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आधुनिक यूरोप का उदय कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान भाग 1 इतिहास

आधुनिक यूरोप का उदय कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान भाग 1 इतिहास

 इतिहास मानव के सम्पूर्ण क्रियाकलाप और घटनाओं का एक निरंतर चलने वाला क्रम है। इसलिए जानकारी, समझ, अध्ययन और अध्यापन आदि की सरलता के लिए इतिहासकारों ने विश्व इतिहास को तीन कालों में विभाजित किया है, जो निम्नानुसार है :

  • 1. प्राचीन काल
  • 2. मध्य काल
  • 3. आधुनिक काल

यह विभाजन विभिन्न देशों में एक निश्चित और लम्बी अवधि तक चलने वाले राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक ढाँचे में शामिल हो रही नवीन प्रवृत्तियों के आधार पर किया गया है।

आधुनिक काल की विशेषताएँ

1. तर्क एवं बुद्धिवाद –

इस युग में व्यक्ति किसी तथ्य को तब स्वीकार करता था जब वह उसे तर्क की कसौटी पर प्रमाणित पाता था। इसके कारण यूरोप में विज्ञान का विकास हुआ ।

2. मानववाद

इस युग में मानव की उन्नति और भौतिक सुखों को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। ऐसा माना गया कि मनुष्य में उन्नति करने और एक उन्नत समाज का निर्माण करने की अपरिमित क्षमता है।

3. नवीन अन्वेषण

आधुनिक काल में भौगोलिक खोजों, विज्ञान की प्रगति, औद्योगिक क्रांति एवं नवीन राजनीतिक, सामाजिक विचारधाराओं की शुरुआत हुई।

यूरोप में जहाँ 15 वीं और 16वीं शताब्दियों के बीच आधुनिक काल का आरंभ हुआ, वहीं भारत में आधुनिक काल का उदय 18वीं शताब्दी में हुआ । इसका मतलब यह है कि सम्पूर्ण विश्व में आधुनिक काल का उदय एक साथ नहीं हुआ। विश्व के इस आधुनिक काल का इतिहास जानने के लिए हमें उन तमाम साधनों की जानकारी होना भी जरूरी है, जिन्हें हम इतिहास के स्रोत कहते हैं।

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इतिहास के स्रोत

पृष्ठभूमि

पंद्रहवीं शताब्दी तक यूरोप के सामाजिक जीवन पर सामंतों तथा धर्म गुरुओं का वर्चस्व था, जिनकी तुलना में राज- सत्ता (राजा) निर्बल थी। इनके शोषण और दमन से साधारण जनता त्रस्त थी। ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था, इसलिए ईश्वर और परलोक से जुड़ी बातों पर ज्यादा महत्व दिया जाता था।

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ईसाइयों के धर्मगुरु पोप फ्रांसिस

14वीं शताब्दी में ही यूरोप के इस मध्यकालीन ढाँचे पर प्रहार किए जाने लगे थे। अब मानव के वर्तमान जीवन के दुःख दर्दों पर ज्यादा मनुष्य की सोचने व तर्क करने की शक्ति पर विश्वास करना, प्रचलित पारम्परिक विचारों तर्क के आधार पर समीक्षा करने लगे तथ्यों की तह तक जाना और तब स्वयं निर्णय लेना कि क्या और लोगों को बुद्धिनिष्ठा का महत्व समझाने लगे।

बुद्धिनिष्ठा का अर्थ है : ध्यान दिया जाने लगा। इस समय के प्रबुद्ध विचारक समाज में शिक्षा देने लगे कि "विश्व को अपनी खुली आँखों से देखो और जो बुद्धि को स्वीकार हो उसे ही मानो।"

यूरोप का पुनर्जागरण

वैचारिक क्रांति –

पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप में पुनर्जागरण अर्थात् वैचारिक क्रांति का आरंभ हुआ। ग्रीक, लैटिन आदि भाषाओं के प्राचीन ग्रंथों का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद तथा नए सिरे से अध्ययन होने लगा। छपाई की मशीन का आविष्कार होने के कारण पुस्तकें अधिक संख्या में आसानी से और कम कीमत पर लोगों को उपलब्ध होने लगीं। फलतः ज्ञान का प्रसार तेजी से हुआ।

