विष्णु खरे : चार्ली चैपलिन यानि हम सब कक्षा 12 हिंदी गद्य खंड

विष्णु खरे : चार्ली चैपलिन यानि हम सब कक्षा 12 हिंदी गद्य खंड

जीवन परिचय

समकालीन हिंदी कविता और आलोचना में विष्णु खरे एक विशिष्ट हस्ताक्षर हैं। इनका जन्म 1940 ई० में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में हुआ था। इनकी प्रतिभा को देखते हुए इन्हें ‘रघुवीर सहाय सम्मान’ से अलंकृत किया गया। इन्हें हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा सम्मानित किया गया। इनको शिखर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, फिनलैंड का राष्ट्रीय सम्मान नाइट ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ दि व्हाइट रोज से नवाजा गया। अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर ये आज भी हिंदी भाषा को समृद्ध कर रहे हैं।

रचनाएँ

इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. कविता-संग्रह-एक-गैर रूमानी समय में, खुद अपनी आँख से, सबकी आवाज के पर्दे में, पिछला बाकी।
  2. आलोचना-आलोचना की पहली किताब।
  3. सिने आलोचना-सिनेमा पढ़ने के तरीके।
  4. अनुवाद-मरु प्रदेश और अन्य कविताएँ (टी०एस० इलियट), यह चाकू समय (ऑर्तिला योझेफ), कालेवाल (फिनलैंड का राष्ट्रकाव्य)।

साहित्यिक विशेषताएँ

विष्णु खरे जी ने हिंदी जगत को विचारपरक कविताएँ दी हैं, साथ ही बेवाक आलोचनात्मक लेख भी दिए हैं। इनके रचनात्मक और आलोचनात्मक लेखन पर विश्व-साहित्य के गहन अध्ययन का प्रभाव दिखाई देता है। ये विश्व सिनेमा के अच्छे जानकार हैं। 1971-73 के अपने विदेश-प्रवास के दौरान इन्होंने चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग के प्रतिष्ठित फिल्म क्लब की सदस्यता प्राप्त करके संसार-भर की सैकड़ों उत्कृष्ट फिल्में देखीं। यहाँ से सिनेमा-लेखन को वैचारिक गरिमा और गंभीरता देने का सफ़र शुरू हुआ।

इनका सिनेमा-विषयक लेखन दिनमान, नवभारत टाइम्स, दि पायोनियर, दि हिंदुस्तान, हंस, कथादेश आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहा है। ये उन विशेषज्ञों में से हैं जिन्होंने फ़िल्म को समाज, समय और विचारधारा के आलोक में देखा तथा इतिहास, संगीत, अभिनय, निर्देशन की बारीकियों के सिलसिले में उसका विश्लेषण किया। इनके लेखन से हिंदी जगत के सिनेमा-विषयक लेखन की कमी दूर होती है।

विष्णु खरे : चार्ली चैपलिन यानि हम सब

पाठ का प्रतिपादय एवं सारांश

प्रतिपादय

हास्य फिल्मों के महान अभिनेता व निर्देशक चार्ली चैप्लिन पर लिखे इस पाठ में उनकी कुछ विशेषताओं को लेखक ने बताया है। चार्ली की सबसे बड़ी विशेषता करुणा और हास्य के तत्वों का सामंजस्य है। भारत जैसे देश में सिद्धांत व रचना-दोनों स्तरों पर हास्य और करुणा के मेल की कोई परंपरा नहीं है, इसके बावजूद चार्ली चैप्लिन की लोकप्रियता यह बताती है कि कला स्वतंत्र होती है, बँधती नहीं। दुनिया में एक-से-एक हास्य कलाकार हुए, पर वे चैप्लिन की तरह हर देश, हर उम्र और हर स्तर के दर्शकों की पसंद नहीं बन पाए। इसका कारण शायद यह है कि चार्ली ही वह शख्सियत हो सकता है जिसमें सबको अपनी छवि दिखती है, वे किसी भी संस्कृति को विदेशी नहीं लगते।

चार्ली चैप्लिन यानी हम सब

यदि यह वर्ष चैप्लिन की जन्मशती का न होता तो भी चैप्लिन के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण वर्ष होता क्योंकि आज उनकी पहली फ़िल्म ‘मेकिंग ए लिविंग’ के 75वर्ष पूरे होते हैं। पौन शताब्दी से चैप्लिन की कला दुनिया के सामने है और पाँच पीढ़ियों को मुग्ध कर चुकी है । समय, भूगोल और संस्कृतियों की सीमाओ से खिलवाड़ करता हुआ चार्ली आज भारत के लाखों बच्चों को हँसा रहा है जो उसे अपने बुढ़ापे तक याद रखेंगे। पश्चिम में तो बार-बार चार्ली का पुनर्जीवन होता ही है, विकासशील दुनिया में जैसे-जैसे टेलीविज़न और वीडियो का प्रसार हो रहा है, एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग नए सिरे से चार्ली को घड़ी ‘सुधारते’ या जूते ‘खाने’ की कोशिश करते हुए देख रहा है। चैप्लिन की ऐसी कुछ फ़िल्में या इस्तेमाल न की गई रीलें भी मिली हैं जिनके बारे में कोई जानता न था। अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफ़ी कुछ कहा जाएगा।

