सिद्ध का उदय

सिद्ध का उदय

बौद्ध धर्म विकृत होकर वज्रयान संप्रदाय के रूप में देश के पूरबी भागों में बहुत दिनों से चला आ रहा था। इन बौद्ध तांत्रिकों के बीच वामाचार अपनी चरम सीमा को पहुँचा। ये बिहार से लेकर आसाम तक फैले थे और सिद्ध कहलाते थे।

‘चौरासी सिद्ध’ इन्हीं में हुए हैं, जिनका परंपरागत स्मरण जनता को अब तक है। इन तांत्रिक योगियों को लोग अलौकिक शक्ति संपन्न समझते थे। ये अपनी सिद्धियों और विभूतियों के लिए प्रसिद्ध थे। राजशेखर ने ‘कर्पूरमंजरी’ में भैरवानंद के नाम से एक ऐसे ही सिद्ध योगी का समावेश किया है।

इस प्रकार जनता पर इन सिद्ध योगियों का प्रभाव विक्रम की दसवीं शताब्दी से ही पाया जाता है, जो मुसलमानों के आने पर पठानों के समय तक कुछ-न कुछ बना रहा। बिहार के नालंदा और विक्रमशिला नामक प्रसिद्ध विद्यापीठ इनके अड्डे थे। बख्तियार खिलजी ने इन दोनों स्थानों को जब उजाड़ा तब से ये तितर-बितर हो गए। बहुत से भोट आदि अन्य देशों को चले गए।

चौरासी सिद्धों के नाम

चौरासी सिद्धों के नाम ये हैं-लूहिपा, लीलापा, विरुपा, डोंभिपा, शबरीपा, सरहपा, कंकालीपा, मीनपा, गोरक्षपा, चौरंगीपा, वीणापा, शांतिपा, तंतिपा, चमरिपा, खड्गपा, नागार्जुन, कण्हपा, कर्णरिपा, थगनपा, नारोपा, शीलपा, तिलोपा, छत्रपा, भद्रपा, दोखंधिपा, अजागिपा, कालपा, धोंभीपा, कंकणपा, कमरिपा, डॅगिपा, भदेपा, तंधेपा, कुक्कूरिपा,कुचपा, धर्मपा, महीपा, अचिंतिपा, भल्लहपा, नलिनपा, भूसुकुपा, इंद्रभूति, मेकोपा, कुठालिपा, कमरिपा, जालंधरपा, राहुलपा, घर्वरिपा, धोकरिपा, मेदिनीपा, पंकजपा, घंटापा, जोगीया, चेलुकपा, गुंडरिया, निर्गुणपा, जयानंत, चर्पटीपा, चपंकपा, भिखनपा, भलिपा, कुमरिपा, चँवरिपा, मणिभद्रपा (योगिनी), कनखलापा (योगिनी), कलकलपा, कतालीपा, धहुरिपा, उधरिपा, कपालपा, किलपा, सागरमपा, सर्वभक्षपा, नागबोधिपा, दारिकपा, पुतलिपा, पनहपा, कोकालिपा, अनंगपा, लक्ष्मीकरा (योगिनी), समुदपा, भलिपा।

(‘पा’ आदरार्थक ‘पाद’ शब्द है। इस सूची के नाम पूर्वापर कालानुक्रम से नहीं हैं। इनमें से कई एक समसामयिक थे।)

वज्रयानशाखा में जो योगी ‘सिद्ध’ के नाम से प्रसिद्ध हुए वे अपने मत का संस्कार जनता पर भी डालना चाहते थे। इससे वे संस्कृत रचनाओं के अतिरिक्त अपनी बानी अपभ्रंशमिश्रित देशभाषा या काव्यभाषा में भी बराबर सुनाते रहे। उनकी रचनाओं का एक संग्रह पहले म.म. हरप्रसाद शास्त्री ने बँगला अक्षरों में ‘बौद्धगान ओ दोहा’ के नाम से निकाला था। पीछे त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायनजी भोट देश में जाकर सिद्धों की और बहुत सी रचनाएँ लाए।

पहले सिद्ध: सरहपाद

सिद्धों में सबसे पुराने ‘सरह’ (सरोजवज्र भी नाम है) हैं, जिनका काल डॉ. विनयतोष भट्टाचार्य ने विक्रम संवत् 690 निश्चित किया है। उनकी रचना के कुछ नमूने नीचे दिए जाते हैं-


अंतस्साधना पर जोर और पंडितों को फटकार-

पंडिअसअल सत बक्खाणइ। देहहि रुद्ध बसंत न जाणइ।
अमणागमण ण तेन बिखंडि। तोवि णिलज्जइ भणइ हउँ पंडि॥

जहि मन पवन न संचाइ, रवि ससि नांहि पवेश।
तहि बट चित्त बिसाम करु, सरेहे कहिअ उवेस॥

घोर अधारे चंदमणि जिमि उज्जोअकरे।।
परम महासुह एखु कणे दुरिअ अशेष हरेइ॥

जीवंतह जो नउ जरइ सो अजरामर होइ।
गुरु उपएसें बिमलमइ सो पर धण्णा कोइ॥

दक्षिण मार्ग छोड़कर वाममार्ग ग्रहण का उपदेश-

नाद न बिंदु न रवि न शशि मंडल। चिअराअ सहाबे मूकल।

काआ तरुवर पंच बिड़ाल। चंचल चीए पइठो काल।
दिट करिअ महासुह परिमाण। लूइ भणइ गुरु पुच्छिअजाण॥
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भाव न होइ, अभाव ण जाइ। अइस संबोहे को पतिआइ?
लूइ भणइ बट दुलक्ख बिणाण। तिअधाए बिलसइ, अह लागेणा।

विरुपा


विरुपा (संवत् 900 के लगभग) की वारुणी प्रेरित अंतर्मुख साधना की पद्धति देखिए-

सहजे थिर करि वारुणी साध। अजरामर होइ दिट काँध।
दशमि दुआरत चिह्न देखइआ। आइल गराहक अपणे बहिआ।
चउशठि घडिए देट पसारा। पइठल गराहक नाहि निसारा।

कण्हपा


कण्हपा (संवत् 900 के उपरांत) की बानी के कुछ खंड नीचे उद्धृत किए जाते हैं-

एक्कण किड़ मंत्र ण तंत। णिअधरणी लइ केलि करंत।
णिअ घर घरणी जाब ण मज्जइ। ताब की पंचवर्ण बिहरिज्जड़॥
जिमि लोण बिलज्जइ पाणिएहि, तिमि धरिणी लइ चित्त।
समरस जड़ तक्खणे जड़ पुणु ते सम नित्त।


वज्रयानियों की योगतंत्र साधनाओं में मद्य तथा स्त्रियों का-विशेषतः डोमिनी, रजकी आदि का-अबाध सेवन एक आवश्यक अंग था। सिद्ध कण्हपा डोमिनी का आह्वान गीत इस प्रकार गाते हैं-


नगर बाहिरे डोंबी तोहरि कुडिया छइ। छोइ जाइ सो बाह्य नाडिया।


आलो डोंबि! तोए सम करिब म साँग। निघिण कण्ह कपाली जोइ लाग॥


एक्क सो पदमा चौषट्टि पाखुड़ी। तढि चढि नाचअ डोंबी बापुड़ी॥
हालो डोंबी! तो पुछमि सदभावे। अइससि जासि डोंबी काहरि नावे॥

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