ ताकि, वह मजबूती से शरीर के सभी अवयवों में रक्त प्रवाहित कर सके।

2. फेफड़े मजबूत करो ताकि, गहरी साँस लेकर शुद्ध आक्सीजन से शुद्ध रक्त बनता रहे।

3. पसीना बहाओ ताकि शरीर की गंदगी बाहर आ सके।

4. पेट को क्रियाशील बनाओ ताकि पाचन शक्ति बनी रहे। मल विसर्जन अवयवों को सक्रिय व शुद्ध रखो।

5. शरीर की सभी माँस-पेशियों को क्रियाशील बनाओ ताकि रक्त का संचार ठीक बना रहे।

बी. पी. ने स्वस्थ और सुखी जीवन यापन के बारे में कहा है-

“स्वस्थ और प्रसन्नचित रहने के लिये रक्त शुद्ध और सक्रिय रखो जो सादे संतुलित भोजन, पर्याप्त व्यायाम, स्वच्छ हवा, शरीर की आन्तरिक और बाह्य स्वच्छता तथा समुचित विश्राम से ही सम्भव है।”

बी. पी. के द्वारा निर्धारित छः व्यायाम इस लक्ष्यपूर्ति हेतु सहायक है। इन्हें प्रति दिन 10 मिनट तक किया जाय तो अवश्य लाभ होता है। इन्हें करते समय शरीर और सांस का सामंजस्य आवश्यक है। जब शरीर नीचे झुके तो साँस छोड़ी जाय और ऊपर को उठे तो साँस ली जाय, साँस नाक से लेकर मुंह से छोड़ी जा सकती है। व्यायाम को बायीं और दाहिनी तरफ से करना चाहिए। व्यायाम को कम से कम 6 बार तथा अधिकतम 12 बार करना चाहिए। स्काउट/गाइड जब इन्हें एक साथ करें तो अपनी क्षमता व समय के अनुसार करें।

स्वयं की देखभाल कैसे करें


(a) घर के प्रति तुम्हारा क्या दायित्व है। इसे ठीक सेबताने में सक्षम हों।

(b) अपना बिस्तर ठीक कर सकें।

(c) व्यक्तिगत स्वच्छता के स्वास्थ्य नियम जानते हों।

स्वच्छता-


व्यक्तिगत स्वच्छता का जीवन में अत्यंत महत्व है।आप जानते हैं कि हमारे शरीर में अधिकतर बीमारियां स्वच्छता के अभाव, अशुद्ध जल व मानसिक कारणों से होती हैं। मूल बीमारियां बहुत ही कम होती है। हमें व्यक्तिगत स्वच्छता जैसे नाखून काटना, शरीर को साफ रखना, अच्छी तरह हाथ धोने के बाद खाना खाना,शौच के बाद साबुन से हाथ धोना, नाक, कान में उंगली आदि न देना आदि बातों का ध्यान रखना चाहिए।पानी को उबालकर या फिल्टर करके अथवा आर.ओ.एक्वागार्ड आदि से शुद्ध करके पीना चाहिए।

स्वास्थ्य के लिए ध्यान देने योग्य बातें:-


1. रात्रि में जल्दी सोयें और प्रातः काल जल्दी उठें।
2. प्रतिदिन प्रातः बी.पी. के छ: व्यायाम करें।
3. खाना खाने से पहले व शौच के बाद हाथों कोसाबुन से धोयें।
4. पेय जल का 72 घण्टे से अधिक संग्रह न करें।
5. नशीले पदार्थों जैसे शराब, बीड़ी, सिगरेट, पान, सुपारी,गुटका, तम्बाकु, ड्रग आदि का सेवन न करें।
6. नाखून व शरीर को साफ सुथरा रखें।
7. अपनी सामर्थ्य के अनुसार परिश्रम अवश्य करें। प्रतिदिनइतना परिश्रम या व्यायाम करें कि पसीना आ जाये।
8. अधिक टी.वी. न देखें। यदि देखें तो पर्याप्त दूरी सेरोशनी में देखें।
9. बाजार के फास्ट/जंक फूड (कबाड़ भोजन) का प्रयोगन करें।
10. कुछ समय प्रकृति के बीच अवश्य रहें।
11. घर के आस-पास व कूलर आदि में पानी जमा नहोने दें। कूलर का पानी बदलते रहें।
12. पानी खूब पीयें। सलाद व हरी सब्जी अधिक खायें।
13. दातुन, मंजन व ब्रश द्वारा नियमित दांत साफ करें।
14. अधिक मीठा न खायें। खाने के बाद कुल्ला अवश्य करें।
15. सोने से पूर्व, स्नान से पूर्व व भोजन करने के तुरंतबाद पेशाब अवश्य करें।
16. खड़े होकर पानी न पीयें अर्थात पानी बैठ कर पीयें और घूट-घूट करके पीयें।

