हेलन केलर कक्षा 6 हिन्दी

हेलन केलर 

अमेरिका की सुप्रसिद्ध महिला, हेलन केलर का जन्म 27 जून, सन् 1880 में हुआ था। अंधी और बहरी होते हुए भी इस महिला ने उच्च शिक्षा प्राप्त की और फिर दीनदुखियों की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर दिया। आज इस महिला को सारा संसार जानता है । कुमारी हेलन जन्म से तो अंधी, गूंगी और बहरी नहीं थी, डेढ़ वर्ष की अवस्था तक वह भी दूसरे बच्चों की तरह देख सुन सकती थी। कुछ-कुछ तुतलाकर बोलने भी लगी थी, पर वह अकस्मात् बीमार हो गई। बीमारी से तो उसकी जान बच गई, पर आँख, कान और वाणी वह सदा के लिए खो बैठी ।

हेलन अन्य बच्चों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमती थी। उसमें विलक्षण प्रतिभा थी, पर बेचारी अपने अनुभवों को प्रकट करने में बिल्कुल असमर्थ थी । उसे अपनी असमर्थता पर बड़ी झुंझलाहट होती थी। कभी-कभी वह अपने छोटे भाई-बहिनों को बुरी तरह मार बैठती थी या फिर दुखी होकर अपने आपको ही किसी-न-किसी तरह दंड दिया करती थी ।

हेलन का दुख उसके माता-पिता से नहीं देखा गया । उन्होंने काफी सोच-विचार के बाद उसे अंधे-बहरों के स्कूल में भर्ती कराने का निश्चय किया। दैवयोग से बोस्टन की अंध-बधिर शाला में सलीवन नाम की एक योग्य अध्यापिका उन्हें मिल गई । सलीवन बहुत ही संवेदनशील थी’ । उन्होंने खुद भी अंधेपन का दुख भोगा था और आपरेशन के बाद कुछ दिनों पहले ही दृष्टि प्राप्त की थी। इसलिए वे हेलन के दुख को समझ सकती थीं। उन्होंने उसकी देख-रेख और शिक्षा का भार सहर्ष अपने कंधों पर ले लिया और हेलन के दखों को दर करने का उपाय सोचने लगीं, पर हेलन को समझने और उसके मन की बात समझने का कोई उपाय उन्हें नज़र नहीं आया। इससे सलीवन को बड़ी निराशा हुई । जिस दायित्व को उन्होंने स्वीकार किया था, उसे पूरा करने का वे सदा प्रयत्न करती रहीं ।

हेलन को अपनी गुड़िया बहुत प्यारी थी । वह उससे पल भर भी जुदा नहीं होना चाहती थी । सीवन ने एक दिन हेलन की हथेली पर उँगली से डॉल (गुड़िया) शब्द लिखा । हेलन को उँगलियों का यह खेल बड़ा पसंद आया । वह फौरन अपनी माँ के पास गई । उसने वैसा ही डॉल (गुड़िया) शब्द लिखा । यह देखकर हेलन की शिक्षिका फूली न समाई। उन्हें जिस उपाय की खोज थी वहआज अनायास ही मिल गया। अब सलीवन उसे नित नए शब्द सिखाने लगीं । हेलन ज्यों-ज्यों नए शब्द सीखती, त्यों-त्यों अधिक सीखने की उसकी जिज्ञासा बढ़ती जाती। वह अपने संपर्क में आने वाली हर एक चीज़ का नाम जान लेना चाहती थी। हेलन ने उन दिनों का वर्णन करते हुए अपनी आत्मकथा में लिखा है -“ज्यों ज्यों मैं सीखती जा रही थी, दुनिया, जिसमें मैं रहती थी, मुझे अधिक सुखमय और आकर्षक नज़र आती जा रही थी।”

धीरे-धीरे सलीवन ने हेलन को अंध लिपि (ब्रेल) भी सिखा दी। अब क्या था ? हेलन ने अपना सारा समय लिखित साहित्य को पढ़ने में लगा दिया। वह खाना-पीना भूलकर रात-दिन इस लिपि में लिखे साहित्य को पढ़ा करती दैवयोग से एक दिन उसकी वाचा भी खुल गई एक दिन यकायक उसके मुँह से कुछ टूटे-फूटे शब्द निकल पड़े जिसका आशय था आज बड़ी गर्मी है । हेलन की वाणी सुनकर अन्य लोगों को तो प्रसन्नता हुई ही, पर हेलन के जीवन का वह सबसे सुखी दिन था । हेलन ने इसका उल्लेख भी अपनी जीवनी में किया है। वह लिखती है उस दिन मेरे हृदय में जितना आनंद और उल्लास उमड़ा, उतना शायद ही किसी बालक के जीवन में कभी उमड़ा हो।”

