कविता क्या है -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

कविता क्या है -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

  • कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है।
  • रागों या वेगस्वरूप मनोवृत्तियों का सृष्टि के साथ उचित सामन्जस्य स्थापित करके कविता मानव जीवन के व्यापकत्व की अनुभूति उत्पन्न करने का प्रयास करती है।
  • सृष्टि के नाना रूपों के साथ मनुष्य की भीतरी रागात्मिका प्रकृति का समान्जस्य ही कविता का लक्ष्य है।
  • काव्य के व्यापक आदर्श से केशव की लीक पीटनेवाले ‘कविन्दो’ में ही नहीं है, प्रत्युत उनसे पहले के वास्तविक काव्य, महाकाव्य, आख्यानकाव्य रचने वाले बड़े बड़े कवियों में भी पाई जाती है। वाल्मीकि के वर्षा और शरद् के विशद वर्णन को गो. तुलसीदास जी के वर्णनों से मिलाने से यह बात समझ में आ जायेगी।
  • कविता हमारे मनोभावों को उच्छ्वसित करके हमारे जीवन में एक नया जीवन डाल देती है; हम सृष्टि के सौंदर्य को देख कर मोहित होने लगते हैं; कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है; हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है। इस प्रकार कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
  • अमुक देश तुम्हारा इतना रुपया प्रतिवर्ष उठा ले जाता है; इसी से तुम्हारे यहाँ अकाल और दारिद्रय बना रहा है, तो सम्भव है कि उस पर कुछ प्रभाव न पड़े। पर यदि दारिद्रय और अकाल का भीषण दृश्य दिखाया जाए, पेट की ज्वाला से जले हुए प्राणियों के अस्थिपंजर कल्पना के सम्मुख रखे जायें और भूख से तड़पते हुए बालक के पास बैठी हुई माता का आर्त स्वर सुनाया जायेतो बहुत से लोग क्रोध और करुणा से विह्नल हो उठेंगे और इन बातों को दूर करनेका यदि उपाय नहीं तो संकल्प अवश्य करेंगे। पहले प्रकार की बात कहना राजनीतिज्ञका काम है और पिछले प्रकार का दृश्य दिखाना कवि का कर्तव्य है।
  • कविता के द्वारा हम संसार के सुख, दु:ख, आनन्द और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव करने में अभ्यस्त होते हैं जिससे हृदय की स्तब्धाता हटती है और मनुष्यता आती है।
  • मेरी समझ में केवल मनोरंजन उसका साध्य नहीं है। मनोरंजन करना कविता का वह प्रधान गुण है जिससे वह मनुष्य के चित्त को अपना प्रभाव जमाने के लिए वश में किए रहती है, उसे इधर उधर जाने नहीं देती।
  • कविता अपनी मनोरंजक शक्ति के द्वारा पढ़ने या सुननेवाले का चित्त उचटने नहीं देती, उसके हृदय के मर्म स्थानों को स्पर्श करती है और सृष्टि में उक्त कर्मों के स्थान और सम्बन्ध की सूचना देकर मानवजीवन पर उनके प्रभाव और परिणाम विस्तृत रूप से अंकित करके दिखलाती है।
  • मन को अनुरंजित करना और उसे सुख पहुँचाना ही यदि कविता का धर्म माना जाए तो कविता भी केवल विलास की सामग्री हुई।