उनकी फ़िल्में भावनाओं पर टिकी हुई हैं, बुद्धि पर नहीं। ‘मेट्रोपोलिस’, ‘दी कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कैलिगारी’, ‘द रोवंथ सील’, ‘लास्ट इयर इन मारिएनबाड’, ‘द सैक्रिफाइस’ जैसी फ़िल्में दर्शक से एक उच्चतर अहसास की माँग करती हैं। चैप्लिन का चमत्कार यही है कि उनकी फ़िल्मों को पागलखाने के मरीज़ों, विकल मस्तिष्क लोगों से लेकर आइन्स्टाइन जैसे महान प्रतिभा वाले व्यक्ति तक कहीं एक स्तर पर और कहीं सूक्ष्मतम रसास्वादन के साथ देख सकते हैं। चैप्लिन ने न सिर्फ़ फ़िल्म कला को लोकतांत्रिक बनाया बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ा। यह अकारण नहीं है कि जो भी व्यक्ति, समूह या तंत्र गैर बराबरी नहीं मिटाना चाहता वह अन्य संस्थाओं के अलावा चैप्लिन की फ़िल्मों पर भी हमला करता है। चैप्लिन भीड़ का वह बच्चा है जो इशारे से बतला देता है कि राजा भी उतना ही नंगा है जितना मैं हूँ और भीड़ हँस देती है। कोई भी शासक या तंत्र जनता का अपने ऊपर हँसना पसंद नहीं करता । एक परित्यक्ता, दूसरे दर्जे की स्टेज अभिनेत्री का बेटा होना, बाद में भयावह गरीबी और माँ के पागलपन से संघर्ष करना, साम्राज्य, औद्योगिक क्रांति, पूँजीवाद तथा सामंतशाही से मगरूर एक समाज द्वारा दुरदुराया जाना-इन सबसे चैप्लिन को वे जीवन-मूल्य मिले जो करोड़पति हो जाने के बावजूद अंत तक उनमें रहे। अपनी नानी की तरफ़ से चैप्लिन खानाबदोशों से जुड़े हुए थे और यह एक सुदूर रूमानी संभावना बनी हुई है कि शायद उस खानाबदोश औरत में भारतीयता रही हो क्योंकि यूरोप के जिप्सी भारत से ही गए थे और अपने पिता की तरफ़ से वे यहूदीवंशी थे। इन जटिल परिस्थितियों ने चार्ली को हमेशा एक ‘बाहरी’, ‘घुमंतू’ चरित्र बना दिया। वे कभी मध्यवर्गी, बुर्जुआ या उच्चवर्गी जीवन-मूल्य न अपना सके। यदि उन्होंने अपनी फ़िल्मों में अपनी प्रिय छवि ‘ट्रैम्प’ (बद्दू, खानाबदोश, आवारागर्द ) की प्रस्तुत की है तो उसके कारण उनके अवचेतन तक पहुँचते हैं।

चार्ली पर कई फ़िल्म समीक्षकों ने नहीं, फ़िल्म कला के उस्तादों और मानविकी के विद्वानों ने सिर धुने हैं और उन्हें नेति कहते हुए भी यह मानना पड़ता है कि चार्ली पर कुछ नया लिखना कठिन होता जा रहा हैं। दरअसल सिद्धांत कला को जन्म नहीं देते, कला स्वयं अपने सिद्धांत या तो लेकर आती है या बाद में उन्हें गढ़ना पड़ता है। जो करोड़ों लोग चार्ली को देखकर अपने पेट दुखा लेते हैं उन्हें मैल ओटिंगर या जेम्स एजी की बेहद सारगर्भित समीक्षाओं से क्या लेना-देना? वे चार्ली को समय और भूगोल से काट कर देखते हैं और जो देखते हैं उसकी ताकत अब तक ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। यह कहना कि वे चार्ली में खुद को देखते हैं दूर की कौड़ी लाना है लेकिन बेशक जैसा चार्ली वे देखते हैं वह उन्हें जाना-पहचाना लगता है, जिस मुसीबत में वह अपने को हर दसवें सेकेंड में डाल देता है वह सुपरिचित लगती है। अपने को नहीं लेकिन वे अपने किसी परिचित या देखे हुए को चार्ली मानने लगते हैं। कला में बेहतर क्या है – बुद्धि को प्रेरित करने वाली भावना या भावना को उकसाने वाली बुद्धि ? उसने भावना को चुना और उसके कारण थे। बचपन की दो घटनाओं ने चैप्लिन पर गहरा, स्थायी प्रभाव डाला था। एक बार जब वे बीमार थे तब उनकी माँ ने उन्हें ईसा मसीह का जीवन बाइबिल से पढ़कर सुनाया था। ईसा के सूली पर चढ़ने के प्रकरण तक आते-आते माँ और चार्ली दोनों रोने लगे। अपनी आत्मकथा में चैप्लिन लिखते हैं :

‘ओकले स्ट्रीट के तहखाने के उस अँधियारे कमरे में माँ ने मेरे सामने संसार की वह सबसे दयालु ज्योति उजागर की जिसने साहित्य और नाट्य को उनके महानतम और समृद्ध विषय दिए हैं: स्नेह, करुणा और मानवता ।’

