Bharat Scout Guide

स्काउटिंग में भोजन बनाना व खुले में आग जलाना कैसे सीखें

स्काउटिंग में भोजन बनाना व खुले में आग जलाना कैसे सीखें

स्काउटिंग में भोजन बनाना व खुले में आग जलाना कैसे सीखें - hFoch3bzc9zScKQ7e9myv rWKiE7nqLGVk1sep1f3hMAbkH3UcEnpw336UxBC9YVyJR9HdjJefZGlORmW GEtSFxFiWJCkcQjhjhJ7OYxw7WZU2eg51OV EE8Gnhll4t7Z9fZxT JJ5HWtnU6Gq6RUHTE6XjsN6i98fJH8xe4jqG8S3lPjlaMN8 m3BZSlPm7bb2YyfCeUOS14Cw401YZiKdD1a3rH2Lx WOuxEAd5D3OByZc6tn kOuen hLH3eZBaXo8cIPpRbIhF7NZD2Rn HCaDk03vxbWwbHMukb7pGlNX C0KeWjSELY2Q2Tt3IylvZfvO97ODLCrhZ3b3GqqBGYwJBA9zotHMN1ieAgVIjYFR1Bs1yL4tQUs Fj5Ls3ZKl5pzRBPYzgwPyNytCMGZbiyyuEYlWbdEmHqHXakVrw Blhoz 3qdPs5L 49YEwfOA4iQIquxINVTK0ClDGeZgYsRq8aUtIo93 FI3ABFAW1kcUqrcj CikaFRKBoOWs7fjUkJvAEWChDNget7kP2sr zC1Px9e4jl7vGrQcwlET3Zaey ar QOKgOYsVf7sSuCitOOVTLHdQwoFIi 8au pyWzytWe4IJzzP ETylEnZbVsufJpLz8JobIvB4tnQfoD gDMgaytM0it9KcVfSSuiYURemyrbokP4ZhpuVIz7EftZjGvKyCiU0fG8Gz70M6M4yFyLB4xG3etBgMZROUEd0DgTKRDGtx54CUxa xnzge8gmscc8ZkAGr8X zus5ymsIp87ZMQNIRr0Gt63F0QmwUhqa2d1qS ZPqtRkgDd5TPeKhH7PK5 nr4T9MmcaC Fy1JaOif8rrNX50a97U5v9tJm8jJqwsXdFmk7hIl9zk qngUFNtF bPzQi58YV8jDlS7GwgysLz8565l 2Lr GtcZmkDJZ2VqQS4=w960 h480 no?authuser=0 - हिन्दी माध्यम में नोट्स संग्रह

स्काउट में आग (Fire) का उपयोग कैसे करें

भारतीय संस्कृति में अग्नि को देवता की संज्ञा दी गई है। क्षितिज, जल, पावक, गगन, समीर- इन पाँच तत्वों में पावक को महत्वपूर्ण स्थान है। यह मानव का परम मित्र है किन्तु जब कभी इसके साथ असावधानी की जाती है तो यह विनाश लीला भी कर बैठती है। अग्नि एक पवित्र तत्व है। प्रातः सायं पूजा-पाठ में दीपक जलाना, धूप अगरबत्ती जलाना, हवन आदि कार्य भारतीय जनमानस की दैनिक प्रक्रिया है। अग्नि को साक्षी मानकर पति-पत्नी इसके सम्मुख सात फर लगा कर जीवन पर्यन्त वैवाहिक पवित्र बन्धन में बंध जाते हैं।


