भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान भाग 1 इतिहास

भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान भाग 1 इतिहास

ब्रिटिश शासन की नीतियों का भारतीय जनजीवन के कृषि वन, शिक्षा, दस्तकारी, शिल्प आदि क्षेत्रों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा, जिसके कारण सन् 1765 से 1856 के बीच भारत के विभिन्न भागों में बहुत-से विद्रोह हुए। इनमें से सन्यासी, बहावी, पोलिगर, संथाल, मोपला के विद्रोह प्रमुख हैं। ये विद्रोह असंगठित एवं सीमित क्षेत्रों में थे। इसलिए अंग्रेजों की शक्तिशाली सेना द्वारा इन्हें आसानी से कुचल दिया गया। 1857 में जो विद्रोह हुआ वह नियोजित एवं व्यापक क्षेत्र में फैला हुआ था। इसमें ज्यादातर भारतीय समाज के किसान, कारीगर, जमीदार एवं पुराने रजवाड़ों के नवाब आदि वर्गों के लोग शामिल हुए जो ब्रिटिश शासन की नीतियों से असंतुष्ट थे।

1857 के विद्रोह के पूर्व अंग्रेजों की नीतियों से पुराने शासक एवं जनता त्रस्त थी अँग्रेजों ने भारतीय राजाओं से सहायक संधियाँ की थीं, पर जनता उसका पालन अपनी मर्जी के अनुसार ही किया करती थी। राजाओं में डलहौजी की विलय नीति के प्रति बड़ा असंतोष था इनमें झाँसी, पूना तथा अवध प्रमुख राज्य थे। इनके असंतोष के प्रमुख कारण इस प्रकार थे

  1. झाँसी के मृत राजा के दत्तक पुत्र को डलहौजी ने उत्तराधिकारी नहीं माना और 1853 में झाँसी राज्य पर अँग्रेजों ने कब्जा कर लिया।
  2. 1851 में पेशवा बाजीराव की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसके दत्तक पुत्र नानाजी साहब पेशवा को मिलनेवाले पेंशन को अँग्रेजों ने बंद कर दिया।
  3. अवध के नवाब वाजिद अली शाह पर कुशासन का आरोप लगाकर उसके राज्य को छीन लिया गया।
  4. अंग्रेजों की नई लगान – व्यवस्था से जमीदारों, भूमि स्वामियों की शक्ति समाप्त हो गई।

अँग्रेजों की इन नीतियों से शासक, सैनिक, जमीदार, भूमिस्वामी, कारीगर आदि सभी वर्ग के लोग प्रभावित हुए। जिससे उनमें असंतोष की भावना बलवती होने लगी ।

किसानों और दस्तकारों की बदतर हालत –

अँग्रेजों की विभिन्न भू-राजस्व नीतियों के परिणामस्वरूप किसानों की हालत पहले से ही खराब थी। उन्हें साहूकारों से कर्ज लेना पड़ा था। साहूकार बड़ी कठोरता से कर्ज वसूलते थे। किसानों को उसके लिए अपनी जमीन-जायदाद को भी बेचना पड़ा। इससे किसान बेरोजगार हो गए। इस प्रकार आम लोगों में कंपनी शासन के प्रति असंतोष की भावना पनपने लगी। इसके अतिरिक्त कंपनी की पक्षपातपूर्ण चुंगीकर नीति के कारण भारतीय दस्तकार एवं शिल्पी भी बेरोजगार हो गए थे। इससे उनमें भी असंतोष की भावना पनपने लगी थी।

भारतीयों की नागरिक एवं सैनिक सेवाओं में उपेक्षा

अँग्रेजों की नीतियों के कारण भारतीयों की कृषि, उद्योग एवं व्यापार की अवनति हुई साथ ही अँग्रेजों ने भारतीयों को अपने ही देश की ऊँची एवं महत्वपूर्ण पदों, नौकरियों से वंचित रखा। भारतीयों को न्यायिक, सैनिक एवं नागरिक सेवाओं में केवल छोटे पदों पर ही रखा जाता था। भारतीय रजवाड़े नष्ट हो गए। इससे उन पर आश्रित सैनिक, कर्मचारी, दस्तकार आदि सभी बेरोजगार हो गए थे।

सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों का विरोध –

कंपनी शासकों ने भारतीय समाज में प्रचलित सती प्रथा बालिका वध के विरोध में तथा विधवा विवाह के पक्ष में नए कानून बनाए। इन सामाजिक बुराइयों को दूर करने का विचार भारतीय शिक्षित वर्ग ने दिया था, लेकिन इन कानूनों का समाज के रूढ़िवादी वर्ग ने भारी विरोध किया । ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार से रूढ़िवादी चिंतित थे। उन्होंने इनका विरोध किया। इन सबके परिणाम स्वरूप भारतीय जनमानस में अँग्रेजी शासन के प्रति शंका एवं अविश्वास की भावना बढ़ती गयी।