दूसरी घटना भी कम मार्मिक नहीं है। बालक चार्ली उन दिनों एक ऐसे घर में रहता था जहाँ से कसाईखाना दूर नहीं था। वह रोज सैकड़ों जानवरों को वहाँ ले जाया जाता देखता था। एक बार एक भेड़ किसी तरह जान छुड़ाकर भाग निकली। उसे पकड़ने वाले उसका पीछा करते हुए कई बार फिसले, गिरे और पूरी सड़क पर ठहाके लगने लगे। आखिरकार उस गरीब जानवर को पकड़ लिया गया और उसे फिर कसाई के पास ले जाने लगे। तब चार्ली को अहसास हुआ कि उस भेड़ के साथ क्या होगा। वह रोता हुआ माँ के पास दौड़ा, ‘उसे मार डालेंगे, उसे मार डालेंगे।’ बाद में चैप्लिन ने अपनी आत्मकथा में लिखा ‘वसंत की वह बेलौस दोपहर और वह मज़ाकिया दौड़ कई दिनों तक मेरे साथ रही; और मैं कई बार सोचता हूँ कि उस घटना ही ने तो कहीं मेरी भावी फ़िल्मों की भूमि तय नहीं कर दी थी- त्रासदी और हास्योत्पादक तत्वों के सामंजस्य की । ‘

भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र को कई रसों का पता है, उनमें से कुछ रसों का किसी कलाकृति में साथ-साथ पाया जाना श्रेयस्कर भी माना गया है, जीवन में हर्ष और विषाद आते रहते हैं यह संसार की सारी सांस्कृतिक परंपराओं को मालूम है, लेकिन करुणा का हास्य में बदल जाना एक ऐसे रस सिद्धांत की माँग करता है जो भारतीय परंपराओं में नहीं मिलता। ‘रामायण’ तथा ‘महाभारत’ में जो हास्य है वह ‘दूसरों पर है और अधिकांशतः वह परसंताप से प्रेरित है। जो करुणा है वह अकसर सद्व्यक्तियों के लिए और कभी-कभार दुष्टों के लिए है। संस्कृत नाटकों में जो विदूषक है वह राजव्यक्तियों से कुछ बदतमीजियाँ अवश्य करता है, किंतु करुणा और हास्य का सामंजस्य उसमें भी नहीं है। अपने ऊपर हँसने और दूसरों में भी वैसा ही माद्दा पैदा करने की शक्ति भारतीय विदूषक में कुछ कम ही नज़र आती है।

इसलिए भारत में चैप्लिन के इतने व्यापक स्वीकार का एक अलग सौंदर्यशास्त्रीय महत्त्व तो है ही, भारतीय जनमानस पर उसने जो प्रभाव डाला होगा उसका पर्याप्त मूल्यांकन शायद अभी होने को है। हास्य कब करुणा में बदल जाएगा और करुणा कब हास्य में परिवर्तित हो जाएगी इससे पारंपरिक या सैद्धांतिक रूप से अपरिचित भारतीय जनता ने उस ‘फ़िनोमेनन’ को यूँ स्वीकार किया जैसे बत्तख पानी को स्वीकारती है। किसी ‘विदेशी’ कला-सिद्धांत को इतने स्वाभाविक रूप से पचाने से अलग ही प्रश्न खड़े होते हैं और अंशतः एक तरह की कला की सार्वजनिकता को ही रेखांकित करते हैं।

किसी भी समाज में इने-गिने लोगों को ‘अमिताभ बच्चन’ या ‘दिलीप कुमार’ कहकर ताना दिया जाता है लेकिन किसी भी व्यक्ति को परिस्थितियों का औचित्य देखते हुए ‘चार्ली’ या ‘जानी वॉकर’ कह दिया जाता है। यह स्वयं एक स्वीकारोक्ति है कि हमारे बीच ‘नायक’ कम हैं जबकि हर व्यक्ति दूसरे को कभी-न-कभी विदूषक समझता है। दरअसल मनुष्य स्वयं ईश्वर या नियति का विदूषक, क्लाउन, जोकर या साइड किक है। यह अकारण नहीं है कि महात्मा गांधी से चार्ली चैप्लिन का खासा पुट था और गांधी तथा नेहरू दोनों ने कभी चार्ली का सान्निध्य चाहा था।