हमारा भोजन अग्नि में ही पकाया जाता है। गरीब घरों में आग तापकर ऊष्मा प्राप्त की जाती है, साधु-सन्यासी अग्नि के सहारे ही जीते हैं। आधुनिक युग में आग जलाने के लिये माचिस या लाइटर का प्रयोग होता है, किन्तु प्राचीनकाल में जब उक्त वस्तुओं का आविष्कार नहीं हुआ था तो लोग आग जलाने के लिये अनेक प्राकृतिक साधनों का प्रयोग किया करते थे। भारत में एक लोहे. के टुकड़े (अगेला) से एक सख्त सफेद पत्थर (डांसी) पर चोट (रगड़) मारकर चिंगारियां पैदा की जाती थी जिन्हें त्वरित ज्वलनशील तृणों (बुकीला) पर बिठाकर तथा उसके बाहर कपड़ा लपेटकर आग जला ली जाती थी। आस्ट्रेलिया में एक लकड़ी की छड़ को नरम लकड़ी के छेद में घुमाकर आग उत्पन्न की जाती है। बोर्नियों के लोग एक गेली को चमकदार बेंत से चीरकर आग उत्पन्न कर लेते है । रेड इण्डियन धनुष और तकले से आग उत्पन्न कर लेते हैं।


स्काउट गाइड भी आग जलाने के प्राकृतिक श्रोतों का प्रयोग करते हैं। वे सूर्यताप को लैंस से केन्द्रित कर अग्नि प्रज्वलित कर लेते हैं। आग जलाने के पूर्व आसपास की सफाई करना आवश्यक है। घास-फूस व सूखे पत्ते हटाकर ऐसे स्थान पर आग जलानी चाहिए जो हवा के रुख के विपरीत हो। आग जलाते समय शीघ्र आग पकड़ने वाले पदार्थ तैयार रखने चाहिए। यदि भूमि नम हो तो कुछ लकड़ियां आयताकार या वर्गाकार या त्रिभुजाकार रखकर बीच में पिरामिड की शक्ल में पतली व शीघ्र जलने वाली रख दें।

शीघ्र आग पकड़ने वाली पतली लकड़ियों, पत्तियों या घास पर माचिस की तिल्ली से आग सुलगा दें। स्काउट/गाइड एक या दो तिल्लियों से आग जला लेने में सक्षम होते हैं। आग जलाते समय माचिस की तिल्ली मजबूती से रगड़ते हुए जल जाने पर कुछ देर तक अपने दोनों हाथों के मध्य में रखना चाहिए। अच्छी तरह तिल्ली के जल जाने पर उसे घास-फूस पर लगाना चाहिए। हवा की विपरीत दिशा में बैठकर माचिस जलायें। यदि हवा तेज हो तो तुरन्त कागज या कपड़े पर तिल्ली से आग जलायें।

आग जलाने की विधि के अनुसार आग को विविध नामों से पुकारा जाता है-

प्राचीनकाल में भारत में आग को काउन्सिल फायर, फ्रेंडली फायर, सिगनल फायर तथा कुकिंग फायर इन चार नामों से पुकारा जाता था। आजकल आग जलाने की निम्नलिखित विधियाँ प्रचलित हैं-

1. फाउन्डेशन फायर (Foundation Fire)-

तीन मोटी लकड़ियों से त्रिभुजाकार आकृति बनाकर मध्य में शीध्र जलने वाली पतली लकड़ियां व घास रख कर उनके बाहर से लकड़ियां इस प्रकार खड़ी कर दी जाती है कि शीर्ष पर शंकु बन जायें। इस तरह का आग एक बिन्दु पर तीव्रतर होती है।

2. स्टार फायर (Star Fire)-

लकड़ी के मोटे लट्ठों को तीन दिशाओं से एक बिन्दु पर मिलाकर जला दिये जाने से स्टार फायर बन जाती है। इस प्रकार की आग शिविर में रातभर जलती रहेगी और रोशनी भी देगी।

3. रिफ्लेक्टर फायर (Reflector Fire)

लगभग 4 फीट के फासले पर 6 इंच मोटी दो, 4 फीट लम्बी लकड़ियां भूमि में गाड़ दें। भूमि से ऊपर इन दो लकड़ियों के सहारे एक के ऊपर एक रख कर सामने आयताकार मोटी लकड़ियां रखकर मध्य में आग जला दें। टैन्ट को गर्म रखने तथा गीली लकड़ियों को सूखने में रिफ्लेक्टर फायर उपयोगी होती है।