  • हिन्दी भाषा के अनेक कवियों ने ऋंगार रस की उन्मादकारिणी उक्तियों से साहित्य को इतना भर दिया है कि कविता भी विलास की एक सामग्री समझी जाने लगी है।
  • कविता का काम भक्ति, श्रद्धा, दया, करुणा, क्रोध और प्रेम आदि मनोवेगों को तीव्र और परिमार्जित करना तथा सृष्टि की वस्तुओं और व्यापारों से उनका उचित और उपयुक्त सम्बन्ध स्थिर करना है।
  • कविता मनुष्य के हृदय को उन्नत करती है और ऐसे ऐसे उत्कृष्ट और अलौकिक पदार्थों का परिचय कराती है जिनके द्वारा यह लोक देवलोक और मनुष्य देवता हो सकता है।
  • कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता अवश्य होगी।
  • कविता यही प्रयत्न करती है कि शेष प्रकृति से मनुष्य की दृष्टि फिरने न पावे। जानवरों को इसकी जरूरत नहीं।
  • कविता सृष्टि सौंदर्य का अनुभव कराती है और मनुष्य को सुन्दर वस्तुओं में अनुरक्त और कुत्सित वस्तुओं से विरक्त करती है।
  • कविता सौंदर्य और सात्विकशीलता या कर्तव्यपरायणता में भेद नहीं देखना चाहती। इसी से उत्कर्ष-साधना के लिए कवियों ने प्राय: रूपसौंदर्य और अंत:करण के सौंदर्य का मेल कराया है। राम का रूपमाधुर्य और रावण का विकराल रूप अंत:किरण के प्रतिबिंब मात्र हैं।
  • जो लोग स्वार्थवश व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं वे सरस्वती का गला घोंटते हैं।
  • कविता उच्चाशय, उदार और नि:स्वार्थ हृदय की उपज है।
  • सत्कवि मनुष्यमात्र के हृदय में सौंदर्य का प्रवाह बहानेवाला है।
  • श्रीमानों के शुभागमन की कविता लिखना और बात बात पर उनको बधाई देना सत्कवि का काम नहीं। हाँ, जिसने नि:स्वार्थ होकर और कष्ट सहकर देश और समाज की सेवा की है, दूसरों का हितसाधन कियाहै, धर्म का पालन किया है ऐसे परोपकारी महात्मा का गुणगान करना उसका कर्तव्यहै।
  • कविता में कुछ न कुछ पुराने शब्द आ ही जाते हैं उनका थोड़ा बहुत बना रहना अच्छा भी है। वे आधुनिक और पुरातन कविता के बीच सम्बन्धसूत्रा का काम देते हैं। हिंदी में “राजते हैं”, “गहतेहैं”, “लहते हैं”, “सरसाते हैं” आदि प्रयोगों का खड़ी बोली तक की कविता में बना रहना कोई अचम्भे की बात नहीं।
  • कविता में कही गई बात चित्र रूप में हमारे सामने आती है, संकेत रूप में नहीं। अत: उसमें गोचर रूपों का ही विधान अधिकतर होता है।
    ‘समय बीता जाता है’ कहने की अपेक्षा ‘समय भागा जाता है।’ कहना अधिक काव्यसंगत है।
  • कविता प्राकृतिक व्यापारों को कल्पना द्वारा प्रत्यक्ष कराती है-मानव हृदय पर अंकित करती है।
  • जब कोई कवि किसी दार्शनिक सिध्दांत को अधिक प्रभावोत्पादक बनाकर उसे लोगों के चित्त पर अंकित करना चाहता है तब वह जटिल और परिभाषिक शब्दों को निकालकर उसे अधिक प्रत्यक्ष और मर्मस्पर्शी रूप देता है।