भारतीय सैनिकों में असंतोष –

अंग्रेजी सेना के अधिकांश सैनिक भारतीय किसान परिवार से आए हुए थे। इनमें बंगाल के सैनिक अपनी वफादारी के लिए प्रसिद्ध थे । अँग्रेज सैनिक अधिकारी भारतीय सैनिकों को हेय दृष्टि से देखते थे। भारत की ब्रिटिश सेना में भारतीय सिपाहियों का अनुपात 1:5 से अधिक था । सेना में उन्हें अधिक ऊँचा पद नहीं दिया जाता था। गोरे सैनिकों की तुलना में इनका वेतन कम था । भारतीय सैनिकों को तिलक लगाना, दाढ़ी रखना, पगड़ी बाँधना जैसे पारम्परिक कार्यों पर प्रतिबंध था। उन्हें युद्ध के लिए समुद्रपार कर अन्यत्र भेज दिया जाता था जबकि समुद्रपार करना उन दिनों धर्म के विरुद्ध माना जाता था। इससे भारतीय सेना में असंतोष छाने लगा। 1856 में भारतीय सैनिकों को एनफील्ड रायफल एवं नए कारतूस प्रयोग के लिए दिए गए। इन कारतूसों को खोलने के लिए दांतो से काटना पड़ता था। सैनिकों को आशंका थी कि नए कारतूसों में गाय या सुअर की चर्बी मिली हुई थी जिसके कारण उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस लगती थी ।

असंतोष का दावानल –

29 मार्च 1857 की बात है जब कलकत्ता के निकट बैरकपुर की फौजी छावनी में सेना की परेड चल रही थी। इसी समय सेना के एक सिपाही मंगल पांडे ने नए बंदूक जिसकी कारतूस में चर्बी लगे हुए थे, का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। अँग्रेज अधिकारी हृयूसन ने उसे इन बंदूकों व कारतूसों के प्रयोग करने का आदेश दिया किंतु मंगल पांडे ने आदेश नहीं माना, तो उसे गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया गया। तब क्रोध में आकर मंगल पांडे ने हृयूसन पर गोली चलायी। उसने पास खड़े अन्य अँग्रेज अधिकारी पर भी गोली चला दी। देश के अन्य सैनिक छावनियों में विद्रोह जंगल की आग की तरह फैल गया। फलस्वरूप 10 मई 1857 को मेरठ छावनी की पूरी भारतीय पलटन ने विद्रोह कर दिया। उसने जेल में बंद अपने साथियों को छुड़ाकर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में हजारों लोग इन विद्रोहियों के साथ हो गए। खबर पाकर दिल्ली छावनी के भारतीय सिपाही भी इन सैनिकों के साथ आकर मिल गए। मुगल बादशाह बहादुरशाह जफ़र से नेतृत्व सँभालने का आग्रह किया गया।

विद्रोह के मुख्य केन्द्र

शीघ्र ही विद्रोह की आग उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, दिल्ली आदि स्थानों तक फैल गई। सैनिकों द्वारा प्रारंभ किए गए इस विद्रोह में स्थानीय किसान, कारीगर, जमीदार, राजा आम जनता भी शामिल हो गए।

विद्रोह का नेतृत्व

शीघ्र ही विद्रोही सेना ने दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया। दिल्ली में विद्रोह का नेतृत्व सम्राट बहादुर शाह जफर के हाथों में था किंतु इसका संचालन सेनापति बख्त खाँ ने किया। लखनऊ में अवध की बेगम हजरत महल, कानपुर में नाना साहब तथा तात्याटोपे, झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई, बिहार में कुँवरसिंह तथा रुहेलखंड में अहमद्दुल्ला ने विद्रोह का नेतृत्व किया। छत्तीसगढ़ में हनुमान सिंह एवं वीरनारायण सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया । यहाँ विद्रोह काफी व्यापक थे। इस विद्रोह में आम लोगों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने बड़ी वीरता से अँग्रेजों का सामना किया और वीरगति प्राप्त की। इस प्रकार उन्होंने आम जनता को अँग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की प्रेरणा दी।

छत्तीसगढ़ में विप्लव

रायपुर जिले के बलौदाबाजार के पास सोनाखान नामक स्थान है। वीर नारायण सिंह वहाँ के जमींदार थे। वे अपने जनहित कार्यों के फलस्वरूप लोकप्रिय थे। सन् 1856 ई. में सोनाखान में भयंकर अकाल पड़ा, लोग अन्न के अभाव में भूख से मरने लगे। लोगों की जीवन-रक्षा के लिए वीर नारायण सिंह ने एक व्यापारी के गोदाम में इकट्ठा कर रखे गये अनाज को जनता में बँटवा दिया। व्यापारी ने इसकी शिकायत अँग्रेज अधिकारी से की जिसके कारण वीरनारायण सिंह को गिरफ्तार कर रायपुर की जेल में बंद कर दिया गया। सन् 1857 ई. को वे रायपुर की जेल से भाग निकले। उन्होंने लगभग 500 किसानों की सेना संगठित कर ली। 1 दिसम्बर 1857 को अँग्रेजों की सेना के साथ वीर नारायण सिंह का मुकाबला हुआ। अँग्रेजों ने सोनाखान के पड़ोसी देवरी के जमींदार से मदद माँग ली। उसकी सहायता पाकर अँग्रेजों ने वीर नारायण सिंह को गिरफ्तार कर लिया। बाद में रायपुर लाकर दिखावे का मुकदमा चलाया और 10 दिसम्बर 1857 को उन्हें फाँसी दे दी गई। इस प्रकार देश की स्वाधीनता आंदोलन में यह महान सपूत शहीद हो गया।