चार्ली के नितांत अभारतीय सौंदर्यशास्त्र की इतनी व्यापक स्वीकृति देखकर राजकपूर ने भारतीय फ़िल्मों का एक सबसे साहसिक प्रयोग किया। ‘आवारा’ सिर्फ़ दि ट्रैम्प’ का शब्दानुवाद ही हीं था बल्कि चार्ली का भारतीयकरण ही था। वह अच्छा ही था कि राजकपूर ने चैप्लिन की नकल करने के आरोपों की परवाह नहीं की। राजकपूर के ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ के पहले फ़िल्मी नायकों पर हँसने की और स्वयं नायकों के अपने पर हँसने की परंपरा नहीं थी। 1953-57 के बीच जब चैप्लिन अपनी गैर- ट्रैम्पनुमा अंतिम फ़िल्में बना रहे थे तब राजकपूर चैप्लिन का युवा अवतार ले रहे थे। फिर तो दिलीप कुमार (बाबुल, शबनम, कोहिनूर, लीडर, गोपी), देव आनंद ( नौ दो ग्यारह, फंटूश, तीन देवियाँ), शम्मी कपूर, अमिताभ बच्चन (अमर अकबर एंथनी) तथा श्रीदेवी तक किसी ना किसी रूप से चैप्लिन का कर्ज़ स्वीकार कर चुके हैं। बुढ़ापे में जब अर्जुन अपने दिवंगत मित्र कृष्ण की पत्नियों को डाकुओं से न बचा सके और हवा में तीर चलाते रहे तो यह दृश्य करुण और हास्योत्पादक दोनों था किंतु महाभारत में सिर्फ़ उसकी त्रासद व्याख्या स्वीकार की गई। आज फ़िल्मों में किसी नायक को झाडुओं से पिटता भी दिखाया जा सकता है लेकिन हर बार हमें चार्ली की ही ऐसी फ़जीहतें याद आती हैं।

चार्ली की अधिकांश फ़िल्में भाषा का इस्तेमाल नहीं करतीं इसलिए उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा मानवीय होना पड़ा। सवाक् चित्रपट पर कई बड़े-बड़े कॉमेडियन हुए हैं, लेकिन वे चैप्लिन की सार्वभौमिकता तक क्यों नहीं पहुँच पाए इसकी पड़ताल अभी होने को है। चार्ली का चिर-युवा होना या बच्चों जैसा दिखना एक विशेषता तो है ही, सबसे बड़ी विशेषता शायद यह है कि वे किसी भी संस्कृति को विदेशी नहीं लगते। यानी उनके आसपास जो भी चीजें, अड़ंगे, खलनायक, दुष्ट औरतें आदि रहते हैं वे एक सतत ‘विदेश’ या ‘परदेस’ बन जाते हैं और चैप्लिन ‘हम’ बन जाते हैं। चार्ली के सारे संकटों में हमें यह भी लगता है कि यह ‘मैं’ भी हो सकता हूँ, लेकिन ‘मैं’ से ज़्यादा चार्ली हमें ‘हम’ लगते हैं। यह संभव है कि कुछ अर्थों में ‘बस्टर कीटन’ चार्ली चैप्लिन से बड़ी हास्य प्रतिभा हो लेकिन कीटन हास्य का काफ्का है जबकि चैप्लिन प्रेमचंद के ज़्यादा नज़दीक हैं।

एक होली का त्योहार छोड़ दें तो भारतीय परंपरा में व्यक्ति के अपने पर हँसने, स्वयं को जानते-बूझते हास्यास्पद बना डालने की परंपरा नहीं के बराबर है। गाँवों और लोक-संस्कृति में तब भी वह शायद हो, नागर-सभ्यता में तो वह थी नहीं। चैप्लिन का भारत में महत्त्व यह है कि वह ‘अंग्रेज़ों जैसे’ व्यक्तियों पर हँसने का अवसर देते हैं। चार्ली स्वयं पर सबसे ज़्यादा तब हँसता है जब वह स्वयं को गर्वोन्मत्त, आत्म-विश्वास से लबरेज़, सफलता, सभ्यता, संस्कृति तथा समृद्धि की प्रतिमूर्ति, दूसरों से ज़्यादा शक्तिशाली तथा श्रेष्ठ, अपने ‘वज्रादपि कठोराणि’ अथवा ‘मृदुनि कुसुमादपि’ क्षण में दिखलाता है। तब यह समझिए कि कि यह सारी गरिमा सुई चुभे गुब्बारे जैसी फुस्स हो उठेगी। कुछ ऐसा हुआ ही चाहता है

• अपने जीवन के अधिकांश हिस्सों में हम चार्ली के टिली ही होते हैं जिसके रोमांस हमेशा पंक्चर होते रहते हैं। हमारे महानतम क्षणों में कोई भी हमें चिढ़ाकर या लात मारकर भाग सकता है। अपने चरमतम शूरवीर क्षणों में हम क्लैब्य और पलायन के शिकार हो सकते हैं। कभी-कभार लाचार होते हुए जीत भी सकते हैं। मूलतः हम सब चार्ली हैं क्योंकि हम सुपरमैन नहीं हो सकते। सत्ता, शक्ति, बुद्धिमत्ता, प्रेम और पैसे के चरमोत्कर्षों में जब हम आईना देखते हैं तो चेहरा चार्ली चार्ली हो जाता है।

सारांश

महान अभिनेता और निर्देशक चार्ली चैप्लिन की जन्मशती मनाई गई। इस वर्ष उनकी फ़िल्म ‘मेकिंग ए लिविंग’ के भी 75 वर्ष पूरे होते हैं। इतने लंबे समय से चार्ली दुनिया को मुग्ध कर रहा है। आज इसका प्रसार विकासशील देशों में भी हो रहा है। चार्ली की अनेक फ़िल्में या इस्तेमाल न की गई रीलें भी मिली हैं जो अभी तक दर्शकों तक नहीं पहुँचीं। इस तरह से चार्ली पर अगले पचास वर्षों तक काफ़ी कुछ कहने की गुंजाइश है। चार्ली की फ़िल्में भावना पर आधारित हैं, बुद्धि पर नहीं। मेट्रोपोलिस, द कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कैलिगारी, द रोवंथ सील, लास्ट इयर इन मारिएनबाड, द सैक्रिफ़ाइस जैसी फ़िल्मों का आम आदमी से लेकर आइंस्टाइन जैसे महान प्रतिभा वाले व्यक्ति तक एक जैसा रसास्वादन करते हैं। इन्होंने न सिर्फ़ फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया, बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को भी तोड़ा। चैप्लिन की फ़िल्में यह दर्शाती हैं कि हर व्यक्ति में त्रुटि है।

