गोदान उपन्यास – प्रेमचंद

गोदान प्रेमचंद का हिंदी उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन – उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता और भारतपरायणता के साथ स्वार्थपरता ओर बैठकबाजी, उसकी बेबसी और निरीहता- का जीता जागता चित्र उपस्थित किया गया है। उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है उसे सहलाता, क्लेश और वेदना को झुठलाता, ‘मरजाद’ की झूठी भावना पर गर्व करता, ऋणग्रस्तता के अभिशाप में पिसता, तिल तिल शूलों भरे पथ पर आगे बढ़ता, भारतीय समाज का मेरुदंड यह किसान कितना शिथिल और जर्जर हो चुका है, यह गोदान में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। नगरों के कोलाहलमय चकाचौंध ने गाँवों की विभूति को कैसे ढँक लिया है, जमींदार, मिल मालिक, पत्रसंपादक, अध्यापक, पेशेवर वकील और डाक्टर, राजनीतिक नेता और राजकर्मचारी जोंक बने कैसे गाँव के इस निरीह किसान का शोषण कर रहे हैं और कैसे गाँव के ही महाजन और पुरोहित उनकी सहायता कर रहे हैं, गोदान में ये सभी तत्व नखदर्पण के समान प्रत्यक्ष हो गए हैं। गोदान वास्तव में २०वीं शताब्दी की तीसरी और चौथी दशाब्दियों के भारत का ऐसा सजीव चित्र है, जैसा हमें अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

गोदान उपन्यास – प्रेमचंद

गोदान में बहुत सी बातें कही गई हैं। जान पड़ता है प्रेमचंद ने अपने संपूर्ण जीवन के व्यंग और विनोद, कसक और वेदना, विद्रोह और वैराग्य, अनुभव और आदर्श् सभी को इसी एक उपन्यास में भर देना चाहा है। कुछ आलोचकों को इसी कारण उसमें अस्तव्यस्तता मिलती है। उसका कथानक शिथिल, अनियंत्रित और स्थान-स्थान पर अति नाटकीय जान पड़ता है। ऊपर से देखने पर है भी ऐसा ही है, परंतु सूक्ष्म रूप से देखने पर गोदान में लेखक का अद्भुत उपन्यास-कौशल दिखाई पड़ेगा क्योंकि उन्होंने जितनी बातें कहीं हैं वे सभी समुचित उत्थान में कहीं गई हैं। प्रेमचंद ने एक स्थान पर लिखा है – ‘उपन्यास में आपकी कलम में जितनी शक्ति हो अपना जोर दिखाइए, राजनीति पर तर्क कीजिए, किसी महफिल के वर्णन में १०-२० पृष्ठ लिख डालिए (भाषा सरस होनी चाहिए), कोई दूषण नहीं।’ प्रेमचंद ने गोदान में अपनी कलम का पूरा जोर दिखाया है। सभी बातें कहने के लिये उपयुक्त प्रसंगकल्पना, समुचित तर्कजाल और सही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रवाहशील, चुस्त और दुरुस्त भाषा और वणर्नशैली में उपस्थित कर देना प्रेमचंद का अपना विशेष कौशल है और इस दृष्टि से उनकी तुलना में शायद ही किसी उपन्यास लेखक को रखा जा सकता है।

जिस समय प्रेमचन्द का जन्म हुआ वह युग सामाजिक-धार्मिक रुढ़िवाद से भरा हुआ था। इस रुढ़िवाद से स्वयं प्रेमचन्द भी प्रभावित हुए। जब अपने कथा-साहित्य का सफर शुरु किया अनेकों प्रकार के रुढ़िवाद से ग्रस्त समाज को यथाशक्ति कला के शस्त्र द्वारा मुक्त कराने का संकल्प लिया। अपनी कहानी के बालक के माध्यम से यह घोषणा करते हुए कहा कि “मैं निरर्थक रूढ़ियों और व्यर्थ के बन्धनों का दास नहीं हूँ।”

प्रेमचन्द और शोषण का बहुत पुराना रिश्ता माना जा सकता है। क्योंकि बचपन से ही शोषण के शिकार रहे प्रेमचन्द इससे अच्छी तरह वाकिफ हो गए थे। समाज में सदा वर्गवाद व्याप्त रहा है। समाज में रहने वाले हर व्यक्ति को किसी न किसी वर्ग से जुड़ना ही होगा।

