समय नियोजन कक्षा 6 हिन्दी

समय नियोजन 

हम अक्सर शिकायत किया करते हैं- समय के अभाव की, समय न मिलने की। पत्र का उत्तर न दे सका समयाभाव के कारण; कसरत नहीं कर सकता, समय न मिलने के कारण । किंतु यदि हम सही ढंग से आत्म-विश्लेषण करें तो हम पाएँगे कि हमारी ये शिकायतें अक्सर गलत होती हैं। हम अपने को समझ नहीं पाते और तभी ऐसी शिकायतें करते हैं यह हमारा आलस्य है, जो सदैव समय के अभाव की दहाई दिया करता है । वस्तुतः कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो व्यस्तताओं के बीच भी उन कामों को न कर सके, जिसे वह करने पर उतारू है, जिसे करना वह अनिवार्य मानता है ।

नेहरू जी कितना व्यस्त रहते थे ? भारत के प्रधानमंत्री के नाते उन पर कितना दायित्व था? कुछ दिन पहले उनके साथ काम करने वाले एक सज्जन से बात करने का सौभाग्य मिला । वे बताने लगे, नेहरू जी के पास रोज़ इतनी सारी फाइलें जाती थीं, किन्तु दूसरे दिन वे उन सभी को निपटाकर वापस भेज देते थे। जहाँ तक बस चलता, एक दिन भी देर न करते । ज़रा सोचिए उनकी व्यस्तता को, जो दिनभर न जाने कितने आदमियों से मुलाकात करते थे; कितनी गंभीर समस्याओं पर सहकर्मियों से विचार-विमर्श करते थे; कितनी सभा – सोसाइटियों में जाते थे फिर भी वे अपने व्यस्त जीवन में से कुछ समय अपने दैनिक व्यायाम और मनोरंजन के लिए भी निकाल ही लेते थे।

गाँधी जी भी कम व्यस्त नहीं रहते थे । दर्शनार्थियों की भीड़ तो उन्हें घेरे ही रहती, मुलाकातियों का भी ताँता लगा रहता । देश-विदेश के अनेक पेचीदे मामलों पर विचार-विनिमय होता, अखबारों के लिए लेख लिखे जाते किन्तु फिर भी न तो गाँधी जी की प्रार्थना सभा के समय में हेरफेर होता और न उनके प्रातः भ्रमण में ही बाधा आती थी। यही नहीं, दुनिया के कोने-कोने से भेजे गए पत्रों का जवाब भी वे अक्सर हाथ से ही लिखकर देते थे ।गाँधी जी और नेहरू जी दोनों का जीवन प्रमाणित करता है कि यदि हम अपने समय को सोच-समझकर विभाजित कर लें और फिर उस पर दृढ़ता से आचरण करें तो अपने निश्चित व्यवसाय के अतिरिक्त भी अन्य अनेक कार्यों के लिए हमें पर्याप्त समय मिल जाएगा। समय की कमी की शिकायत फिर कभी नहीं रहेगी। हाँ, इसके लिए हमें सतत् सचेष्ट और जागरूक अवश्य रहना पड़ेगा।

किसी ने ठीक ही कहा है- समय धन के समान है। अतः सावधानी और सतर्कता से हम अपने धन के हिसाब से समय के प्रति थोड़ी ज्यादा ही सावधानी बरतें । कारण, धन तो आता जाता है किंतु गया समय फिर वापस नहीं आता। समय का बजट बनाना जिसने सीख लिया, उसने जीने की कला सीख ली, सुख और समृद्धि के भंडार की कुंजी प्राप्त कर ली ।

हम जीवन में क्या चाहते हैं सुख, समृद्धि, शांति, यही न ! किंतु ये चीजें तभी मिल सकती हैं जब हम इनको पाने का निरंतर प्रयास करते चलें। यदि हम व्यायाम के लिए, चिंतन के लिए, अध्ययन के लिए समय नहीं निकाल पाएँगे तो हमारा तन-मन कैसे स्वस्थ और सबल बन सकेगा? विषम परिस्थितियों में भी हम अपना संतुलन के से बनाए रख सकेंगे । अतः जीवन को सही अर्थ में सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम इन सभी की साधना में रोज़ कुछ-न-कुछ समय लगाएँ यह तभी संभव हो सकेगा जब हम अपने समय का ठीक विभाजन कर लें, रोज़ उसका लेखाजोखा करते रहें वस्तुतः जो समय की कद्र करना सीख गया, वह सफलता का रहस्य समझ गया हम अपने सुख, अपनी समृद्धि के लिए अपना समय-विभाजन जितना शीघ्र कर लें उतना ही अच्छा होगा क्योंकि किसी मनीषी ने यह चेतावनी पहले ही दे रखी है कि समय और लहरें किसी की प्रतीक्षा में खड़ी नहीं रहतीं।

वयस्कों की अपेक्षा विद्यार्थियों के लिए समय पालन का कई कारणों से अधिक महत्व है। विद्यार्थियों को एक लंबा जीवन जीना है और सफलता की ऊँची-से-ऊँची मंजिलें तय करनी हैं। दूसरी बात यह है कि विद्यार्थी जीवन में जो आदतें पड़ जाती हैं, वे जीवन पर्यंत बनी रहती हैं । विद्यालयों में छात्रों को समय तालिका दी जाती है लेकिन वह केवल 5-6 घंटों के लिए होती है । 18-19 घंटे छात्रों के स्वयं विवेकपूर्ण उपयोग के लिए रहते हैं। यदि वे इस समय का सही उपयोग करें तो वे न केवल परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होंगे, बल्कि सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा खेलकूद, व्यायाम आदि के लिए भी पर्याप्त समय निकाल सकेंगे समय तालिका बनाने के बाद उसका दृढ़ता और निष्ठा के साथ पालन करना भी आवश्यक है। निर्धारित समय पर निश्चित काम करने से ही जीवन में सफलता मिलती है।

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