आगम का अज्ञान ईश का परम अनुग्रह।-पोप

  • श्रुतिसुखदता
  • भावसौंदर्य और नादसौंदर्य दोनों के संयोग से कविता की सृष्टि होती है।
  • नाद-सौंदर्य के साथ भाव-सौंदर्य भी होना चाहिए। हिंदी के कुछ पुराने कवि इस नाद-सौंदर्य के इतना पीछे पड़ गए थे कि उनकी अधिकांश कविता विकृत और प्राय: भावशून्य हो गई है।
  • आज कल के कुछ समालोचक इतना चिढ़ गए हैं कि ऐसी कविता को एकदम निकाल बाहर करना चाहते हैं। किसी को अत्यानुप्रास का बंधन खलता है; कोई गणात्मक छंदों को देखकर नाक भौं चढ़ाता है; कोई फारसी के मुखम्मस और रुबाई की ओर झुकता है। हमारी छंदोरचना तक की कोई कोई अवहेलना करते हैं-वह छंदोरचना जिसके माधुर्य को भूमंडल के किसी देश का छंदशास्त्रा नहीं पा सकता और जो हमारी श्रुतिसुखदता के स्वाभाविक प्रेम के सर्वथा अनुकूल है।
  • जो लोग अत्यानुप्रास की बिल्कुल आवश्यकता नहीं समझते उनसे मुझे यही पूछना है कि अत्यानुप्रास ही पर इतना कोप क्यों? छंद और तुक दोनों ही नाद-सौंदर्य के उद्देश्य से रखे गए हैं। फिर क्यों एक निकाला जाए दूसरा नहीं? यदि कहा जाए कि सिर्फ छंद ही से उस उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है तो यह जानने की इच्छा बनी रहती है कि क्या कविता के लिए नादसौंदर्य की कोई सीमा नियत है।
  • यदि किसी कविता में भावसौंदर्य के साथ नादसौंदर्य भी वर्तमान हो तो वह अधिक ओजस्विनी और चिरस्थायिनी होगी।
  • नादसौंदर्य कविता के स्थायित्व का वर्ध्दक है, उसके बल से कविता गंन्थाश्रयविहीन होने पर भी किसी न किसी अंश में लोगों की जिह्ना पर बनी रहती है।
  • नादसौंदर्य  कविता की आत्मा नहीं तो शरीर अवश्य है।
  • शब्दों को चुनते समय प्रसंग या अवसर का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। जैसे, यदि कोई मनुष्य किसी दुर्धार्ष अत्याचारी के हाथ से छुटकारा पाना चाहता हो तो उसके लिए-”हे गोपिकारमण!” “हे वृंदावन बिहारी!” आदि कहकर कृष्ण को पुकारने की अपेक्षा ‘हे मुरारि!’ ‘हे कंसनिकंदन!’ आदि सम्बोधानों से पुकारना अधिक उपयुक्त है।
  • स्वयं काव्यप्रकाश के कर्ता मम्मटाचार्य ने बिना अलंकार के काव्य का होना माना है और उदाहरण भी दिया है-”तददोषौ शब्दार्थौ सगुणवनलंकृती पुन: क्वापि”।
  • अलंकारों ही में काव्यत्व मान लेने से कविता अभ्यासगम्य और सुगम प्रतीत होने लगी। इसी से लोग उनकी ओर अधिक झुक पड़े। धीरे-धीरे इन अलंकारों के लिए आग्रह बढ़ने लगा, यहाँ तक कि चंद्रालोककार ने लिख डाला-

अंगीकरोति य: काव्यं शब्दार्थवनलंकृती।

असौ न मन्यते कस्माददुष्णमनलंकृती।।

अर्थात्-जो अलंकाररहित शब्द और अर्थ को काव्य मानता है वह अग्नि को उष्णतारहित क्यों नहीं मानता? किन्तु यथार्थ बात कब तक छिपाई जा सकतीहै।

  • विचारशील लोगों पर यह बात प्रकट हो गई कि रसात्मक वाक्यों ही का नाम कविता है और रस ही कविता की आत्माहै।
  • जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार धारण करने से सुन्दर नहीं हो सकती उसी प्रकार अस्वाभाविक, भद्दे और क्षुद्र भावों को अलंकारस्थापना सुन्दर और मनोहर नहीं बना सकेगी।
    महाराज भोज ने भी अलंकार को ‘अलमर्थमलंकर्तु’ अर्थात् सुन्दर अर्थ को शोभित करने वाला ही कहा है। इस कथन से अलंकार आने के पहले ही कविता की सुन्दरता सिद्ध है।
  • ‘विकल्प’ अलंकार को पहले पहल राजानक रूय्यक ने ही निकाला है। अब कौन कह सकता है कि काव्यों के जितने सुन्दर सुन्दर स्थल थे सब ढूँढ डाले गए, अथवा जो सुन्दर समझे गए-जिन्हें लक्ष्य करके लक्षण बने-उनकी सुन्दरता का कारण कही हुई वर्णनप्रणाली ही थी।
  • अलंकारलक्षणों के बनने के बहुत पहले कविता होती थी और अच्छी होती थी। अथवा यों कहना चाहिए कि जबसे इन अलंकारों को हठात् लाने को उद्योग होने लगा तब से कविता कुछ बिगड़ चली।

(हिंदी निबंध माला, दूसरा भाग, ना. प्र. सभा वाराणसी 1922 ई.)

प्रातिक्रिया दे