प्रेमचन्द ने वर्गवाद के खिलाफ लिखने के लिए ही सरकारी पद से त्यागपत्र दे दिया। वह इससे सम्बन्धित बातों को उन्मुख होकर लिखना चाहते थे। उनके मुताबिक वर्तमान युग न तो धर्म का है और न ही मोक्ष का। अर्थ ही इसका प्राण बनता जा रहा है। आवश्यकता के अनुसार अर्थोपार्जन सबके लिए अनिवार्य होता जा रहा है। इसके बिना जिन्दा रहना सर्वथा असंभव है।

वह कहते हैं कि समाज में जिन्दा रहने में जितनी कठिनाइयों का सामना लोग करेंगे उतना ही वहाँ गुनाह होगा। अगर समाज में लोग खुशहाल होंगे तो समाज में अच्छाई ज्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा। प्रेमचन्द ने शोषितवर्ग के लोगों को उठाने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने आवाज लगाई “ए लोगों जब तुम्हें संसार में रहना है तो जिन्दों की तरह रहो, मुर्दों की तरह जिन्दा रहने से क्या फायदा।”

प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों में शोषक-समाज के विभिन्न वर्गों की करतूतों व हथकण्डों का पर्दाफाश किया है।

संकलन1
लेखक का नाममुशी प्रेमचंद
प्रकाशन का नामलोकमय प्रेस
ISBN No.8171822495
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गोदान भाग 1

  • जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुसल है।'(होरीराम ने धनिया से कहा  )
  • मर्द साठे पर पाठे होते हैं।(होरीराम ने धनिया से कहा  )
  • काना कहने से काने को जो दु:ख होता है, वह क्या दो आँखों वाले आदमी को हो सकता है?
  • गऊ से ही तो द्वार की सोभा है।((होरीराम  )
  • गिरस्त के घर में एक गाय भी न हो, तो कितनी लज्जा की बात है। (होरीराम ने भोला से कहा  )
  • आदमी वही है, जो दूसरों की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझे। जो दुष्ट किसी मेहरिया की ओर ताके, उसे गोली मार देना चाहिए।(भोला ने होरीराम से कहा  )
  • ‘पुरानी मसल झूठी थोड़े है – बिन घरनी घर भूत का डेरा।(होरीराम ने भोला से कहा  )
    गायअस्सी रुपए में ली थी, तुम अस्सी रुपए ही देना देना। जाओ।'(भोला ने होरीराम से कहा  )
  • कृषक के जीवन का तो यह प्रसाद है।( घुड़की खाने के बाद भी उधार न चूका पाना)
  • बुड्ढों का बुढ़भस हास्यास्पद वस्तु है और ऐसे बुड्ढों से अगर कुछ ऐंठ भी लिया जाय, तो कोई दोष-पाप नहीं।(होरीराम ने भोला के बारे में सोचा   )
  • किसान पक्का स्वार्थी होता है, इसमें संदेह नहीं। उसकी गाँठ से रिश्वत के पैसे बड़ी मुश्किल से निकलते हैं, भाव-ताव में भी वह चौकस होता है, ब्याज की एक-एक पाई छुड़ाने के लिए वह महाजन की घंटों चिरौरी करता है, जब तक पक्का विश्वास न हो जाय, वह किसी के फुसलाने में नहीं आता, लेकिन उसका संपूर्ण जीवन प्रकृति से स्थायी सहयोग है।‌
  • अवसर पड़ने पर भाई की मदद भाई न करे, तो काम कैसे चले!'(होरीराम ने भोला से कहा  )
  • ‘किसी भाई का लिलाम पर चढ़ा हुआ बैल लेने में जो पाप है, वह इस समय तुम्हारी गाय लेने में है।'(होरीराम ने भोला से कहा  )
  • मुझे अब मालूम हुआ कि मैं संसार में अकेला नहीं हूँ। मेरा भी कोई हितू है।(भोला ने होरी से कहा  )