समाज सेवा शिविर में प्रतिभाग

भारतीय स्काउटिंग के प्रणेता पं.श्रीराम बाजपेयी जी ने सेवा-समिति स्काउट दलों का गठन कर बालकों में सेवा-भाव को पुष्ट करने का कार्य किया। उस समय स्काउट मेलों, बाढ़, दुर्भिक्ष, महामारी आदि कार्यों में निःस्वार्थ सेवा करते थे। इन कार्यों के सम्पादन के लिये सेवा-शिविरों का आयोजन समय-समय पर कर स्काउट/गाइड को सेवा का अभ्यास करते रहना आवश्यक है। सेवा ईश्वर की पूजा है तथा “कर्ता” को इससे आत्मिक मिलता है।

सेवा के निम्नांकित कार्य अपनाये जा सकते हैं –

  • किसी मेले में खोये-पाये बच्चों की व्यवस्था, जल पिलाने का कार्य, साइकिल व्यवस्था, दर्शनार्थियों को पंक्तिबद्ध करना, चोर उचक्कों की निगरानी करना।
  • प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र स्थापित करना।
  • बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, सार्वजनिक स्थलों में प्याऊ की व्यवस्था करना।
  • वृक्षारोपण कार्य।
  • प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम अपनाना।
  • किसी गाँव की स्वच्छता अपनाना।
  • पर्यावरण जागृति अभियान चलाना ।
  • सड़क, भवन, पार्क आदि का निर्माण करना।
  • रामलीला जलूस आदि में स्वयं सेवक का कार्य।
  • बाढ़ भूचाल, दूभिक्ष आदि प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों की सेवा करना।

मेले में प्रतिभागिता

  • मेले का आयोजन और व्यवस्था मेला प्रबंध समिति और प्रशासन के संयुक्त प्रयास से किया जाता है। इस मेले में कई सामाजिक संस्थायें और स्वयंसेवी संगठन भी सेवा कार्य में अपना योगदान देते है।
  • स्काउटस एवं गाइडस को हमेशा अपनी सेवायें देने के लिये तत्पर रहना चाहिये।
  • मेले में दी गयी सेवाओं को अपनी लॉगबुक में फोटाग्राफ के साथ लिखना चाहिये।

कूड़ा निस्तारण प्रोजेक्ट स्वच्छता अभियान (अपने विद्यालय, स्काउट मुख्यालय में)

स्काउट/गाइड आवश्यकतानुसार नगर, ग्राम, बाजार, मेले आदि सार्वजनिक स्थलों पर एक अभियान के रूप में स्वच्छता का कार्य करते हैं। किसी सार्वजनिक स्थल को चुनकर वे साप्ताहिक या मासिक उसकी सफाई व्यवस्था करते हैं।

सार्वजनिक स्थल की स्वच्छता के निम्नलिखित कार्य किए जा सकते हैं-
1. किसी पार्क को अपना लेना।
2. किसी बस्ती में वहाँ के निवासियों के साथ कार्य करना।
3. किसी गाँव को अपनाकर ग्रामवासियों के साथ कार्य करना।
4. किसी तालाब जिसमें मच्छर पल रहे हों उसे सुखा देना।
5. पोखर-गड्ढों को पाटना।
6. मच्छर पलने के स्थान पर मिट्टी का तेल (केरोसिन) छिड़कना।
7. किसी बस्ती के हर घर को शिक्षित करना कि व कूड़ा करकट किसी टिन में ढककर रखें.
8. यदि किसी सार्वजनिक स्थल पर अधिक कूड़ाकचरा जमा हो गया हो तो उसकी सफाई के लिये नगर स्वास्थ्य अधिकारी से सम्पर्क करना।
9. गाँवों में गोबर व कूड़े को गड्ढों में डालकर कम्पोस्ट खाद बनवाना।

