आरम्भिक हिंदी का व्याकरणिक स्वरुप

आरम्भिक हिंदी का व्याकरणिक स्वरुप

  • आरम्भिक हिन्दी से मतलब है,अपभ्रंश एवं अवहट्ट के बाद और खड़ी बोली के साथ हिन्दी के मानक रूप स्थिर एवं प्रचलित होने से पूर्व की अवस्था।
  • 13वीं-14वीं शती में देशी भाषा को हिन्दी या हिंदवी नाम देने में अबुल हसन या अमीर खुसरो का नाम उल्लेखनीय है।
  • 15वीं-16वीं शती में देशी भाषा के समर्थन में जायसी का कथन है- “तुर्की,अरबी,हिंदवी भाषा जेति अहिं;जामे मरण प्रेम का,सवै सराहै ताहिं।”
  • यह द्रष्टव्य है कि जायसी की कविता की भाषा अवधी है और खुसरो की देशी भाषा देहलवी।
  • दक्खिनी हिन्दी के लेखकों ने अपनी भाषा को हिन्दी या हिंदवी ही कहा है।
  • प्रारम्भिक हिन्दी एक समूह भाषा है जिसमे आज की हिन्दी प्रदेश की 17 बोलियाँ समाहित है।
  • चक्रधर शर्मा गुलेरी का मानना है कि पुरानी हिन्दी अपभ्रंश,संस्कृत एवं प्राकृत से मिलती है और पिछली पुरानी हिन्दी में शौरसेनी ही हिन्दी की भूमि हुई।
  • आरम्भिक हिन्दी का काल अनुमानतः 1000ई.से 1800ई.तक माना जा सकता है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपना हिन्दी साहित्य का इतिहास सिद्धों की वाणियों से शुरू किया है।
  • कुछ विद्वानों ने जैन कवि पुष्यदंत को हिन्दी का आदि कवि माना है।परंतु उनकी कृति ‘तिसंटिठ महापुरिसगुणालंकार’की भाषा निःसंदेह अपभ्रंश है।
  • पउमचरीउ के महाकवि स्वयंभू ने अपनी भाषा को देशी भाषा कहा है।
  • मैथिल कवि विद्यापति की दो पुस्तकें अवहट्ट में है,परंतु पूर्वी हिन्दी के बीज उनमें भी मिलते है।
  • अवधी के प्रथम कवि मुल्ला दाऊद की भाषा को आरंभिक हिन्दी नहीं ख जा सकता,क्योकि उनका रचना काल चौदहवीं सदी का अंतिम चरण है।
  • नाथ योगियों की वाणी में आरम्भिक हिन्दी का अधिक निखरा रूप है।
  • इसी परम्परा को नामदेव,जयदेव,त्रिलोचन,बेनी,साधाना और कबीर आदि कवियों ने आगे बढ़ाया है।
  • शुद्ध खड़ी बोली के नमूने अमीर खुसरो की शायरी में प्राप्त होते है।
  • खड़ी बोली में रोडा कवि कृत ‘राउलबेली’की खड़ी बोली कुछ पुरानी है।
  • राजस्थान के आसपास अपभ्रंश,डिंगल,पिंगल एवं शुद्ध मरू भाषा का प्रयोग होता रहा है।
  • हिन्दी के आदिकाल का अधिकांश साहित्य राजस्थान से प्राप्त होता है।

ध्वनिगत विशेषतायें :-

१.अपभ्रंश में संयुक्त स्वर नहीं थे।हिन्दी में ऐ,ओ,आई,आऊ,इआ आदि संयुक्त स्वर इस काल में प्रयुक्त होने लगे।

2.सब शब्द स्वरांत होते है,व्यंजनांत नहीं;जैसे दिसा,सोहंता,जुगति,अवधू आदि।

3.अगले स्वर पर बलाघात के कारण पूर्व स्वर ह्रस्व हो जाता हैऔर कभी-कभी लुप्त भी हो जाता है।जैसे-अच्छई~छइ,अरण्य~रण्य~रन आदि।

4.ह्रस्वीकरण आरम्भिक हिन्दी में दर्शनीय है।ह्रस्व स्वरों का दीर्घ रूप अधिकांतः क्षतिपूर्ति का परिणाम है।कहीं-कहीं अकारण दीर्घीकरण भी हुए है।