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

पाठ के साथ

प्रश्न 1:
लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ कहा जाएगा?
उत्तर –
चैप्लिन एक महान कलाकार थे। उन पर जितना लिखा जाए कम है। उन्होंने अपने समाज और राष्ट्र के लिए बहुत कुछ किया। उन पर जितना अभी तक लिखा गया है, वह कम है। इसलिए लेखक ने कहा कि अभी उन पर 50 वर्षों तक काफ़ी कुछ लिखा जाएगा ताकि उनके जीवन के बारे में लोग अच्छी तरह से जान सकें।

प्रश्न 2:
” चैप्लिन ने न सि.र्फ. फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोडा।” इस पंक्ति में लोकतांत्रिक बनाने का और वर्ण-व्यवस्था तोड़ने का क्या अभिप्राय है? क्या आप इससे सहमत हैं?
उत्तर –
में लोकतांत्रिक बनाने का और वर्ण-व्यवस्था तोड़ने का क्या अभिप्राय हैं? क्या आप इससे सहमत हैं? उत्तर ‘लोकतांत्रिक बनाने’ का अर्थ है-आम व्यक्ति के लिए उपयोगी बनाना। चालों से पहले फिल्में एक वर्ग-विशेष के लिए बनाई जाती थीं। इनका निर्माण सामंतों, बुद्धजीवियों, कलाकारों आदि की रुचियों के अनुरूप किया जाता था। चार्ली ने अपनी फिल्मों में आम आदमी को स्थान दिया, उनकी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। उसने हर व्यक्ति की कमजोरी को बताया।
‘वर्ण-व्यवस्था तोड़ने’ का अर्थ है-जाति-संबंधी व्यवस्था को तोड़ना। चार्ली ने फ़िल्मों में निम्न वर्ग को स्थान दिया। कुछ लोग किसी विचारधारा के समर्थन में फिल्में बनाते थे। चार्ली ने इस जकड़न को तोड़ा तथा सारे संसार के व्यक्तियों के लिए फिल्में बनाई। उन्होंने कला के एकाधिकार को समाप्त किया।

प्रश्न 3:
लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण किसे कहा और क्यों? गाँधी और नेहरू ने भी उनका सन्निध्य क्यों चाहा?

अथवा

चार्ली चैप्लिन का भारतीयकरण किन-किन रूपों में पाया जाता है? पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर –
लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण राजकपूर जी को कहा क्योंकि उस समय वही एकमात्र नायक थे जो चार्ली की नकल किया करते थे। अपनी कई फ़िल्मों में उन्होंने चार्ली जैसी ऐक्टिंग (अभिनय) की। आवारा, श्री 420 आदि फ़िल्मों के माध्यम से राजकपूर जी ने चार्ली का भारतीयकरण किया। महात्मा गांधी से चार्ली का बहुत लगाव था। इसलिए श्री जवाहरलाल नेहरू और गांधी दोनों ही चार्ली का सान्निध्य चाहते थे ताकि उनकी क्षमताओं, उनकी कार्यकुशलता से कुछ सीखा जाए।

प्रश्न 4:
लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में किसे श्रेयस्कर माना है और क्यों? क्या आप कुछ ऐसे उदाहरण दे सकते हैं जहाँ कई रस साथ-साथ आए हों?
उत्तर –
लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में रस को श्रेयस्कर माना है। किसी कलाकृति में एक साथ कई रसों का मिश्रण हो तो वह समृद्ध व रुचिकर बनती है। जीवन में हर्ष व विषाद आते-जाते रहते हैं। करुण रस का हास्य में बदल जाना एक ऐसे रस की माँग करता है जो भारतीय परंपरा में नहीं मिलता। उदाहरणस्वरूप युवक-युवती लाइब्रेरी में बैठकर प्रेम वार्तालाप कर रहे हैं। उसी समय सुरक्षा अधिकारी उन्हें देखता है तो उनमें भय का संचार हो जाता है।

प्रश्न 5:
जीवन की जद्दोजहद ने चार्ली के व्यक्तित्व को कैसे संपन्न बनाया?