गोदान भाग 2

  • सेमरी और बेलारी दोनों अवध-प्रांत के गाँव हैं।
  • होरी बेलारी में रहता है, रायसाहब अमरपाल सिंह सेमरी में। दोनों गाँवों में केवल पाँच मील का अंतर है।
  • सिंह का काम तो शिकार करना है; अगर वह गरजने और गुर्राने के बदले मीठी बोली बोल सकता, तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता। शिकार की खोज में जंगल में न भटकना पड़ता।(रायसाहब के बारे में )
  • रायसाहब राष्ट्रवादी ,साहित्य और संगीत के प्रेमी थे, ड्रामा के शौकीन, अच्छे वक्ता थे, अच्छे लेखक, अच्छे निशानेबाज। उनकी पत्नी को मरे आज दस साल हो चुके थे; मगर दूसरी शादी न की थी।
  • एक चचा साहब राधा के अनन्य उपासक थे और बराबर वृंदावन में रहते थे।
  • एक दूसरे चचा थे, जो राम के परम भक्त थे और फारसी-भाषा में रामायण का अनुवाद कर रहे थे।
  • देख, अबकी तुझे राजा जनक का माली बनना पडेग़ा।(रायसाहब ने होरी से कहा )
  • संपत्ति और सहृदयता में बैर है।(रायसाहब ने होरी से कहा )
  • मैं अंधा हो जाऊँ और ये लोग मुझे लूट लें, और मेरा धर्म यह है कि सब कुछ देख कर भी कुछ न देखूँ। सब कुछ जान कर भी गधा बना रहूँ।(रायसाहब ने होरी से कहा )
  • गरीबों में अगर ईर्ष्या या बैर है, तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए। ऐसी ईर्ष्या और बैर को मैं क्षम्य समझता हूँ। हमारे मुँह की रोटी कोई छीन ले, तो उसके गले में उँगली डाल कर निकालना हमारा धर्म हो जाता है। अगर हम छोड़ दें, तो देवता हैं। बड़े आदमियों की ईर्ष्या और बैर केवल आनंद के लिए है।(रायसाहब ने होरी से कहा )
  • हम जौ-जौ और अंगुल-अंगुल और पोर-पोर भस्म हो रहे हैं। (रायसाहब ने होरी से कहा )
  • पिछलगुओं की खुशामदों ने हमें इतना अभिमानी और तुनकमिजाज बना दिया है कि हममें शील, विनय और सेवा का लोप हो गया है। (रायसाहब ने होरी से कहा )
  • अगर सरकार हमारे इलाके छीन कर हमें अपने रोजी के लिए मेहनत करना सिखा दे, तो हमारे साथ महान उपकार करे, और यह तो निश्चय है कि अब सरकार भी हमारी रक्षा न करेगी। (रायसाहब ने होरी से कहा )
  • जब तक संपत्ति की यह बेड़ी हमारे पैरों से न निकलेगी, जब तक यह अभिशाप हमारे सिर पर मँडराता रहेगा, हम मानवता का वह पद न पा सकेंगे, जिस पर पहुँचना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।(रायसाहब ने होरी से कहा )
  • तुम्हारे गाँव से मुझे कम-से-कम पाँच सौ की आशा है।(रायसाहब ने होरी से कहा )