4. ट्रेंच फायर (Trench Fire)-

भूमि में एक नाली खोद कर लट्ठों को जला दिया जाता है। इन लट्ठों के ऊपर बर्तन रखकर भोजन पकाया जा सकता है। इस प्रकार की आग से कोयले भी तैयार किये जाते हैं। कोयले बनाने के लिये नाली को अधिक चौड़ाकर उसमें कई लठे जला दिये जाते हैं। उन्हें अधजला कर बुझा दिया जाता है।

5. जिप्सी फायर (Gypsy Fire )-

चक्र की तिल्लियों की तरह लकड़ियां रखकर जला दी जाती है जिनके केन्द्र में बर्तन रखकर चाय अथवा भोजन पकाया जाता है।

6. हन्टर फायर (Hunter Fire) –

दो मोटे लट्ठों के बीच पतली लकड़ियां रखकर आग जला दी जाती है। उनके ऊपर बर्तन रखकर भोजन पका लिया जाता है।

7. अल्टर फायर-

भूमि पर पूर्व-पश्चिम दिशा में दो मोटी लकड़ियां एक दूसरे से कुछ फासले पर रखें। इनके ऊपर उत्तर दक्षिण दिशा में एक दूसरे से सटाकर दूसरी तह लगायें। आवश्यकतानुसार तीसरी-चौथी तहें लगाते चलें। सबसे नीचे मोटी लकड़ियों की तह हो।
उत्तरोतर पतली लकड़ियों की तह लगाई जाये। ऊपरी तह पर टी. पी. फायर की एक या दो ढेरी बनायें। शिविराग्नि के विशेष अवसर पर यह फायर आकर्षक लगती है।

8. टी. पी. या विगवार्म फायर (Tepee or Wigwarm Fire )-

चारों ओर पत्थरों का गोलाकार बाड़ा बनाकर मध्य में लकड़ियां खड़ी कर जला दी जाती है। इस प्रकार की आग में पानी या चाय शीघ्र उबाली जा सकती है।

9. क्रिसक्रास फायर (Crisscross Fire).

दो मोटी लकड़ियों को कुछ फासले पर रखकर उनके ऊपर सटाकर लकड़ियों की परत लगा दें। विपरीत दिशा में आवश्यकतानुसार परतें लगाते चलें।

10. पिरामिड फायर (Pyramid Fire) –

मोटी लकड़ियां नीचे रखकर आयत बना लें। ऊपर को आयताकार में लकड़ियां रखते चलें।
हवन के लिये इस प्रकारकी आग उपयुक्त रहती है।
उपरोक्त के अतिरिक्त देशी चूल्हा, भट्टी, धुआँ रहित चूल्हा, मघन चूल्हा, चिमनी आदि भी आग जलाने की हमारी अनेक विधियाँ प्रचलित हैं।


खुले में आग जलाना ( Fire )

( a ) कैम्प में अथवा बाहर प्रयोग में लाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की आग के बारे में जानें ।

( b ) खुले में अधिकतम दो तिल्लियों द्वारा लकड़ी की आग जला सके ।

स्काउट / गाइड को खुले में आग जलाने का तरीका आना चाहिए । हाइक व शिविर में खाना व नाश्ता पकाने के लिए आग जलाने की आवश्यकता पड़ती है । मितव्ययता की दृष्टि से स्काउट गाइड खुले में भी एक या दो तिल्लियों से ही आग जलाने का अभ्यास करें ।


इसके लिए पहले हवा के रुख को देखें । तेज हवा चल रही हो तो सामने स्वयं आड़ लेकर बैठे या बाल्टी आदि रख लें । पहले मोटी लकड़ियों में सीधे आग न लगायें । थोड़े सूखे पत्ते , कागज , सूखी टहनी या लकड़ी के छिलके एकत्रित करके उनमें आग लगाएं । आग जल जाने पर पहले पतली व बाद में मोटी लकड़ी लगाएं ।

भोजन बनाना ( Cooking )

( a ) कैरोसीन प्रेशर स्टोव अथवा गैस स्टोव की कार्य प्रणाली व संभाल जानें ।

( b ) खुले में दो व्यक्तियों के लिए पर्याप्त दो प्रकार का सामान्य भोजन तथा चाय या कॉफी बना सके ।