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छपाई की मशीन का आविष्कार

प्राचीन ज्ञान एवं नवीन विचारों के अध्ययन से वैचारिक क्रांति को प्रेरणा मिली। प्राचीन ग्रंथों में निहित बुद्धि निष्ठा, भौतिक जीवन के महत्व का बोध आदि बातें यूरोप में पुनः जड़ें पकड़ने लगीं।

इस दृष्टिकोण ने साहित्य, चित्रकला, शिल्पकला, विज्ञान आदि सभी विधाओं को प्रभावित किया। कलाकार अपनी कलाकृतियों में देवी-देवताओं, देवदूतों के स्थान पर मनुष्य की भावनाओं एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण करने लगे।

कोपर्निकस तथा गैलिलियो जैसे खगोल वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड के बारे में प्रचलित सिद्धांतों का खंडन करके नए सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, जैसे सूर्य नहीं घूमता बल्कि पृथ्वी सूर्य – के चारों ओर चक्कर लगाती है। इन सबका परिणाम यह हुआ कि धार्मिक मान्यताओं पर आधारित विचार प्रभावित होने लगे तथा धर्म सुधार आंदोलन का सूत्रपात हुआ

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कोपर्निकस
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गैलिलियों

धर्म सुधार आन्दोलन

मध्यकालीन यूरोपीय समाज पर रोमन कैथोलिक चर्च का अत्यधिक नियंत्रण था। ईसाई धर्म ग्रंथ बाईबिल लेटिन भाषा में लिखा गया था। सामान्य लोग इस लेटिन भाषा को नहीं समझते थे। लोगों के इस अज्ञानता का अनुचित लाभ उठाते हुए ईसाई धर्म गुरु कर्म-कांडो को बढ़ावा देते व धर्म के नाम पर लोगों का शोषण करते थे। धर्म-संस्थाओं में भ्रष्टाचार का बोलबाला था। इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध यूरोप में जो आंदोलन आरंभ हुआ, उसे धर्म सुधार आंदोलन कहा जाता है।

उन दिनों के विचारकों ने धर्म-संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचारों के विरुद्ध आवाज बुलंद की। बाईबिल का अनुवाद स्थानीय भाषाओं में किया गया ताकि सामान्य लोग अपने धर्म-ग्रंथों को स्वयं पढ़ सकें ।

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मार्टिन लूथर नामक जर्मन धर्मगुरु

मार्टिन लूथर नामक जर्मन धर्मगुरु ने धार्मिक संस्थाओं के दुराचारों की निंदा करते हुए एक खुला वक्तव्य जारी किया, जिसमें उसने जनता से कहा आप लोगों को धर्म गुरुओं के कथन को ही धर्म न मानकर स्वयं बाईबिल पढ़ना चाहिए और धर्म के तत्वों को समझना चाहिए। उसने ईसाई धर्म गुरु के प्रमुख पोप की निरंकुश सत्ता को चुनौती दी और धर्म व्यवस्था में प्रचलित दोषों का विरोध ( प्रोटेस्ट) किया। इसलिए उसके अनुयायियों को प्रोटेस्टेंट कहा जाने लगा। धर्म सुधार आंदोलन के फलस्वरूप पोप के दबदबे में कमी आई। पोप के वर्चस्व से परेशान यूरोप के कुछ शासकों ने भी पोप का वर्चस्व मानने से इंकार कर दिया। इनमें इंग्लैण्ड का राजा हेनरी अष्टम भी एक था। इस तरह धर्म सुधार आंदोलन ने यूरोप में आधुनिक विचारों का सूत्रपात कर को सम्भव बनाया।

राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय राजतंत्रों का उदय

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में सामंतों की सत्ता का लोप होने लगा और राजाओं का महत्व बढ़ने लगा। एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में लंबे समय से निवास करने वाले, समान भाषा, ऐतिहासिक परंपरा, राजनीतिक तथा आर्थिक हित संबंधों वाले लोगों में राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बन गया। धीरे-धीरे सारी सत्ता राजा के हाथों में केन्द्रित हो गई और वह प्रबल हो गया। इन सब कारणों से यूरोप में राष्ट्रीय राजतंत्रों का उदय हुआ। इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन आदि राष्ट्रीय राज्य अस्तित्व में आए। इन राष्ट्रीय राज्यों का उदय आधुनिक युग की महत्वपूर्ण विशेषता है।