प्रस्तावित विद्यालय अनेक छोटे-छोटे गाँवों के मध्य में स्थिति हैं, अपने कूड़ा निस्तारण प्रोजेक्ट और विद्यालय स्वच्छता अभियान के लिये
स्काउट गाइड टोली द्वारा निकट का गाँव जिसमें 40 घर की छात्रायें पढ़ने इस विद्यालय में आती हैं जिनमें 2 छात्रायें टोली में सम्मिलित हैं।
टोली सभा में निर्णय लिया गया कि सर्वप्रथम विद्यालय की स्वच्छता का अभियान चलाया जाये।

प्रधानाचार्य महोदय से अनुमति लेकर निम्नलिखित कार्यों को सम्पन्न किया गया:-

(1) मैदान में बरसात के बाद ऊगी घास और झाड़ियां साफ की गई।
(2) पानी के नल के पास कीचड़ समाप्त करने के लिये इंट बिछाकर रेत व मिट्टी डालकर उसे सुखा दिया गया तथा चूना डाला गया।
(3) विद्यालय भवन के आस-पास व पीछे की सफाई की गई।
(4) कक्षा कक्षों से निकला कूड़ा जला दिया गया।

टोली ने गाँव से कूड़ा निस्तारण का दूसरा प्रोजेक्ट हाथ में लिया. जिसमें निम्नलिखित कार्य किये गये:-

(1) गाँव वासियों की सहायता से सड़कों पर फेंके कूड़े को हटाया गया।
(2) गंन्दगी फैलाने वाले गड्ढ़ों को पाट दिया गया।
(3)पोखर-तालाबों में मच्छर पलने को रोकने के लिये मिट्टी का तेल डाला गया ।
(4) गाँव वालों को बताया गया कि गोबर को गड्ढों में डालकर किस प्रकार कम्पोस्ट खाद बन जाती है।
(5) ग्रामीणों को स्वच्छता का महत्व व गन्दगी से होने वाली बीमारियों से बचाव का तरीका बताया गया।
(6) कूड़े के ढेर को हटाने के लिये ग्राम प्रधान से सम्पर्क किया गया।

स्काउट में साइकिल चलाना अनिवार्य

प्रत्येक स्काउट/गाइड को साइकिल चलाना आना चाहिए, स्काउट/गाइड मितव्ययी होते हैं। अतः वे अन्य वाहनों पर अपव्यय नहीं करते वरन् आत्मनिर्भर रहते हैं। चाहे विद्यालय जाना हो या स्काउट/गाइड प्रशिक्षण या सेवा कार्य हेतु जाना हो अपनी साइकिल पर भरोसा करते हैं। अपनी साइकिल को हर समय ठीक तैयार रखते हैं। हवा भरना, पंचर जोड़ना, ब्रेक ठीक करना आदि कार्य सीख कर स्वयं करते हैं।

साइकिल चालक को सड़क पर चलने के नियमों का पूर्ण ज्ञान होना भी आवश्यक है। सड़क पर बायें चलें। दो साइकिल सवार साथ-साथ (Abreast) कदापि न चलें। आगे निकलने के लिये दाँये से काटें। सड़क क्रॉस करते समय आगे-पीछे और दाँयें-बाँएं देखकर क्रॉस करें। मोड़ों पर हाथ का संकेत दें।

अधिक जानकारी के लिये वाहन चालकों के लिये सड़क पर चलने के नियम का अवलोकन करें।

विद्यालय विकास परियोजना के अंतर्गत सेवा कार्य

अपने प्रधानाचार्य से स्वीकृति लेकर प्रत्येक टोली को अपने विद्यालय विकास की कोई परियोजना चुन लेनी चाहिए जिनमें निम्नलिखित कार्य सम्मिलित किये जा सकते हैं-

स्वच्छता अभियान

कक्षों की स्वच्छता, फर्नीचर की स्वच्छता, पानी की टंकी, शौचालय, मूत्रालय की स्वच्छता, विद्यालय की पुताई, रंग साजी आदि कार्य अपनाये जा सकते हैं।