अथवा

उन सधर्षों का उल्लख कीजिए, जिनसे टकराते-टकराते चार्ली चेप्लिन के व्यक्तित्व में निखार आता चला गया।

अथवा

चार्ली चेप्लिन के जीवन-सघर्ष पर प्रकाश डालिए।
उत्तर –
चार्ली को जीवन बहुत संघर्षमय रहा है। उसने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किए है। हर संघर्ष और असफलता ने उसे अधिक ऊर्जावान बनाया है। वह कभी निराश नहीं हुआ। लोगों की सहायता करता रहा। कभी भी उसने संकटों की परवाह नहीं की। हर संकट को डटकर मुकाबला किया। वह अपनी माँ के पागलपन से संघर्ष करता रहा। सामंतशाही और पूँजीवादी समाज ने उसे ठुकरा दिया। गरीब चार्ली हर पल अपनी मंजिल के बारे में सोचता और उस तक पहुँचने का मार्ग खोजता । आखिरकार उसे अपनी मंजिल मिल ही गई। रोडपति से वह करोड़पति बन गया।

प्रश्न 6:
चार्ली चेप्लिन की फ़िल्मों में निहित त्रासदी/करुणा/हास्य का सामंजस्य भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्रर की परिधि में क्यों नहीं आता?
उत्तर –
भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र अनेक रसों को स्वीकृति देता है, परंतु चार्ली की फ़िल्मों में निहित त्रासदी/करुणा/हास्य का सामंजस्य को अलग मानता है। इसका कारण यह है कि यह रस सिद्धांत के अनुकूल नहीं है। यहाँ हास्य को करुणा में नहीं बदला जाता।’रामायण’ और’महाभारत में पाया जाने वाला हास्य दूसरों पर है, अपने पर नहीं। इनमें दर्शाई गई करुणा प्राय: सद्व्यक्तियों के लिए है, कभी-कभी वह दुष्टों के लिए भी है। संस्कृत नाटकों का विदूषक कुछ बदतमीजियाँ अवश्य करता है, परंतु वह भी दूसरों पर होती है।

प्रश्न 7:
चार्ली सबसे ज्यादा स्वयं पर कब हँसता है?

अथवा

चार्ली सबसे ज़्यादा स्वय पर कब और क्यों हसता है?
उत्तर –
चार्ली सबसे ज्यादा स्वयं पर तब हँसता है जब वह अपने को स्वाभिमानी, आत्मविश्वास से पूर्ण, सफलता, सभ्यता, संस्कृति की प्रतिमूर्ति मानता है। जब वह स्वयं को दूसरों से ज्यादा शक्तिशाली और समृद्ध तथा श्रेष्ठ समझता है तब भी वह अपने पर हँसता है।

पाठ के आस-पास

प्रश्न 1:
आपके विचार से मूक और सवाकू फिल्मों में से किसमें ज्यादा परिश्रम करने की आवश्यकता है और क्यों?
उत्तर –
मेरे विचार में मूक फ़िल्मों में ज्यादा परिश्रम की जरूरत होती है। सवाक् फिल्मों में भाषा के माध्यम से कलाकार अपने भाव व्यक्त कर देता है। वह वाणी के आरोह-अवरोह से अपनी दशा बता सकता है, परंतु मूक फिल्मों में हर भाव शारीरिक चेष्टाओं द्वारा व्यक्त किया जाता है। इस कार्य में अत्यंत दक्षता की जरूरत होती है।

प्रश्न 2:
सामान्यत: व्यक्ति अपने ऊपर नहीं हँसते, दूसरों पर हँसते हैं। कक्षा में ऐसी घटनाओं का जिक्र कीजिए जब-
(क) आप अपने ऊपर हँसे हों;
(ख) हास्य करुणा में या करुणा हास्य में बदल गई हो।
उत्तर –
(क) एक दिन मैं कक्षा में जाकर बैठ गया। मैं जल्दी-जल्दी में गलती से अपनी कक्षा में नहीं बैठा बल्कि दूसरी कक्षा में जा बैठा। जब टीचर पढ़ाने आया तो मैं उन्हें चुपचाप सुनता रहा। जब उन्होंने मुझसे प्रश्न पूछा तब मुझे लगा कि यह मेरी कक्षा नहीं है। मैंने तुरंत टीचर से कहा उन्होंने मुझे बाहर जाने की अनुमति दे दी। इस बात पर मैं बिना हँसे नहीं रह सका।

(ख) हमारी विदाई पार्टी चल रही थी। बच्चे, अध्यापक सभी खूब मौज-मस्ती कर रहे थे। अचानक एक लड़के की चीख सुनाई दी सभी सहम गए। उसके दिल में जोर का दर्द उठा। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। हास्य करुणा में बदल गई। तभी हममें से एक छात्र ने उस छात्र से कहा कि तेरे दिल में दर्द किसके लिए हुआ। सभी जोर से हँसने लगे। वह छात्र भी हँसने लगा। करुणा हास्य में बदल गई।

प्रश्न 3:
‘चार्ली हमारी वास्तविकता हैं, जबकि सुपरमैन स्वप्न’। आप इन दोनों में खुद को कहाँ पाते हैं?
उत्तर –
हम इन दोनों में खुद को चार्ली के नजदीक पाते हैं क्योंकि हम आम आदमी हैं और आम आदमी स्वप्न देखकर भी लाचार ही रहता है।