गोदान भाग 3

  • गोबर साँवला, लंबा, इकहरा युवक था। प्रसन्नता की जगह मुख पर असंतोष और विद्रोह था।
  • अपने मतलब के लिए सलामी करने जाता हूँ, पाँव में सनीचर नहीं है और न सलामी करने में कोई बड़ा सुख मिलता है।(होरी ने गोबर से कहा )
  • हमारी गर्दन दूसरों के पैरों के नीचे दबी हुई है, अकड़ कर निबाह नहीं हो सकता।'(होरी ने गोबर से कहा )
  • सोना बड़े आदमियों के लिए है। हम गरीबों के लिए तो रूपा ही है। जैसे जौ को राजा कहते हैं, गेहूँ को चमार; इसलिए न कि गेहूँ बड़े आदमी खाते हैं, जौ हम लोग खाते हैं।
  • (सोना को होरी ने कहा )
  • हम लोग समझते हैं, बड़े आदमी बहुत सुखी होंगे, लेकिन सच पूछो तो वह हमसे भी ज्यादा दु:खी हैं। हमें पेट ही की चिंता है, उन्हें हजारों चिंताएँ घेरे रहती हैं।(होरी ने धनिया से कहा )
  • जो दस रुपए महीने का भी नौकर है, वह भी हमसे अच्छा खाता-पहनता है, लेकिन खेतों को छोड़ा तो नहीं जाता। (होरी ने गोबर से कहा )
  • खेती में जो मरजाद है, वह नौकरी में तो नहीं है। (होरी ने गोबर से कहा )
  • ‘भगवान ने तो सबको बराबर ही बनाया है।’ (गोबर ने होरी से कहा )
  • छोटे-बड़े भगवान के घर से बन कर आते हैं। संपत्ति बड़ी तपस्या से मिलती है। उन्होंने पूर्वजन्म में जैसे कर्म किए हैं, उनका आनंद भोग रहे हैं।  (होरी ने गोबर से कहा )
  • यहाँ जिसके हाथ में लाठी है, वह गरीबों को कुचल कर बड़ा आदमी बन जाता है।'(गोबर ने होरी से कहा )
  • भूखे-नंगे रह कर भगवान का भजन करें, तो हम भी देखें। (गोबर ने होरी से कहा )
  • तुम्हारा यही धरमात्मापन तो तुम्हारी दुरगत कर रहा है। (गोबर ने होरी से कहा )
  • वह औरत नहीं, लक्ष्मी है। (होरी ने कहा भोला के शब्द धनिया क लिए )
  • मुझसे दस साल बड़े होंगे भोला, पर राम-राम पहले ही करते हैं।’ (धनिया ने होरी से कहा )
  • तीन खाँचे भूसे देने कि जिद धनिया ने की।
  • जमींदार तो एक ही है, मगर महाजन तीन-तीन हैं, सहुआइन अलग और मँगरू अलग और दातादीन पंडित अलग।
  • बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दु:खों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता।
  • पुरानी कहावत है – ‘नाटन खेती बहुरियन घर’। नाटे बैल क्या खेती करेंगे और बहुएँ क्या घर सँभालेंगी। (होरी ने भोला से कहा )
  • ‘पड़ोसी साल-भर में एक बार भी सूरत न दिखाए, तो मेहमान ही है।'(झुनिया ने गोबर से कहा )
  • वह विधवा है। उसके नारीत्व के द्वार पर पहले उसका पति रक्षक बना बैठा रहता था।  (झुनिया के लिए )