सौन्दर्यांकरण –

पुष्प वाटिका, घास का लॉन, झाड़ी की बाड़ लगाना, मार्गों की सुव्यवस्था आदि कार्य किये जा सकते हैं।

वृक्षारोपण –

विद्यालय की वह भूमि जहाँ वृक्ष लगाये जा सकते हैं- जैसे मैदान के चारों ओर तथा भवन के आगे-पीछे। इस कार्य में गड्ढे बनाना, खाद देना, पौर लगाना, निढाई-गुड़ाई तथा सिंचाई करते रहना सम्मिलित किये जा सकते है।

सद्वाक्य लिखना –

कक्षा-कक्षों, बरामदों, भवन के उपयुक्त स्थानों पर सद्विचार लिखने का कार्य अपनाया जा सकता है। उक्त कार्यों के अतिरिक्त भी स्थान, समय और आवश्यकतानुसार कार्य अपनाये जा सकते हैं।

troop meeting

बटन लगाना व टाँकना:-

स्काउट/गाइड को अपने कपड़ों में ठीक प्रकार बटन लगाना आता हो। बटन टूट गया हो तो उसे शीघ्र टांक लेना चाहिए। कुछ बच्चे बटन टांकने के लिए भी परमुखापेक्षी होते हैं। स्वावलम्बी होने के लिए छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। अच्छा हो घर के अन्य लोगों के बटन टांकने का दायित्व लें।

जूतों में पॉलिश लगाना:-

स्काउट गाइड अपने जूतों को स्वयं साफ कर पॉलिश करते हैं। पॉलिश लगाने से पूर्व किसी कपड़े से उसे साफ कर लें। पॉलिस लगाकर कुछ देर तक जूते धूप में रख दें। जिससे उसमें चमक आ जायेगी। चमकने के लिए बुश से रगड़ाई करें। यदि जूते कैनवास के हों तो उन्हें पहले साबुन से धोकर सुखा दें। तत्पश्चात् सफेद पॉलिस (पाउडर) लगायें। पुनः उसे सुखने दें तभी पहनें। अच्छा हो छुट्टी के दिन घर में सभी जूतों पर पॉलिस करें।

अपनी देख रेख कैसे करें

अपनी देख घर पर कर्तव्यः-

प्रत्येक छात्र/स्काउट/गाइड का प्रथम कर्तव्य है कि, वह अपनी जीवनचर्या को संयमित रखे। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त (सूयोदय से पूर्व) में उठे। शौचादि से निवृत्त होकर दातून करे । तत्पश्चात् स्नान-ध्यान करे। स्वल्प जलपान कर स्वअध्ययन करे। समय पर भोजन ले। अपने कक्ष, बिस्तर तथा पुस्तकें व्यवस्थित रखे। अपने माता-पिता व बड़ों का सम्मान व अतिथि सम्मान करे। बड़े खड़े हों तो स्वयं बैठा न रहे, न जेब में हाथ डालकर बड़ों के सामने खड़े होवे। अपनी पढ़ाई के समय के अतिरिक्त घर के कार्यों में हाथ बटाए। पढ़ाई तथा दिनचर्या के लिए समय सारिणी बनाकर उसी के अनुसार पढ़ाई करे।

आजकल बच्चे अधिकतर मोबाइल तथा टी. बी पर व्यर्थ में समय गंवाते हैं। किंतु इस कार्य के लिए भी समय निश्चित हो। सांयकाल खुले मैदान में कोई न कोई खेल खेलकर स्वास्थ्य लाभ करे। ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे कृषि-कार्य में परिश्रम कर सकते हैं। घर तथा आस-पास की स्वच्छता एवं सौंदर्गीकरण में अपना सक्रिय योगदान दे जैसे फूलों में पानी देना, किचन गार्डन में साग भाजी उगाना आदि।

उपरोक्त जीवन यापन करने वाले बच्चे स्वस्थ्य, कुशाग्र और सबके आँख के तारे बन जाते हैं। विशेषकर गाइड को भोजन, चाय, कॉफी बनाना, परोसना, पानी का भण्डारण, सब्जी की सुरक्षा व उसे काटना, कपड़े धोना, उन पर प्रेस करना, घर का बजट बनाना आदि कायों में माता-पिता की सहायता करनी चाहिए क्योंकि यह सब कार्य उनके भावी जीवन के लिये आदत बन जाते हैं।