( c ) गैस लीक ( रिसाव ) होने की स्थिति में सुरक्षा उपाय जानते हों ।

भोजन की स्वच्छता परम आवश्यक है। भाज्य पदार्थ ठीक प्रकार से पानी में धोकर पकाये और खाये जायें। खाना पकाने के बर्तन तथा खाना खाने का स्थान स्वच्छ हो। घर में गन्दगी जूता से आती है। अतः जूत बाहर अलग स्थान पर रखे जायें। मक्खी, मच्छर, चूह, काक्रोच आदि को भोज्य पदार्थों से दूर रखा जाये। खाना खाते समय हल्क व स्वच्छ वस्त्र धारण करना लाभकारी है। भोजन करने से पूर्व और बाद में साबुन से ठीक प्रकार से हाथ धोने तथा कुल्ला करना चाहिए।

भोजन के प्राप्ति के स्रोत व कार्य

प्रोटीन

स्त्रोत-दूध, अण्डा, गोश्त, मछली, मटर, दालें, तरकारी, सोयाबीन आदि।
कार्य – शरीर तन्तुओं का निर्माण और उनकी क्षतिपूर्ति करना।
* जीव द्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) का निर्माण करना।
पाचक रसों तथा नलिका विहीन ग्रन्थियों के रसों का निर्माण करना।
* शरीर में रोग निवारक शक्ति उत्पन्न करना।

कार्बोहाइड्रेट

तत्व – कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन 1:2 के अनुपात में
स्त्रोत- आलू, चावल, गेहूँ, ज्वार, मक्खन, साबूदाना, अखरोट, चीनी, मटर, गाजर आदि।
कार्य – शरीर को शक्ति व ऊष्मा देना।
यकृत ग्लूकोज को मधुजन में परिवर्तित कर देना।
* आवश्यकता पड़ने पर मधुजन को पुनः ग्लूकोज में परिवर्तित कर देना।

फैट्स/वसा या चिकनाई-

तत्व – कार्बन और 2:1 में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन।
स्त्रोत – घी, तेल, मक्खन, पनीर आदि।
कार्य-शरीर तथा मांसपेशियों को ऊष्मा प्रदान करना।

खनिज लक्षण (मिनरल्स)-

ये दो प्रकार के होते हैं – कैल्शियम लवण व लौह लवण।

कैल्शिम लवण-

स्त्रोत- हरी तरकारी, संतरा, पनीर, दूध आदि।
कार्य – अस्थि निर्माण तथा दांतों के लिए आवश्यक है।
* स्नायुओं को शक्ति प्रदान करता है।

लौह लवण-

स्त्रोत- पालक, गाजर, हरी सब्जियाँ आदि।
कार्य- रक्त की लाल कोशिकाओं का बनाना।
* पित्त को शक्ति देना।

जल-

शरीर में 70 प्रतिशत जल की मात्रा है। अतः जल पर्याप्त मात्रा में शरीर को प्रतिदिन मिलना चाहिए, एक दिन में लगभग 4 किलो जल लेना चाहिए। जल को भोजन के मध्य में तथा अन्त में कम लेना चाहिए। इससे भोजन की ऊष्मा कम हो जाती है। भोजन के दो-तीन घण्टे बाद खूब जल पीना चाहिए।
स्त्रोत- दूध, मट्ठा, फलों का रस, रसदार सब्जी व फल ।
कार्य-शरीर के तापमान को बढ़ने से रोकता है।

विटामिन:-

ये जीवन दायक तत्व है। ये छः प्रकार के होते हैं:-A B C D E and K

विटामिन’A’

स्त्रोत – दूध, मक्खन, गाजर, टमाटर, पालक आदि।
कार्य- शरीर की वृद्धि, आँखों की रोशनी में वृद्धि, रोगों से बचाव तथा पाचन क्रिया में सहायक है। इसके अभाव में रतौंधी का रोग, त्वचा का शुष्क होना, यकृत की पथरी आदि रोग हो सकते हैं

विटामिन’B’