यूरोप का एशिया के साथ व्यापार

नवजागरण के साथ ही महान खोज – यात्राओं का युग भी आरंभ हुआ ।

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जल और थल दोनों ही मार्गों से भारत तथा यूरोप के मध्य व्यापार

भारत और यूरोप देशों के व्यापारिक संबंध बहुत पुराने थे। जल और थल दोनों ही मार्गों से भारत तथा यूरोप के मध्य व्यापार होता था ।

पहला मार्ग –

फारस की खाड़ी से जुड़ा समुद्री मार्ग था जिससे इराक, तुर्क (टर्की), वेनिस और जिनेवा (इटली) के साथ व्यापार होता था

दूसरा मार्ग-

मध्य एशिया से मिश्र होकर यूरोप के लिए जानेवाला थल मार्ग था ।

इस प्रकार यूरोप के सभी क्षेत्रों में भारत की वस्तुओं के वितरण के लिए वेनिस और जिनेवा प्रमुख व्यापारिक केन्द्र थे । इटली ने भारत की प्रमुख वस्तुओं के व्यापार पर अपना अधिकार जमाए रखने के लिए यूरोपीय शक्तियों की हिस्सेदारी समाप्त कर दी। वहीं 1453 ई. में कुस्तुनतुनियाँ (इस्तम्बोल) पर तुर्की ने अधिकार कर लिया।

नए मार्गों की खोज

इस्तम्बोल नगर यूरोप एवं भारत के व्यापारिक मार्ग का मुख्य द्वार था। यूरोपीय व्यापारियों को भारत पहुँचने के लिए एशिया के इसी मार्ग से होकर गुजरना पड़ता था, किन्तु इस्तम्बोल पर तुर्की कब्जे के बाद यूरोप से भारत को जोड़नेवाला यह एकमात्र व्यापारिक थल मार्ग बंद हो गया। अरब व्यापारी अब एशियाई देशों से मूल्यवान रत्न, उत्तम श्रेणी के सूती तथा रेशमी वस्त्र, शक्कर इत्यादि यूरोप ले जाते थे। यह माल इटली के जिनेवा, वेनिस मिलान इत्यादि शहरों में उतारा जाता था जहाँ से यूरोपीय व्यापारी उस माल को भारी चुंगी देकर खरीदते थे और यूरोप के विभिन्न बाजारों में ले जाकर बेचते थे। यूरोप में इन वस्तुओं की बड़ी माँग थी। लेकिन व्यापारी अब अरब के व्यापारियों को हटाकर, भारत से सीधा व्यापार करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने नए व्यापारिक मार्गों की खोज करना आरंभ कर दिया। इस कार्य में यूरोप के कई महत्वाकांक्षी शासकों एवं रानियों ने भी उन्हें पर्याप्त सहयोग प्रदान किया।

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कुतुबनुमा (दिशाओं का ज्ञान करनेवाला यंत्र)

कुतुबनुमा (दिशाओं का ज्ञान करनेवाला यंत्र) के आविष्कार के बाद नाविकों ने कुतुबनुमा की सहायता से लम्बी-लम्बी समुद्री यात्राएँ कीं भारत की खोज में निकले इटली के नाविक कोलम्बस ने यूरोप से अमेरिका पहुँचने वाले समुद्री मार्ग की खोज की तथा पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा अपनी लम्बी जलयात्रा के दौरान अफ्रीका के दक्षिणी छोर (उत्तमांशा अंतरीप या Cape of good hope) से होते हुए 20 मई सन् 1498 ई. को भारत के पश्चिमी समुद्रतट पर कालीकट (केरल) बंदरगाह तक पहुँच गया।

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पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा अपनी लम्बी जलयात्रा के दौरान

व्यापारिक स्पर्धा –

इन नए भूभागों का पता लगते ही पुर्तगाली एवं अन्य यूरोपीय व्यापारी वहाँ आने लगे इस व्यापार से उन्हें भारी लाभ होने लगा। सोलहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा हॉलैंड भी इस स्पर्धा में उतर पड़े। उन्होंने भी अपनी सामुद्रिक शक्ति बढ़ाई और अपने नाविकों को लम्बे समुद्री अभियानों पर जाने के लिए प्रोत्साहित किया। फलस्वरूप यूरोपीय राष्ट्रों के बीच व्यापारिक स्पर्धा आरंभ हो गई।