सरंक्षक के तीन (R-Reduce, Reuse, Recycle)

इसे हम दूसरे शब्दों में Waste Management अथात् अपव्यय का प्रबंधन भी कह सकते हैं। अपव्यय का प्रभाव पर्यावरण पर भी पड़ता है। जितनी चीजों की बर्बादी पदार्थ सड़गल कर पर्यावरण को प्रदूषित करेगा। जितना हम वस्तुओं का दुरुपयोग करेंगे, कारखानों एवं मिलों को उत्पादन बढ़ाना पड़ेगा। जिसका परिणाम होगा प्रदूषण में वृद्धि। इस हेतु हमें अपनी जीवन शैली में भी कुछ परिवर्तन लाने होंगे। उदाहरण के लिये जिन लोगों के पास एक कार है, उससे परिवार का काम होगी उतना ही चाहिए। इसका प्रभाव उत्पादन पर पड़ता है। जितनी अधिक कारें होंगी-प्रदूषण उतना चलाया जा सकता है। फिर भी परिवार के प्रत्येक सदस्य को अलग-अलग कार ही बढ़ेगा। यह नियम घर की प्रत्येक वस्तु पर लागू होता है। तात्पर्य यह है कि हमें अधिक उपयोग की प्रवृत्ति पर लगाम कसनी होगी और सात्विक जीवनयापन की ओर जाना होगा।

घर में ऐसी अधिक वस्तुएँ होती हैं जिन्हें हम काम में नहीं लाते। उन्हें फेंक दिया जाता है। उनका स्वरूप बदलकर पुनः काम में लाया जा सकता है। उदाहरण के लिये आपका गर्म-कोट बाहर से खराब दिखता है। यदि उसे आल्टर कर दिया जाय तो वह पुनः नया बन जाता है। कमीज का कॉलर अन्दर से फट गया है, पर बाकी सही है तो कॉलर आल्टर किया जा सकता है। घर में बड़े-भाई का कोई कपड़ा छोटा पड़ गया है, तो उसे छोटा भाई पहन सकता है। पर समाज में ऐसी प्रवृत्ति बन गई है कि वह प्रयोग किया हुआ वस्त्र क्यों पहने?

घर का फर्नीचर पुराना हो गया तो उसे एक कोने में या छत पर फेंक कर नया खरीदा जाता है। उसकी मरम्मत की जा सकती है, अथवा किसी गरीब परिवार को दिया जा सकता है। पुराने जार या पॉट किचन में सामग्री रखने के काम आ सकते हैं। महिलायें नवजात शिशु के कपड़े घर के बड़े कपड़ों से बनाकर बचत कर सकती हैं। जिन वस्त्रों, कम्बल, गद्दे आदि आप प्रयोग में नहीं ले रहे हैं उन्हें गरीब बच्चों या घरों को दिया जा सकता है। यदि आपके पास अच्छी पुस्तकें पड़ी हों, तो उन्हें गरीब बच्चों अथवा किसी पुस्तकालय को भेंट कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें बेकार वस्तुओं को यों ही नहीं फेंक देना चाहिए, वरन् उनका प्रयोग इस प्रकार करें कि वह दूसरों के काम आ जाय। इससे अधिक उत्पादन को कम किया जा सकेगा।

जो वस्तुएँ पर्यावरण के अनुकूल प्रभावकारी हों, प्रदूषण न बढ़े, ऐसी वस्तुओं को पुनउत्पादित किया जा सकता है। उदाहरण के लिये अखबार, रद्दी कागज, पुरानी पुस्तक आदि को रिसाईकिल किया जा सकता है । कागज़ मिल उन्हें खरीद लेती है। इसी प्रकार धातुओं को पुनः गला कर उससे नये स्वरूप में वस्तुएं ढाली जा सकती है। घर की सब्जी, बचा खाना, घास-पात आदि को गड्ढा खोद कर कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है। किचन का गन्दा पानी किचन गार्डन में काम में लिया जा सकता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कम बर्बादी होगी तो कम रिसाइकिल या रीयूज होगा।

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