प्रश्न 4:
भारतीय सिनेमा और विज्ञापनों ने चार्ली की छवि का किन-किन रूपों में उपयोग किया है? कुछ फ़िल्मों (जैसे-आवारा, श्री 420, मेरा नाम जोकर, मिस्टर इंडिया) और विज्ञापनों (जैसे-चैरी ब्लॉसस) को गौर से देखिए और कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर –
विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 5:
आजकल विवाह आदि उत्सवों, समारोहों एवं रेस्तराँ में आज भी चार्ली चेप्लिन का रूपधरे किसी व्यक्ति से आप अवश्य टकराए होंगे। सोचकर बताइए कि बरजार ने चार्ली चौप्लिन का कैसा उपयोग किया है?
उत्तर –
आजकल विवाह आदि उत्सवों, समारोहों एवं रेस्तरों में चार्ली चौप्लिन का उपयोग हँसी-मजाक के प्रतीक के रूप में किया जाता है।

बोधात्मक प्रशन
प्रश्न 1:
चार्ली चैप्लिन की जिंदगी ने उन्हें कैसा बना दिया? ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ पाठ के आधार यर स्पष्ट र्काजिए।
उत्तर –
चार्ली एक परित्यक्ता, दूसरे दर्जे की स्टेज अभिनेत्री के बेटे थे। उन्होंने भयंकर गरीबी और माँ के पागलपन से संघर्ष करना सीखा। साम्राज्यवाद, औद्योगिक क्रांति, पूँजीवाद तथा सामंतशाही से मगरूर एक समाज का तिरस्कार उन्होंने सहन किया। इसी कारण मासूम चैप्लिन को जो जीवन-मूल्य मिले, वे करोड़पति हो जाने के बाद भी अंत तक उनमें रहे। इन परिस्थितियों ने चैप्लिन में भीड़ का वह बच्चा सदा जीवित रखा, जो इशारे से बतला देता है कि राजा भी उतना ही नंगा है, जितना मैं हूँ और हँस देता है। यही वह कलाकार है, जिसने विषम परिस्थितियों में भी हिम्मत से काम लिया।

प्रश्न 2:
चार्ली चैप्लिन ने दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था की कैसे तोडा है?
उत्तर –
चार्ली की फिल्में बच्चे-बूढ़े, जवान, वयस्कों सभी में समान रूप से लोकप्रिय हैं। यह चैप्लिन का चमत्कार ही है कि उनकी फिल्मों को पागलखाने के मरीजों, विकल मस्तिष्क लोगों से लेकर आइंस्टाइन जैसे महान प्रतिभावाले व्यक्ति तक एक स्तर पर कहीं अधिक सूक्ष्म रसास्वाद के साथ देख सकते हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि हर वर्ग में लोकप्रिय इस कलाकार ने फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया और दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ा। कहीं-कहीं तो भौगोलिक सीमा, भाषा आदि के बंधनों को भी पार करने के कारण इन्हें सार्वभौमिक कलाकार कहा गया है।

प्रश्न 3:
चैप्लिन के व्यक्तित्व की तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए जिनके कारण उन्हें भुलाना कठिन हैं?

अथवा

चार्ली के व्यक्तित्व की तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर –
चैप्लिन के व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं जिनके कारण उन्हें भुलाना कठिन है-

  1. चाली चैप्लिन सदैव खुद पर हँसते थे।
  2. वे सदैव युवा या बच्चों जैसा दिखते थे।
  3. कोई भी व्यक्ति उन्हें बाहरी नहीं समझता था।
  4. उनकी फिल्मों में हास्य कब करुणा के भाव में परिवर्तित हो जाता था, पता नहीं चलता था।

प्रश्न 4:
चार्ली चैप्लिन कौन था? उसके ‘ भारतीयकरण’ से लेखक का क्या आशय हैं?
उत्तर –
चार्ली चैप्लिन पश्चिम का महान कलाकार था जिसने हास्य मूक फ़िल्में बनाई। उसकी फिल्मों में हास्य करुणा में बदल जाता था। भारतीय रस सिद्धांत में इस तरह का परिवर्तन नहीं पाया जाता। यहाँ फ़िल्म का अभिनेता स्वयं पर नहीं हँसता। राजकपूर ने ‘आवारा’ फिल्म को ‘द ट्रैम्प’ के आधार पर बनाया। इसके बाद ‘श्री 420’ व कई अन्य फ़िल्मों के कलाकारों ने चालों का अनुकरण किया।

प्रश्न 5:
भारतीय जनता ने चार्ली के किस ‘फिनोमेनन” को स्वीकार किया? उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
भारतीय जनता ने चार्ली के उस फिनोमेनन को स्वीकार किया जिसमें नायक स्वयं पर हँसता है। यहाँ उसे इस प्रकार स्वीकार किया गया जैसे बत्तख पानी को स्वीकारती है। भारत में राजकपूर, जानी वाकर, अमिताभ बच्चन, शम्मी कपूर, देवानंद आदि कलाकारों ने ऐसे चरित्र के अभिनय किए। लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण राजकपूर को कहा। उनकी फ़िल्म ‘आवारा’ सिर्फ ‘द ट्रैम्प’ का शब्दानुवाद ही नहीं थी, बल्कि चार्ली का भारतीयकरण ही थी।

प्रश्न 6:
पश्चिम में बार-बार चार्ली का पुनजीवन होता हैं।-कैसे?
उत्तर –
लेखक बताता है कि पश्चिम में चाली द्वारा निभाए गए चरित्रों की नकल बार-बार की जाती है। अनेक अभिनेता उसकी तरह नकल करके उसकी कला को नए रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार चार्ली नए रूप में जन्म लेता रहता है।