5.मध्य स्वर लोप एवं अन्त्य स्वर लोप की प्रवृति भी आरम्भिक हिन्दी में मिलती है।

6.हिन्दी में अपभ्रंश के द्वित्व की जगह केवल एक वर्ण रह जाता है और पूर्ववर्ती स्वर में क्षतिपूरक दीर्घता आ जाती है।जैसे;निश्वास~निस्सास~निसास,भक्त~भत्त~भात।

7.’ऋ’हिन्दी में तत्सम शब्दों में ही लिखी जाती है किन्तु इसका उच्चारण ‘री’की तरह तथा गुजराती में ‘रू’की तरह होता है। ऋ के स्थान पर रि,अ,उ,इ,ई आदि कई ध्वनियाँ दिखाई पड़ती है।

8.संज्ञा-विशेषण के अंत में ‘उ’पुल्लिंग की और ‘इ’स्त्रीलिंग की पहचान है।

9.सवरगुंच्छ,जो प्राकृत और अपभ्रंश में बहुत अधिक थे,हिन्दी में भी प्रचलन में रहे।पश्चिमी हिन्दी की अपेक्षा पूर्वी हिन्दी में कुछ अधिक है।

10.आरम्भिक हिन्दी में अपभ्रंश की सभी व्यंजन ध्वनियाँ प्रचलित रही।लेकिन मूर्धन्य उत्क्षिप्त ड़,ढ़ हिन्दी की अपनी ध्वनियाँ है।इनका विकास अवहट्ट में ही हो गया था।

11.उष्म वर्ण ‘ष’लेखन में रहा किन्तु ख उच्चारित होता है।’य’का’ज’में तथा ‘व’का ‘ब’में रूपांतरण हुआ है।

12.कुछ व्यंजनों के महाप्राण रूप विकसित हो गए है;जैसे,रह,न्ह,ल्ह आदि

13.विदेशी भाषाओं के प्रभाव से क़,ख़,ग़,ज़,फ़ का प्रयोग हिन्दी में मिलता है।

14.अनुनांसिक व्यंजनों में ङ्ग,ञ स्वतंत्र नहीं है;जो अवहट्ट में स्वतंत्र थे,हिन्दी संयोग रूप में आते है।परन्तु प्रायः इनके स्थान पर अनुस्वार मिलता है;जैसे गंगा,पुंज,लंक आदि।प्राचीन हिन्दी में ‘ण’इतना अधिक है कि ‘न’ का भी ‘ण’कर दिया गया है।शब्द के आदि में ण का प्रयोग विरल है।’र’और ‘ल’अभेद है;कहीं र का ल,कहीं ल का र मिलता है।

15.शब्द के बीच में ख,घ,थ,ध,फ,भके स्थान पर ‘ह’हो गया है।कुछ इस प्रक्रिया के कारण और कुछ व्याकरणिक रूपों के कारण आदि हिन्दी हकारबहुला लगती है।

16.शब्द के आदि में पड़नेवाले संयुक्त व्यंजनों में एक ही रह गया है।जैसे स्कन्ध से कंधा,क्रोधे से क्रोहे आदि।

17.बहुत से ऐसे शब्द मिलते है जिनमें संयोग के बीचोंबीच स्वर लाकर संयोग से काट दिया गया है;जैसे प्रकार का परकार,धर्म का धरम आदि। शब्द के बीच आनेवाले संयुक्त व्यजंन द्वित्व हो गए थे ।अवहट्ट में ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते है;परन्तु आरम्भिक हिन्दी में बहुत अधिक उदाहरण है;जैसे दुज्जन~दुर्जन,दुटठ~दुष्ट आदि।

18.क्ष का पूर्वी बोलियों में छ और पश्चिमी बोलियों में ख हो गया है;यथा लक्ष्मण~लछमन~लखन।

19.जिन संयोगों का पहला अंग अनुनांसिक व्यंजन था,वह संयुक्त तो नही रहा,केवल अनुनांसिक व्यंजन के स्थान पर अनुस्वार कर दिया गया;जैसे-पण्डित से पंडित,खम्भ से खंभ आदि।

व्याकरणिक विशेषता आरम्भिक हिन्दी की वियोगात्मक प्रक्रिया आगे बढ़ी है।

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