व्यापारवाद का उदय-

सत्रहवीं शताब्दी में विदेशी व्यापार यूरोप की अर्थ व्यवस्था का प्रमुख घटक बन गया तथा व्यापार में वृद्धि करना शासकों की प्रमुख नीति बन गई। व्यापार वृद्धि के साथ-साथ यूरोप के व्यापारी वर्ग के पास अपार धन एकत्र होने लगा ।

 व्यापार द्वारा अपने राष्ट्र को अधिकाधिक संपन्न बनाना व अन्य राष्ट्रों को मात देना । शासकों ने इसके लिए अपने व्यापारियों को चुंगी में छूट सहित कई रियायतें दीं। इस आर्थिक नीति को "व्यापारवाद" कहा जाता है।

व्यापारिक कंपनी की स्थापना-

व्यापारियों को विदेशी व्यापार से अपार लाभ तो थे, मगर इसमें उनके लिए कठिनाइयाँ और खतरे भी कम नहीं थे। इन कठिनाइयों से बचने के लिए व्यापारी कारीगरों को काम देने तैयार माल इकट्ठा करने, माल का भंडारण करने जैसे अनेक कामों को सामूहिक रूप से करने में मदद देने लगे। इस प्रकार व्यापारिक कंपनियों की स्थापना आरंभ हुई। सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में व्यापार के लिए भारत आई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी लंदन के कुछ व्यापारियों द्वारा मिलकर स्थापित की गई कंपनी थी । हालैंड, फ्रांस आदि यूरोपीय देशों में भी इस प्रकार की व्यापारिक कंपनियों की स्थापना हुई।

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व्यापारिक कंपनियों की स्थापना

यूरोप में व्यापार वृद्धि के परिणाम

यूरोप के व्यापार में हुई। तीव्र वृद्धि के परिणाम स्वरूप वहाँ के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में अनेक परिवर्तन हुए। जो निम्नलिखित है

आर्थिक प्रभाव –

यूरोपीय अर्थव्यवस्था में व्यापार तथा उद्योगों का महत्व बढ़ने लगा मध्यकाल में प्रचलित वस्तु विनिमय की पद्धति के स्थान पर सोने, चाँदी के सिक्के आर्थिक लेन-देन के माध्यम बन गए। अब लंदन, ब्रिस्टल जैसे अनेक नए व्यापारिक केन्द्रों का उदय हुआ। व्यापार के लिए पूँजी उपलब्ध करानेवाले बैंकों की संख्या में वृद्धि हुई । व्यापार में अधिकाधिक पूँजी का विनियोजन होने लगा। जहाज निर्माण जैसे व्यापार से जुड़े अनेक नवीन उद्योगों का प्रारंभ हुआ । व्यापार एवं उद्योगों में अपार वृद्धि के कारण लाभ की मात्रा में भी वृद्धि हुई। फलस्वरूप यूरोपीय राष्ट्र अधिक सम्पन्न और समृद्ध होने लगे ।

सामाजिक प्रभाव –

व्यापारियों से संबंधित अनेक व्यावसायों की वृद्धि के फलस्वरूप समाज में बैंकर, दलाल, लिपिक, हिसाब लिखनेवाले जैसे व्यावसायिकों का एक वर्ग अस्तित्व में आया, जिसे मध्यम वर्ग कहा जाता है। कुशल कारीगर और निर्माता भी इस समुदाय में जुड़ते गए। यह वर्ग रूढ़ियों और परंपराओं के बंधन में जकड़ा हुआ नहीं था। यह वर्ग नवीन बातों को जानने के लिए उत्सुक था। इस तरह मध्यम वर्ग आधुनिक सामाजिक-व्यवस्था की रीढ़ बन गया ।