गोदान भाग 4

  • जल में रह कर मगर से बैर करना बुड़बकपन है।(होरी रायसाहब को सोचते हुए)
  • आदमी कितना स्वार्थी हो जाता है। जिसके लिए मरो, वही जान का दुसमन हो जाता है।(होरी अपने भाइयों को सोचते हुए)
  • पच्चीस रुपए सैकड़े में पचास बाँसों का बयाना , बाद में २० रुपये होरी के लिए, उनके भाई के १५ रुपये )
  • ईमान आदमी बेचता है, तो किसी लालच से। (चौधरी ने होरी से कहा , बांस के तोलमोल पर, )
  • हीरा-बहू का नाम था पुन्नी। बच्चे दो ही हुए थे।
  • तुमने अपने को समझा क्या है? तुम्हारी इतनी मजाल कि मेरी बहू पर हाथ उठाओ।(होरी ने चौधरी से कहा , हीरा-बहु पुन्नी के लिए )
  • हीरा गाँव में अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध था।
  • तुम भले मानुस हो, हँस कर टाल गए, दूसरा तो बरदास न करेगा। (हीरा ने चौधरी से कहा )
  • अब फिर मार-धाड़ न करना। इससे औरत बेसरम हो जाती है।(होरी ने हीरा से कहा )
  • तुमने खाली मारना सीखा, दुलार करना सीखा ही नहीं।(धनिया ने होरी से कहा )
  • वैवाहिक जीवन के प्रभात में लालसा अपने गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और हृदय के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रंजित कर देती है।
  • वह कितना लोभी और स्वार्थी है, इसका उसे आज पता चला। (होरी को)
  • जीत कर आप अपने धोखेबाजियों की डींग मार सकते हैं, जीत में सब-कुछ माफ है। हार की लज्जा तो पी जाने की ही वस्तु है।
  • कुछ बातों में इतनी चतुर कि ग्रेजुएट युवतियों को पढ़ाए, कुछ बातों में इतनी अल्हड़ कि शिशुओं से भी पीछे। (सोना के बारे में)
  • दुलारी विधवा सहुआइन थी, जो गाँव में नोन, तेल, तंबाकू की दुकान रखे हुए थी। सोभा और हीरा को उससे अलग हुए अभी कुल तीन साल हुए थे, मगर दोनों पर चार-चार सौ का बोझ लद गया था। झींगुर दो हल की खेती करता है। उस पर एक हजार से कुछ बेसी ही देना है। जियावन महतो के घर, भिखारी भीख भी नहीं पाता, लेकिन करजे का कोई ठिकाना नहीं।
  • गऊ उसके लिए केवल भक्ति और श्रद्धा की वस्तु नहीं, सजीव संपत्ति थी।
  • भोला के घर से अस्सी रुपए में आई है।
  • सत्तर साल के बूढ़े पंडित दातादीन को होरी दादा कहता था.
  • भोला ऐसा भलामानस नहीं है महाराज! नगद गिनाए, पूरे चौकस।(होरी ने झूठ बोला)
  • होरी के भाई  सोभा और हीरा, गाय देखने नहीं आये
  • द्वेष का मायाजाल बड़ी-बड़ी मछलियों को ही फँसाता है। छोटी मछलियाँ या तो उसमें फँसती ही नहीं या तुरंत निकल जाती हैं। उनके लिए वह घातक जाल क्रीड़ा की वस्तु है, भय की नहीं।
  • भाई का हक मार कर किसी को फलते-फूलते नहीं देखा।(हिरा ने शोभा से कहा , होरी के लिए )
  • ‘बेईमानी का धन जैसे आता है, वैसे ही जाता है। भगवान चाहेंगे, तो बहुत दिन गाय घर में न रहेगी।'(हिरा ने शोभा से कहा )
  • अगर हमारी बढ़ती देख कर किसी की छाती फटती है, तो फट जाय, मुझे परवाह नहीं है।( धनिया ने होरी से कहा )
  • होरी की कृषक प्रकृति झगड़े से भागती थी।
  • तेरी-जैसी राच्छसिन के हाथ में पड़ कर जिंदगी तलख हो गई(हिरा ने धनिया से कहा )
  • बाकी बड़ी गाल-दराज औरत है भाई! मरद के मुँह लगती है। (दुलारी सहुआइन ने धनिया के बारे में कहा )-
  • गाली देती है डाइन! बेटे का घमंड हो गया है। खून…(हीरा ने धनिया को कहा)
  • कहाँ जाता है, जूते मार, मार जूते, देखूँ तेरी मरदुमी! (धनिया ने हिरा को कहा )

गोदान भाग 5

  • अगर भिक्षुक को भीख मिलने की आसा हो, तो वह दिन-भर और रात-भर दाता के द्वार पर खड़ा रहे।(गोबर ने झुनिया से कहा )
  • भूखा आदमी अगर हाथ फैलाए तो उसे क्षमा कर देना चाहिए।(गोबर ने झुनिया से कहा )
  • भिक्षुक देता क्या है, असीस! असीसों से तो किसी का पेट नहीं भरता।( झुनिया ने गोबर से कहा )
  • ‘जान देने का अरथ है, साथ रह कर निबाह करना। ( झुनिया ने गोबर से कहा )
  • मैं अहीर के लड़की हूँ। मूँछ का एक-एक बाल नुचवा लूँगी। ( झुनिया ने ब्राह्मण से )
  • मोटे होने से क्या होता है। यहाँ फौलाद की हड्डियाँ हैं। तीन सौ डंड रोज मारता हूँ। (गोबर ने झुनिया से कहा )
  • रोज-रोज की दाल-रोटी के बाद कभी-कभी मुँह का सवाद बदलने के लिए हलवा-पूरी भी चाहिए। (झुनिया ने गोबर से )