इस वर्ग में विटामिन B1 B2 B6 B12 विशेष हैं।
स्त्रोत – चावल के छिलके में विशेषकर होता है।
कार्य – पाचन शक्ति की स्थिरता व हृदय और मस्तिष्क की थकान रोकने में सहायक होते हैं। इसकी कमी से भूख कम लगना, चक्कर आना, बेरी-बेरी रोग तथा स्नायु दुर्बल हो जाते हैं।

विटामिन ‘C’

स्त्रोत- ताजे फल जैसे- नींबू, संतरा, मौसमी, अन्नानास, अकुरित दालें आदि।
कार्य- यह रक्त वाहिनियों को स्वस्थ रखता है, दाँतों को मजबूत करता है,
कोशिकाओं को एक जगह रखने में सहायक होता है तथा खासी, जुकाम, निमोनियाँ आदि से रक्षा करता हैं।

विटामिन’D

स्त्रोत-ऊषाकाल की सूर्य की किरण, दूध, मक्खन आदि।
कार्य-
– यह हड्डियों को मजबूत करता है सूखे की बीमारी तथा खाँसी से बचाता है

विटामिन E’

स्त्र ोत -गेहूँ के अंकुर, पत्तीदार सब्जी आदि।
कार्य – यह प्रजनन क्रिया में सहायक है।

विटामिन’K

स्रोत – पालक, फूलगोभी, दूध आदि।
कार्य- चोट लगने पर रक्त को जमाने में सहायक है।

विटामिन की तुलना मकान बनाने वाले कारीगर से की जा सकती है। मकान बनाने के लिये पत्थर, रेत, ईट, सीमेन्ट, लोहा, लकड़ी, पानी आदि की आवश्यकता होती है किन्तु कारीगर के अभाव में मकान नहीं बन सकता। ठीक उसी प्रकार भोजन के आवश्यक तत्वों से रक्त मांस बनाने का कार्य विटामिन करते है। इनके अभाव में आदि भोजन-तत्व अछूते रह जाते हैं। अतः इन सभी तत्वों की एक निश्चित मात्रा प्रत्येक व्यक्ति के लिये आवश्यक है। एक सस्ते पर संतुलित भोजन में विभिन्न तत्वों की मात्रा लगभग निम्न सारिणी के अनुसार होनी चाहिए। जिसमें देशकाल, मौसम, आयु के अनुसार थोड़ा बहुत अन्तर हो सकता है।

भोजन करते समय निम्नलिखित बातों पर अमल करना चाहिए:-
1. भोजन :-देश-काल, ऋतु, आयु तथा आवश्यकतानुसार किया जाना चाहिए।
2. भोजन निश्चित समय पर करना चाहिए। एक, भोजन लगभग छः घण्टे में पच जाता है। अतः दूसरा भोजन छः घण्टे के अन्तराल पर अवश्य करना चाहिए, इससे पूर्व नहीं। भूख से अधिक खाने से पाचन शक्ति गड़बड़ा जाती है। भोजन खूब चबाकर खाना चाहिए। चटपटे, अधिक पके, मसालेदार व तेलयुक्त भोजन स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हैं।
3. भोजन करते समय पालथी मारकर या कुर्सी पर बैठना चाहिए।
4. भोजन के बाद भली प्रकार कुल्ला करना चाहिए। दातुन करना भी श्रेष्ठ है। दोपहर के भोजन के बाद थोड़ा आराम – 8 साँस चित लेटकर, 16 दाहिनी करवट, 5-10 बांयी करवट लेटकर लेनी चाहिए। सायंकाल के भोजन के पश्चात् कुछ कदम (लगभग एक किलोमीटर) अवश्य घूमना चाहिए।
5. भोजन करते समय मन में उत्तम विचार लाना तथा बातें कम करनी चाहिए।

स्काउट/गाइड के लिये भोजन बनाना अनिवार्य

स्काउट/गाइड के लिये भोजन बनाना इस लिये अनिवार्य किया गया है कि वे बचपन से ही उसे बनाना सीखें। शिविर में टोलीवार भोजन बनाने से प्रत्येक सदस्य को भोजन बनाने की जानकारी हो जाती है तथा उनमें आत्मनिर्भरता का भाव आता है। अपने आप बनाये भोजन से संतोष व स्वाद प्राप्त होता है और बचत भी होती है। दूसरों के द्वारा पकाये गये भोजन में अनेक नुक्ताचीनी की जाती है। अशुद्धता, कच्चापन व अपव्यय की शिकायत बनी रहती है।