राजनैतिक प्रभाव –

व्यापार वृद्धि का प्रभाव यूरोप के राजनैतिक क्षेत्र पर भी पड़ा। व्यापारी वर्ग ने अपने ही हित के लिए राजसत्ता का समर्थन किया तो व्यापारियों को देश की सम्पन्नता का आधार मानकर शासकों ने भी व्यापारियों को हर संभव सहायता प्रदान की। इससे देश में व्यापारी वर्ग को महत्व और प्रतिष्ठा प्राप्त होने लगी। व्यापारी वर्ग की बढ़ती प्रतिष्ठा के साथ ही यूरोप में सामंतवाद का पतन भी आरंभ हुआ और एक नई व्यवस्था, जिसे पूँजीवाद कहते हैं, अस्तित्व में आने लगी। यही आधुनिक युग की प्रमुख विशेषता थी। इसने पूँजीपति और मध्यमवर्ग के अलावा तीसरे और बहुसंख्यक श्रमिक वर्ग को जन्म दिया। पूँजीपति, उत्पादन हेतु आवश्यक कच्चे माल के तथा कारखानों में मशीनों से तैयार होनेवाली वस्तुओं के मालिक थे, जिनका मुख्य उद्देश्य था मुनाफा कमाना वस्तुओं की बिक्री पर भी उन्हीं का नियंत्रण था । श्रमिक लोग वस्तुओं का उत्पादन करते थे और पूँजीपतियों से वेतन प्राप्त करते थे

अब व्यापारिक समुदाय ने उत्पादन प्रणाली में सुधार किया, ताकि कम समय में ज्यादा वस्तुएँ तैयार की जा सकें। पहले कारीगर अपने सामान्य औजारों से अपने घरों में अपने परिवार के सदस्यों की मदद से काम करते थे। उन्हें आवश्यक कच्चा माल व्यापारियों से प्राप्त होता था । किन्तु यह धीमी घरेलू व्यवस्था बाजार की लगातार बढ़ती माँग की पूर्ति करने में समर्थ नहीं थी । अठारहवीं सदी की नवीन कारखाना व्यवस्था में कारखाने का मालिक पूँजी लगाकर बड़ी मात्रा में कच्चा माल खरीदता था। नई मशीनों की मदद से कारीगरों को काम पर लगाकर वस्तुएँ तैयार करता था और वही उन्हें बाजार में बेचता था

श्रमिक अब घरों में नहीं बल्कि निश्चित वेतन पर कारखानों में काम करते थे। सबसे पहले इंग्लैंड में इस नई व्यवस्था का उदय हुआ। मशीनों का उपयोग भी सबसे पहले इंग्लैंड में हुआ सूत कताई की मशीन, नए किस्म के करघों और भाप की शक्ति से चलनेवाले इंजन के आविष्कार के कारण इंग्लैंड में सूती कपड़ों के उत्पादन में खूब वृद्धि हुई । मानवीय श्रम अथवा पशुबल से चलनेवाली मशीनें अब भाप की शक्ति से चलनेवाली मशीनें बनीं।

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भाप की शक्ति से चलनेवाले इंजन के आविष्कार

भाप की शक्ति से पानी के जहाजों को तेज गति से चलाना संभव हुआ और यातायात आसान हुआ।

विकास के इस नए दौर को, कारखानों में मशीनों की मदद से वस्तुओं के बेहिसाब उत्पादन को औद्योगिक क्रांति का नाम दिया गया।

आधुनिक यूरोप का उदय

18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैंड से शुरू हुई इस औद्योगिक क्रांति ने अन्य यूरोपीय देशों की उत्पादन प्रणाली को भी प्रभावित किया। आगे चलकर बिजली तथा धमन-भट्टी जैसे आविष्कारों ने लोहे की ढलाई जैसे मुश्किल काम को आसान बना दिया। इस तरह नए-नए आविष्कारों और साधनों ने औद्योगिक क्रांति को अधिक प्रभावी बना दिया। तेज गति से कम समय में ज्यादा उत्पादन की क्षमता प्राप्त कर यूरोपीय देश अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति के लिए दूसरे देशों की ओर उन्मुख हुए।