गोदान भाग 6

  • रायसाहब अपने कारखाने में बिजली बनवा लेते थे।
  • पंडित ओंकारनाथ  दैनिक-पत्र ‘बिजली’ के यशस्वी संपादक हैं, जिन्हें देश-चिंता ने घुला डाला है।
  • वकील श्यामबिहारी तंखा, पर वकालत न चलने के कारण एक बीमा-कंपनी की दलाली करते हैं
  • मिस्टर बी. मेहता, युनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के अध्यापक हैं। ये तीनों सज्जन रायसाहब के सहपाठियों में हैं
  • होरी ने पाँच रुपए शगुन के दे दिए हैं
  • राजा जनक का माली बन गया है
  • रायसाहब ने स्वयं एक प्रहसन लिख डाला,
  • ओंकारनाथ का ख्याल था कि प्रतिभा तो गरीबों ही में चमकती है दीपक की भाँति, जो अँधेरे ही में अपना प्रकाश दिखाता है।
  • संपादक जी समष्टिवाद के पुजारी थे.
  • मद्धिम आँच में भोजन स्वादिष्ट पकता है? गुड़ से मारने वाला जहर से मारने वाले की अपेक्षा कहीं सफल हो सकता है। ( मेहता ने तनखा को, रायसाहब के लिए )
  • मैं नकली जिंदगी का विरोधी हूँ। (मेहता के शब्द)
  • मैं उस वातावरण में पला हूँ, जहाँ राजा ईश्वर है और जमींदार ईश्वर का मंत्र।(रायसाहब ने मेहता को )
  • मैं इसे स्वीकार करता हूँ कि किसी को भी दूसरों के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं है। उपजीवी होना घोर लज्जा की बात है। कर्म करना प्राणिमात्र का धर्म है। समाज की ऐसी व्यवस्था, जिसमें कुछ लोग मौज करें और अधिक लोग पिसें और खपें कभी सुखद नहीं हो सकती। (रायसाहब ने मेहता को )
  • जिन्हें पेट की रोटी मयस्सर नहीं, उनके अफसर और नियोजक दस-दस, पाँच-पाँच हजार फटकारें, यह हास्यास्पद है और लज्जास्पद भी। (रायसाहब ने मेहता को )
  • हमारी दशा उन बच्चों की-सी है, जिन्हें चम्मच से दूध पिला कर पाला जाता है, बाहर से मोटे, अंदर से दुर्बल, सत्वहीन और मोहताज।(रायसाहब ने मेहता को )
  • आपकी जबान में जितनी बुद्धि है, काश उसकी आधी भी मस्तिष्क में होती।(मेहता ने रायसाहब को)
  • आप ही क्यों आठ सौ रुपए महीने हड़पते हैं, जब आपके करोड़ों भाई केवल आठ रुपए में अपना निर्वाह कर रहे हैं?(ओंकारनाथ ने मेहता को)
  • समाज व्यक्ति से ही बनता है। और व्यक्ति को भूल कर हम किसी व्यवस्था पर विचार नहीं कर सकते। मैं इसलिए इतना वेतन लेता हूँ कि मेरा इस व्यवस्था पर विश्वास नहीं है।(मेहता ने संपादक ओंकारनाथ को )
  • ‘मैं इस सिद्धांत का समर्थक हूँ कि संसार में छोटे-बड़े हमेशा रहेंगे, और उन्हें हमेशा रहना चाहिए। इसे मिटाने की चेष्टा करना मानव-जाति के सर्वनाश का कारण होगा।'(मेहता ने संपादक ओंकारनाथ को )
  • बुद्ध और प्लेटो और ईसा सभी समाज में समता प्रवर्तक थे। यूनान और रोम और सीरियाई, सभी सभ्यताओं ने उसकी परीक्षा की, पर अप्राकृतिक होने के कारण कभी वह स्थायी न बन सकी।
  • (मेहता ने संपादक ओंकारनाथ को )
  • ‘आश्चर्य अज्ञान का दूसरा नाम है।'(मेहता ने संपादक ओंकारनाथ को )
  • मिस्टर खन्ना  एक बैंक के मैनेजर और शक्कर मिल के मैनजिंग डाइरेक्टर हैं। मिस्टर खन्ना की पत्नी, कामिनी खन्ना हैं।
  • मिस मालती,इंग्लैंड से डाक्टरी पढ़ आई हैं और अब प्रैक्टिस करती हैं।
  • आप नवयुग की साक्षात प्रतिमा हैं। पुरुष-मनोविज्ञान की अच्छी जानकार, आमोद-प्रमोद को जीवन का तत्व समझने वाली, लुभाने और रिझाने की कला में निपुण। जहाँ आत्मा का स्थान है, वहाँ प्रदर्शन, जहाँ हृदय का स्थान है, वहाँ हाव-भाव, मनोद्गारों पर कठोर निग्रह, जिसमें इच्छा या अभिलाषा का लोप-सा हो गया हो।(मिस मालती के बारे में )