प्रश्न 7:
चार्ली के जीवन पर प्रभाव डालने वाली घटनाओं का उल्लेख कीजिए।

अथवा

बचपन की किन दो घटनाओं ने चार्ली के जीवन पर गहरा एव स्थायी प्रभाव डाला?
उत्तर –
चार्ली के जीवन पर दो घटनाओं का प्रमुख प्रभाव पड़ा, जो निम्नलिखित हैं

  1. एक बार चार्ली बीमार हो गया। उस समय उसकी माँ ने बाइबिल से ईसा मसीह का जीवन चरित्र पढ़कर सुनाया। ईसा के सूली पर चढ़ने के प्रसंग पर माँ बेटे दोनों रोने लगे। इस कथा से उसने करुणा, स्नेह व मानवता का पाठ पदा।
  2. दूसरी घटना चार्ली के घर के पास की है। पास के कसाईखाने से एक बार एक भेड़ किसी प्रकार जान बचाकर भाग निकली। उसको पकड़ने के लिए उसके पीछे भागने वाले कई बार फिसलकर सड़क पर गिरे जिसे देखकर दर्शकों ने हँसी के ठहाके लगाए। इसके बाद भेड़ पकड़ी गई। चार्ली ने भेड़ के साथ होने वाले व्यवहार का अनुमान लगा लिया। उसका हृदय करुणा से भर गया। हास्य के बाद करुणा का यही भाव उसकी भावी फ़िल्मों का आधार बना।

प्रश्न 8:
‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ पाठ का प्रतिपादृय बताइए।
उत्तर –
पृष्ठ-377 पर ‘पाठ का प्रतिपाद्य एवं सारांश’ में प्रतिपाद्य’ शीर्षक के अंतर्गत देंखें।

प्रश्न 9:
चार्ली की फ़िल्मों की कौन- कौन सी विशेषताएँ हैं?
उत्तर –
लेखक ने चालों की फिल्मों की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई हैं

  1. इनमें भाषा का प्रयोग बहुत कम है।
  2. इनमें मानवीय स्वरूप अधिक है।
  3. चालों में सार्वभौमिकता है।
  4. वह सदैव चिर युवा या बच्चे जैसा दिखता है।
  5. वह किसी भी संस्कृति को विदेशी नहीं लगता।
  6. वह सबको अपना स्वरूप लगता है।

प्रश्न 10:
अपने जीवन के अधिकांश हिस्सों में हम क्या होते हैं?
उत्तर –
अपने जीवन के अधिकांश हिस्सों में हम चार्ली के टिली ही होते हैं जिसके रोमांस हमेशा पंक्चर होते रहते हैं। हमारे महानतम क्षणों में कोई भी हमें चिढ़ाकर या लात मारकर भाग सकता है और अपने चरमतम शूरवीर क्षणों में हम क्लैब्य और पलायन के शिकार हो सकते हैं। कभी-कभार लाचार होते हुए जीत भी सकते हैं। मूलत: हम सब चार्ली हैं क्योंकि हम सुपरमैन नहीं हो सकते। सत्ता, शक्ति, बुद्धिमत्ता, प्रेम और पैसे के चरमोत्कर्षों में जब हम आईना देखते हैं तो चेहरा चार्ली-चार्ली हो जाता है।

प्रश्न 11:
‘चार्ली की फिल्में भावनाओं पर टिकी हुई हैं, बुद्ध पर नहीं।”-‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
हास्य फ़िल्मों के महान अभिनेता एवं निर्देशक चार्ली चैप्लिन की सबसे बड़ी विशेषता थी-करुणा और हास्य के तत्वों का सामंजस्य। उनकी फिल्मों में भावना-प्रधान अभिनय दर्शकों को बाँधे रहता है। उनकी फ़िल्मों में भावनाओं की प्रधानता है, बुद्ध तत्व की नहीं। चार्ली को बचपन से ही करुणा और हास्य ने जबरदस्त रूप से प्रभावित किया है। वह बाइबिल पढ़ते हुए ईसा के सूली पर चढ़ने की घटना पर रो पड़ा और कसाई खाने से भागी भेड़ देखकर वह दयाद्र। होता है तो उसे पकड़ने वाले फिसल-फिसलकर गिरते हुए हँसी पैदा करते हैं।

प्रश्न 12:
‘चार्ली चैप्लिन’ का जीवन किस प्रकार हास्य और त्रासदी का रूप बनकर भारतीयों को प्रभावित करता है? उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर –
चार्ली चैप्लिन का जीवन हास्य और त्रासदी का रूप बनकर भारतीयों को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित करता है-

  1. प्रसिद्ध भारतीय सिनेजगत के कलाकारों-राजकपूर, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, देवानंद आदि, के अभिनय पर चार्ली चैप्लिन के अभिनय का प्रभाव देखा जा सकता है।
  2. चार्ली चैप्लिन के असंख्य प्रशंसक भारतीय हैं जो उनके अभिनय को बहुत पसंद करते हैं।
  3. उन्होंने जीवन की त्रासदी भरी घटनाओं को भी हास्य द्वारा अभिव्यक्त करके दर्शकों को प्रभावित किया।

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