शिविर, रैली, जम्बूरी में जो टोलियां भोजन स्वयं बनाकर खाती है वे अधिक स्वस्थ और सक्रिय रहती है, इससे उनके विद्यालय स्काउट/गाइड कोष की भी बचत होती है। जिन विद्यालयों के स्काउट गाइड भोजन का खर्च भी विद्यालय से वहन कराते हैं वे एक दो शिविर या रैलियों में भाग लेकर ठण्डे पड़ जाते हैं। अतः विद्यालय कोष का प्रशिक्षण सामग्री, साहित्य, मार्ग-व्यय, शिविर शुल्क, हाइक आदि के लिये उपयोग किया जाना चाहिए। भोजन व्यवस्था की पूर्ण जिम्मेदारी स्काउट/गाइड को स्वयं वहन करनी चाहिए।

प्रत्येक स्काउट/गाइड को सब्जी, रोटी, चावल, दाल, सलाद, चटनी, चाय, कॉफी,नाश्ता बनाना तथा भोजन परोसना आना चाहिए। यही नहीं उन्हें कम से कम बर्तनों से अधिक से अधिक भोज्य पदार्थ बनाना भी आना चाहिए।

स्काउट में बिना बर्तन भोजन कैसे बनायें

मनुष्य जीवन में कभी ऐसी भी स्थिति आ जाय कि उसके पास मात्र कुछ राशन जैसे-आटा, चावल, दाल, आलू, प्याज, बैंगन, नमक हो किंतु कोई पकाने का बर्तन न हो तो क्या वह बिना कुछ खाये सो जाऐगा ऐसी स्थिति फौज में अथवा पर्वतरोहण में आ जाती है। प्राचीन काल में तो शिकारी अपने शिकार की खोज में जंगलों में भटक जाते थे और उन्हें किसी सुरक्षित स्थान जैसे ऊँची चट्टान या पेड़ पर रात गुजरानी पड़ती थी। ऐसी स्थिति में शरीर में ऊर्जा बनाये रखने के लिये भोजन आवश्यक हो जाता है।

स्काउट/गाइड बिना बर्तनों के भी अपना खाना तैयार कर लेते हैं और पर्याप्त भोजन पा लेते हैं।
बिना बर्तन के वे देश-काल-परिस्थितियों का अवलोकन कर संसाधन जुटा लेते हैं अथवा किसी पत्थर को साफ कर उस पर आटा गूंथ लेते हैं। अब कोई ऐसी लकड़ी जैसे बांस या फलदार अथवा जिससे कोई नुकसान न हो, ऐसी लकड़ी को छीलकर, धोकर उसमें आटे की लम्बी लड़ बनाकर उस लकड़ी पर लपेट कर जली हुई आग पर पका लेते हैं। उसे घुले पत्तल में रखते जाते हैं। आलू को कोयलों में पकाकर उसका बाहरी छिलका हटाकर नमक डाल कर सब्जी के रूप में खा सकते हैं

राजस्थान की बाटी और चूर्मा प्रसिद्ध भोज्य पदार्थ है। आटे की बाटी बनाकर गोबर के सूखे कण्डों की आग में आटे की लोई बनाकर उसके भीतर आग से भुने आलू मसलकर उसमें नमक, मिर्च व प्याज की बारीक कतरन डालकर बाटी बनाई जा सकती है। उसकी राख हटाकर अथवा जलने पर बाहरी परत हटाकर बाटी का आनन्द लिया जा सकता है। यदि स्लेटी पत्थर उपलब्ध हो तो उस पर तवे की भांति रोटियाँ भी बनाई जा सकती हैं।

