श्रृंगऋषेः नगरी कक्षा छठवीं विषय संस्कृत पाठ 11

कक्षा छठवीं विषय संस्कृत पाठ 11 श्रृंगऋषेः नगरी

छत्तीसगढ़राजस्य पूर्वदिशि धमतरीजिलार्न्र्गतं सिहावा- नगरी विद्यते। पर्वतस्य सघन गुहाभिः विविधैः मठै: च आच्छादिता इयं नगरी प्रसिद्धा। पर्वस्योपरिभागे श्रृंग्ड़िऋिषेः आश्रमः अस्ति । श्रृंङ्गिऋषेः धर्मपत्नी शान्तादेवी अपि अस्मिन् पर्वते विराजते।

शब्दार्था:- पूर्वदिशि = पूर्व दिशा में, विद्यते = है, सघन = घने, गुहाभिः = गुफाओं में, आच्छादिता = ढँकी हुई, इयं = यह, अस्मिन् = इस, पर्वते = पहाड़ पर ,विराजते = विद्यमान हैं। 

अनुवाद – छत्तीसगढ़ के पूर्वी दिशा में धमतरी जिले के अन्तर्गत सिहावा नगरी विद्यमान है। पर्वत के सघन में गुफाओं और विविध मठों से आच्छादित (ढकी हुई) यह प्रसिद्ध नगरी है। पर्वत के ऊपरी भाग में श्रृंग्ड़ि ऋषि का आश्रम है। श्रृङ्गऋषि की धर्मपत्नी शान्तादेवी भी इस पर्वत पर विद्यमान हैं।

पर्वतस्य गुहायां शक्तिस्वरूपिणी दुर्गा प्रतिष्ठिता। अस्य क्षेत्रस्य इयं सिहावानगरी प्रयागः इति अभिधीयते । सिहावा क्षेत्रस्य समीपे सांकरा नाम ग्रामः अस्ति। यत्र दन्तेश्वरी माता बस्तरराज्ञां कुलदेवी इति ख्यातिं प्राप्ता । नगरवासिनः देवीं दन्तेश्वरी शक्तिस्वरूपां मन्यन्ते ।

शब्दार्थाः- गुहायां = गुफा में, प्रतिष्ठिता =प्रतिष्ठित है, अभिधीयते = कहलाती है, ग्रामः = गाँव, मन्यन्ते मानते हैं। 

अनुवाद :  पर्वत की गुफा में शक्तिस्वरूपा दुर्गा प्रतिष्ठित हैं। इस क्षेत्र की यह सिहावा नगरी प्रयाग कहलाती है। सिहावा क्षेत्र के पास सांकरा नामक ग्राम है। जहाँ की दन्तेश्वरी माता को बस्तर ‘राजा की कुल देवी की ख्याति प्राप्त है। नगरवासी देवी दन्तेश्वरी को शक्तिस्वरूप मानते हैं।

अत्रैव शक्तिस्वरूपा सतीमाई गादीमाई च विराजते। ग्रामदेवता ठाकुरदेवः अपि जनैः पूज्यते । सघनवनानां मध्ये प्रतिष्ठिता देवीकालिका खल्लारीग्रामान्तर्गतं विद्यते। अत्र आगन्तुकाः श्रद्धालुजनाः स्वकामना प्राप्त्यर्थं देवीं प्रार्थयन्ते देवी कालिका तेषाम् आकांक्षाः पूरयति

शब्दार्थाः -अत्रैव =यहाँ, प्रतिष्ठिता= प्रतिष्ठित, विद्यते = विद्यमान, पूरमति = पूरा होना, आगन्तुका =श्रद्धालुजन।

अनुवाद – यहाँ ही शक्तिस्वरूपा सतीमाई और गादीमाई विराजमान हैं। ग्रामदेवता ठाकुरदेवता भी लोगों के द्वारा पूजे जाते हैं। घने वनों के बीच प्रतिष्ठित देवी कालिका (कालीमाई) खल्लारी गाँव में विद्यमान हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालुजन अपनी कामना। की प्राप्ति के लिए देवी की प्रार्थना करते हैं। देवो कालिका उन सबकी आकांक्षा (मनोकामना) पूरी करती हैं।

देवीकालिका न केवलं छत्तीसगढ़ राज्ये प्रत्युत सर्वत्र प्रसिद्धा ।अत्र कर्णेश्वरधाम स्वविपुल सांस्कृतिकसम्पदाभिः परिपूर्णम् अस्ति। भौगोलिक, प्राकृतिक, आदिम, संस्कृति, पुरातात्विक सम्पदानां निधिः सप्तऋषीनां स्थली च इयं सिहावानगरी छत्तीसगढ़राज्ये अतिप्रसिद्ध।

शब्दार्था:- प्रत्युत = बल्कि, सर्वत्र= सब जगह, अत्र = यहाँ, सम्पदानां = सम्पदाओं का, निधिः = भंडार, इयं = यह, अति = बहुत।

अनुवाद-देवी कालिका न केवल छत्तीसगढ़ राज्य में बल्कि सब जगह प्रसिद्ध हैं। यहाँ कर्णेश्वरधाम अपनी विपुल सांस्कृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण है। भौगोलिक, प्राकृतिक, आदिम संस्कृति पुरातात्विक सम्पदाओं का भण्डार और सप्तऋषियों की स्थली यह सिहावा नगरी छत्तीसगढ़ राज्य में बहुत प्रसिद्ध है।

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