इस अध्ययनशील बालिका ने घर की पढ़ाई पूरी करके अपनी शिक्षिका की सहायता से कैम्ब्रिज स्कूल में प्रवेश किया । आश्चर्य की बात है कि स्कूल की पढ़ाई करने के अलावा उसने केवल दो वर्ष में ही अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच भाषाओं पर भी अच्छा काबू पा लिया। स्कूल की पढ़ाई पूरी करके हेलन ने कॉलेज में प्रवेश किया। कॉलेज में भी उसने कठिन परिश्रम किया और सन् 1904 में बी. ए. की परीक्षा पास कर ली । उल्लेखनीय बात यह है कि परीक्षा में हेलन प्रथम श्रेणी में पास हुई। पढ़ाई पूरी करके हेलन ने लिखना शुरू किया । ब्रेल लिपि में उसने ‘मेरी आत्मकथा’ आदि एक के बाद एक पूरी नौ पुस्तकें लिखीं। ये पुस्तकें विश्व – साहित्य की अमूल्य निधि हैं

हेलन को प्रकृति से बड़ा प्रेम था । यद्यपि वह वसंत के खिले फूलों को और लहरों पर थिरकती चाँदनी को देख नहीं सकती थी पर उनका मन-ही-मन अनुभव अवश्य करती थी । प्रकृति उसे कैसी लगती है और उसका उसके अंतर्मन पर क्या प्रभाव पडता है. इसका उसने अपनी पस्तकों में विस्तार से उल्लेख किया है। हेलन को नाव खेने तैरने और घुड़सवारी करने का भी शौक था। वह शतरंज और ताश भी खेल लेती थी। एक बार यौवनकाल में हेलन ने विवाह करने और घरगृहस्थी बसाने का विचार किया था, पर शीघ्र ही उसे अपनी भूल मालूम हो गई और विवाह का विचार त्यागकर उसने अपने आपको समाज सेवा के काम में लगा दिया।

सबसे पहले उसने अनाथालय के अंधे बहरे बच्चों की सेवा करने का काम शुरू किया। फिर ‘मिल्टन अंध सोसाइटी नामक एक सोसाइटी कायम करके अंधे विद्यार्थियों के लिए ब्रेल लिपि में उपयोगी साहित्य प्रकाशित करने की व्यवस्था की। दोइसके पश्चात् हेलन ने विश्व यात्रा प्रारंभ की। पहले उसने यूरोप की यात्रा की, फिर वह आस्ट्रेलिया, कनाडा, मिस्र, जापान, दक्षिणी अफ्रीका, भारत इत्यादि देशों में घूमी । उसकी यात्रा का एकमात्र उद्देश्य था, विभिन्न देशों के अंधे – बहरे लोगों के जीवन में आशा और उत्साह का संचार करना । वह इस पवित्र उद्देश्य को लेकर जहाँ कहीं गई, उसका यथेष्ट आदर हुआ । उसकी सेवाओं से आज सारा संसार उसके चरणों में श्रद्धानत है। एक अंधी-बहरी महिला इतना सब कर सकती है, यह बात आसानी से समझ में नहीं आती, पर जैसा कि किसी ने कहा है- ‘सत्य घटनाएँ कल्पित किस्सों से अधिक आश्चर्यजनक होती हैं ।’ यह बात हेलन के जीवन पर हू-ब-हू लागू होती है टीप – बेल लिपि – ब्रेल लिपि दृष्टिहीनों को शिक्षा देने के लिए बनाई गई वह विशेष लिपि है जिसमें मोटे कागज़ पर सूजे से छेदकर ध्वनिसूचक बिंदियाँ बनाई जाती हैं पलट कर उन उभरी हुई बिंदियों को उँगलियों के स्पर्श से पढ़ा जाता है इसका आविष्कार लुई ब्रेल ने किया था ।

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