सिद्ध साहित्य के कवि

सिद्ध साहित्य के कवि

  • सरहपा- (769 ई.)- दोहाकोश
  • लुइपा (773 ई.लगभग)- लुइपादगीतिका
  • शबरपा (780 ई.) -१ चर्यापद , २ महामुद्रावज्रगीति , ३ वज्रयोगिनीसाधना
  • कण्हपा (820 ई. लगभग)- १ चर्याचर्यविनिश्चय. २ कण्हपादगीतिका
  • डोंभिपा (840 ई. लगभग)- १डोंबिगीतिका, २ योगचर्या, ३ अक्षरद्विकोपदेश
  • भूसुकपा- बोधिचर्यावतार
  • आर्यदेवपा – कावेरीगीतिका
  • कंवणपा – चर्यागीतिका
  • कंबलपा – असंबंध-सर्ग दृष्टि
  • गुंडरीपा – चर्यागीति
  • जयनन्दीपा – तर्क मुदँगर कारिका
  • जालंधरपा – १ वियुक्त मंजरी गीति, २ हुँकार चित्त , ३ भावना क्रम
  • दारिकपा – महागुह्य तत्त्वोपदेश
  • धामपा – सुगत दृष्टिगीतिकाचर्या

विशेष तथ्य:

  • बौद्ध धर्म के वज्रयान तत्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य देश भाषा (जनभाषा) में लिखा गया वही सिद्ध साहित्य कहलाता है|
  • सिद्ध साहित्य बिहार से लेकर आसाम तक फैला था |
  • राहुल संकृत्यायन ने 84 सिद्धों के नामों का उल्लेख किया है जिनमें सिद्ध ‘सरहपा’ से यह साहित्य आरंभ होता है |
  • बिहार के नालंदा एवं तक्षशिला विद्यापीठ इन के मुख्य अड्डे माने जाते हैं बाद में यह ‘भोट’ देश चले गए |
  • इनकी रचनाओं का एक संग्रह महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने बांग्ला भाषा में ‘बौद्धगान-ओ- दोहा’ के नाम से निकाला |
  • मुनि अद्वयवज्र तथा मुन्नी दत्त सूरी ने सिद्धों की भाषा को ‘संधा अथवा संध्या’ बादशाह के नाम से पुकारा है जिसका अर्थ होता है -कुछ स्पष्ट वह कुछ अस्पष्ट भाषा |
  • सिद्धों की भाषा में ‘उलटबासी’ शैली का पूर्व रुप देखने को मिलता है |
  • हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सिद्ध साहित्य की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि, ” जो जनता तात्कालिक नरेशों की स्वेच्छाचारिता, पराजय या पतंग से त्रस्त होकर निराशा के गर्त में गिरी हुई थी, उनके लिए इन सिद्धों की वाणी ने संजीवनी बूंटी का कार्य किया |
  • साधना अवस्था से निकली सिद्धों की वाणी ‘चरिया गीत/ चर्यागीत’ कहलाती है |

सिद्ध साहित्य की प्रमुख विशेषताएं:-

  • ⇒ इस साहित्य में तंत्र साधना पर अधिक बल दिया गया |
  • ⇒ साधना पद्धति में शिव शक्ति के युगल रूप की उपासना की जाती है |
  • ⇒ जाति प्रथा एवं वर्णभेद व्यवस्था का विरोध किया गया |
  • ⇒ इस साहित्य में ब्राह्मण धर्म एवं वैदिक धर्म का खंडन किया गया है |
  • ⇒ इसमें पंच मकार की दुष्प्रवृति देखने को मिलती है यथा-
    • मांस,
    • मछली,
    • मदिरा,
    • मुद्रा,
    • मैथुन |

 सिद्ध साहित्य के  तीन श्रेणी

1 नीति या आचार संबंधित साहित्य

2 उपदेश परक साहित्य

3 साधना संबंधी या रहस्यवादी साहित्य

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