उपनिवेशों की स्थापना –

यूरोपीय लोगों ने सर्व प्रथम अमेरिका महाद्वीप के सम्पन्न प्रदेशों को हस्तगत किया और वहाँ अपने उपनिवेश स्थापित किए। स्पेन ने मुख्यतः दक्षिणी तथा मध्य अमेरिका में अपनी सत्ता स्थापित की। इंग्लैंड ने उत्तरी अमेरिका में अटलांटिक महासागरों के तटवर्ती भागों में अपने उपनिवेश बसाए दक्षिण पूर्व एशिया में इंडोनेशिया पर डचों ने भारत पर सर्व प्रथम पुर्तगालियों ने तदनंतर अँग्रेजों, डचों एवं फ्रांसीसियों ने कब्जा जमाया तथा आगे चलकर अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में भी यूरोपवासियों ने अपने उपनिवेश स्थापित किए। अपने उद्योगों के लिए अधिकाधिक कच्चा माल प्राप्त करने के लिए उन्होंने उपनिवेशों पर मनमाने प्रतिबंध लगाए। उनके कच्चे माल से अपने उद्योगों को चलाया और अपने तैयार माल को भी वापस उन्हीं देशों में ऊंची कीमतों पर बेचा। इस प्रकार उन्होंने उपनिवेशों के मूल निवासियों का दमन करके उनका अत्यधिक आर्थिक शोषण किया।

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1850 में यूरोप में औद्योगिक क्षेत्र का दृश्य
उपनिवेशों से संबंधित इस नीति को "उपनिवेशवाद" कहा जाता है।

यह उपनिवेशवाद यूरोपीय राष्ट्रों की व्यापार वृद्धि और व्यापारियों की बढ़ती धन-लिप्सा का ही परिणाम था । उपनिवेशवाद के दो बड़े परिणाम हुए –

  1. अधिकाधिक उपनिवेशों को हथियाने के लिए यूरोपीय राष्ट्रों में संघर्ष होने लगे, जो अंततः प्रथम विश्व युद्ध में बदल गए।
  2. अपने अधीनस्थ उपनिवेशों पर अधिकार जमाए रखने के लिए यूरोपीय शक्तियों ने वहाँ की जनता को अशिक्षित और पिछड़ा हुआ बनाए रखा, जिससे इन औपनिवेशिक राष्ट्रों के समग्र संसाधनों का न सिर्फ भरपूर शोषण हुआ, बल्कि वे अशिक्षा और पिछड़ेपन के गहरे गर्त में भी डूबते चले गए।

अभ्यास प्रश्न

1. उचित जोड़ियाँ बनाएँ

(1) कॉपरनिकस- खगोल वैज्ञानिक

(2) कोलम्बस- यूरोप से अमेरिका तक के समुद्री मार्ग की खोज

(3) मार्टिन लूथर -धर्म-व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचारों का विरोध

(4) हेनरी अष्टम- पोप के वर्चस्व को मानने से इंकार

2. प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1. छपाई कला के अविष्कार से क्या-क्या लाभ हुए ?

2. अरब व्यापारी क्या-क्या वस्तुएँ यूरोप के व्यापारियों को बेचते थे ?

3. मार्टिन लूथर के अनुयायियों को प्रोटेस्टेंट कहा जाता है। क्यों ?

4. यूरोपीय व्यापारियों ने व्यापारिक कंपनियों की स्थापना की। क्यों ?

5. मध्यम वर्ग आधुनिक सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ बन गया। क्यों ?

6. पुनर्जागरण का स्वरूप स्पष्ट कीजिए ।

7. औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप समाज में कौन-कौनसे तीन वर्ग प्रमुखता से अस्तित्व में आए ? इनकी स्थिति पर संक्षिप्त में प्रकाश डालिए ।

8. सामंतवाद का पतन किस तरह हुआ ?

9. व्यापार में वृद्धि का यूरोप पर क्या प्रभाव पड़ा ?

10. इस पाठ की उस बात का उल्लेख करें जिसने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया।

5. प्रयास कीजिए –

(1) विश्व के मानचित्र पर एशिया और अफ्रीका के पाँच अँग्रेजी उपनिवेशों को दर्शाइए

(2) शिक्षक विद्यार्थियों से उनके दादा-दादी और अन्य पारिवारिक सदस्यों के नए कुछ ऐसे फोटोग्राफ्स का संकलन करने को कहें जिनसे जुड़ी कुछ बातों का वे उल्लेख भी कर सकें।

(3) मार्टिन लूथर नामक जर्मन धर्मगुरु ने धार्मिक संस्थाओं की निंदा करते हुए एक खुला वक्तव्य जारी किया जिसमें उन्होंने जनता से कहा कि आप लोगों को धर्म गुरुओं के कथन को ही धर्म न मानकर स्वयं बाइबिल पढ़ना चाहिए और धर्म के तत्वों को समझना चाहिए । मार्टिन लूथर के इस कथन पर आपके क्या विचार हैं?

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