चावल व दाल पकाना हो तो किसी साफ कपड़े की पोटली तैयार करें, चावल या दाल को धो लें। पोटली में रखकर पानी में कुछ देर तक भीगने दें। अब पास में एक गड्ढा खोदें। उसमें नीचे और चारों ओर पत्ते रख दे। चावल या दाल की पोटली उसमें रख दें। पत्ते ऊपर से भी बिछा दें, उसके ऊपर मिट्टी चढ़ाकर ढक दें और ऊपर से खूब आग जलायें। कुछ समय बाद गमी से दाल या चावल पक जायेंगे। तो वहाँ पर एक या डेढ़ घंटे लग सकते हैं। आग हटाकर और मिट्टी-पत्ते हटाकर पोटली बाहर निकालें । उसे दोनें या पत्तल में रखकर खा सकते हैं। इसी प्रकार आप खिचड़ी या तहरी भी बना सकते हैं। दोनों में पानी भी गर्म किया जा सकता है?

स्काउट में मिट्टी के तेल का स्टोव या गैस स्टोव से भोजन कैसे पकाएं

स्काउट/गाइड को शिविर अथवा हाइक में उन्हें ठीक प्रकार मिट्टी के तेल के स्टोव या गैस स्टोव जलाना आना चाहिए। जंगल में जहां सूखी लकड़ी उपलब्ध हो उसमें खाना बनाया जा सकता है।

शिविर अथवा रैलियों में स्काउट/गाइड स्वय खाना बनाते हैं। अतः प्रत्येक स्काउट/गाइड का खुले में दो प्रकार का भोजन, जिसमें सब्जी-रोटी या दाल-रोटी अथवा दाल-भात (दाल-चावल) बनाना आना चाहिए तथा चाय कॉफी भी बना सके।

जो बच्चे अपने घरों में खाना बनाने में सहयोग करते हैं। उन्हें शिविरों में खुले में भोजन तैयार करने में कोई कठिनाई नहीं होती, घर पर गैस चूल्हें पर भोजन पकाना आसान है जबकि खुले मैदान में जहाँ हवा चल रही हो, धूप हो, वहाँ खाना पकाना कठिन कार्य है।


भोजन बनाने से पूर्व अनेक बातों का ध्यान रखना चाहिए। कितने लोग खाने वाले हैं। उस हिसाब से आटा, चावल, दाल, मसाले, तेल आदि की मात्रा को ध्यान में रखना होगा। नमक, मिर्च कितना हो, पानी की मात्रा उस चीज को पकाने में कितनी होगी, वह चीज पक गई है या अभी कच्ची है, चाय या कॉफी बनाते समय पानी, चाय पत्ती, चीनी, कॉफी की मात्रा पर विशेष ध्यान देना होगा।

प्रत्येक व्यक्ति को भोजन बनाना सीखना चाहिए। जीवन में कभी ऐसे अवसर भी आ जाते हैं, जब भोजन बनाना पड़ सकता है। इस कला को बचपन में सीखना आसान है। स्काउट/गाइड पाककला में प्रवीण होते हैं। घर में वे अपने माता-पिता, भाई-बहिन हाथ बंटाते रहते हैं और उनके प्रिय बन जाते हैं। बड़े और अन्य कुटुम्बी जनों होकर वे अपने परिवार की समय बेसमय मदद कर उन्हें सुख पहुंचाते हैं।

आधुनिक युग में जहां पत्नी भी नौकरी करती हो, वह दोहरा बोझ कैसे सह सकती है? अतः पुरुष वर्ग के लिये भोजन बनाना और घर के अन्य कामों में हाथ बटाना एक आनवायता बनती जा रही है। जिन घरों में नौकरी कर रही पत्नी की मदद नहीं की जाती वहां किन्तु एकल परिवार में तो पुरुष द्वारा भोजन, चाय तथा घर के अन्य कार्यों में पली तनाव, कलह और अशांति रहती है। संयुक्त परिवारों में तो यह बात खप सकती है, की मदद को अनिवार्य कर दिया है। कल्पना कीजिये किसी एकल परिवार में जहां दो बच्चे स्कूल जाते हों यदि पत्नी बीमार पड़ जाय तो क्या दशा होगी उस परिवार की। बच्चों को शायद भूखा ही सो जाना पड़ेगा।

Leave a Comment

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

error: Content is protected !!