शहीद वीर नारायण सिंह का त्याग और बलिदान व्यर्थ नहीं गया। रायपुर फौजी छावनी में मेग्जीन लश्कर हनुमान सिंह राजपूत थे। 18 जनवरी 1858 को उसने सिडवेल नामक अँग्रेज सैनिक अधिकारी की हत्या की और फरार हो गए। इस तरह उन्होंने रायपुर में स्वतंत्रता संघर्ष को जारी रखा, अँग्रेजों ने हनुमान सिंह के 17 साथियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार लोगों पर दो दिन मुकदमा चला। उन्हें सेना से बगावत करने एवं राजद्रोह करने के आरोप में 22 जनवरी 1858 को सैनिकों एवं जनता के समक्ष सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया गया। वे शहीद थे- सर्वश्री गांजी खाँ, शिवनारायण, गुलीन, अब्दुल हमात, पन्नालाल, मातादीन, बलिहू, ठाकुरसिंह, अकबर हुसैन, लालसिंह, परमानंद, बदलू, दुर्गाप्रसाद, शोभाराम नूर मोहम्मद, देवदीन एवं शिव गोविंद इस विद्रोह में सभी जाति व धर्म के लोग शामिल थे, इससे प्रमाणित होता है कि इस अंचल में राष्ट्रीय हित की भावना सर्वोपरि थी।

आंदोलन की असफलता

सन् 1857 ई. का विद्रोह भारत के व्यापक भू-भाग में हुआ। किंतु अँग्रेजों की सत्ता का अंत करने में सफल नहीं हो सका, इसके कई कारण थे। विद्रोहियों के बीच केन्द्रीय नेतृत्व का अभाव था । विद्रोहियों के पास पर्याप्त मात्रा में हथियार भी नहीं थे। इस समय के शिक्षित वर्ग एवं अधिकांश रजवाड़े विद्रोह में शामिल नहीं हुए। यह विद्रोह भारतीयों के लिए प्रेरणादायक सिद्ध हुआ। इससे भारतीय जनता में राष्ट्रीयता एवं चेतना का संचार हुआ। साथ ही अँग्रेजी शासन को भी गहरा धक्का पहुँचा।

इस विद्रोह से यह स्पष्ट हो गया कि भारतीयों के मन में ब्रिटिश सत्ता के प्रति व्यापक असंतोष की भावना है। लोगों के मन में यह भाव पैदा हो गया कि उनका देश कंपनी शासन के हाथों में सुरक्षित नहीं है। निःसंदेह यह भारतीयों का एक देशभक्तिपूर्ण परन्तु असंगठित विद्रोह था जिसका भय अँग्रेजों को सदैव सताता रहा। इसके फलस्वरूप भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद का विकास हुआ।

1858 का भारत सरकार अधिनियम

भारत की नाराज प्रजा को शांत करने के उद्देश्य से इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने 1 नवम्बर 1858 को एक घोषणा पत्र जारी किया जिसमें कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का शासन सीधे इंग्लैंड की संसद द्वारा संचालित करने की घोषणा की गई। भारतीय जनता के धार्मिक एवं सामाजिक पहलुओं के प्रति अहस्तक्षेप की नीति अपनाई गई। प्राचीन परम्पराओं का संरक्षण एवं सम्मान का आश्वासन दिया गया। सैद्धांतिक रूप से रानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र बहुत महत्वपूर्ण था। अब गर्वनर जनरल वायसराय कहा जाने लगा जो ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में भारत का प्रमुख प्रशासक होता था ।

अभ्यास प्रश्न

प्रश्नों के उत्तर लिखिए

1. सन् 1857 के पूर्व अंग्रेजों की सेना के भारतीय सिपाहियों में असंतोष क्यों था ?

2.सन् 1858 के महारानी के घोषणा पत्र में भारतीयों को कौन-कौनसे आश्वासन दिए गए थे ?

3. सन् 1857 का विद्रोह क्यों असफल रहा ?

4. रानी लक्ष्मी बाई, तात्याटोपे बहादुरशाह जफर, कुंवर सिंह के चित्र इकत्रित कर उनके सम्बन्धित किसी एक घटना का वर्णन करो जो आप को प्रेरित करती है।

5. हम 1857 की क्रांति के पश्चात स्वतंत्र हो जाते तो हमारा भारत किस तरह का होता अनुमान लगाइये।

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