  • खन्ना मिस मालती के उपासकों में थे।
  • फिलासफर हमेशा मुर्दा-दिल होते हैं, (मिस मालती ने खन्ना को, )
  • ‘आक्सफोर्ड में मालती के फिलासफी के प्रोफेसर हसबेंड थे!’
  • ‘मैंने प्रतिज्ञा की है, कि किसी फिलासफर से शादी करूँगी और यह वर्ग शादी के नाम से घबराता है। (मालती ने कही
  • जब अपने चिंताओं से हमारे सिर में दर्द होने लगता है, तो विश्व की चिंता सिर पर लाद कर कोई कैसे प्रसन्न रह सकता है।'(मालती ने रायसाहब को )
  • मिसेज खन्ना (कामिनी देवी) को कविता लिखने का शौक था।  !
  • लिखते तो वह लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार है। जिन्होंने धन और भोग-विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया, वह क्या लिखेंगे?(ओंकारनाथ ने कामिनी को , मालती के बारे में )
  • साहित्य की सेवा अपने जीवन का ध्येय है और रहेगा।'(ओंकारनाथ ने कामिनी को )
  • मेरी रानी-महारानी आप हैं। मैं तो आपके सामने किसी रानी-महारानी की हकीकत नहीं समझता। जिसमें दया और विवेक है, वही मेरी रानी है। खुशामद से मुझे घृणा है।'(ओंकारनाथ ने कामिनी को )
  • वह बहुत ही शांत प्रकृति के आदमी थे, लेकिन ललकार सुन कर उनका पुरुषत्व उत्तेजित हो जाता था। (ओंकारनाथ के बारे में )
  • मैंने अपने सिद्धांतों को सदैव ऊँचा और पवित्र रखा है और जीते-जी उनकी रक्षा करूँगा। दौलत के पुजारी तो गली-गली मिलेंगे, मैं सिद्धांत के पुजारियों में हूँ।(ओंकारनाथ ने मालती को )
  • आप बनते तो हैं आदर्शवादी और सिद्धांतवादी, पर अपने फायदे के लिए देश का धन विदेश भेजते हुए आपको जरा भी खेद नहीं होता? (मालती ने ओंकारनाथ को )
  • जो व्यक्ति कर्म और वचन में सामंजस्य नहीं रख सकता, वह और चाहे जो कुछ हो, सिद्धांतवादी नहीं है।’ (मालती ने रायसाहब  को , ओंकारनाथ के बारे में )
  • विचार और व्यवहार में सामंजस्य का न होना ही धूर्तता है, मक्कारी है।'(मेहता ने मालती को )
  • जिन औजारों से लोहार काम करता है, उन्हीं औजारों से सोनार नहीं करता।
  • धन मेरे लिए फलने-फूलने वाली चीज नहीं, केवल साधन है। (मेहता ने रायसाहब को )
  • मुक्त भोग आत्मा के विकास में बाधक नहीं होता। विवाह तो आत्मा को और जीवन को पिंजरे में बंद कर देता है।(मेहता ने ओंकारनाथ को )
  • ‘विवाह को मैं सामाजिक समझौता समझता हूँ और उसे तोड़ने का अधिकार न पुरुष को है, न स्त्री को। समझौता करने के पहले आप स्वाधीन हैं, समझौता हो जाने के बाद आपके हाथ कट जाते हैं।'(मेहता ने मालती को )
  • ‘समाज की दृष्टि से विवाहित जीवन को, व्यक्ति की दृष्टि से अविवाहित जीवन को।'(मेहता ने मालती को)
  • ओंकारनाथ  वैष्णव हैं,
  • मिर्जा खुर्शेद कौंसिल के मेंबर थे, सूफी मुसलमान थे। दो बार हज कर आए थे, मगर शराब खूब पीते थे। कहते थे, जब हम खुदा का एक हुक्म भी कभी नहीं मानते, तो दीन के लिए क्यों जान दें। बड़े दिल्लगीबाज, बेफिकरे जीव थे। बंबई में उनके एजेंट थे।
  • निराश हो कर वहाँ से लखनऊ चले। राय साहब की मदद से और कुछ अन्य मित्रों की मदद से एक जूते की दुकान खोल ली। वह अब लखनऊ की सबसे चलती हुई जूते की दुकान थी, चार-पाँच सौ रोज की बिक्री थी।
  • लखनऊ के हसीनों की रानी एक जाहिद पर अपने हुस्न का मंत्र कैसे चलाती है?(मिर्जा खुरशेद के कथन मालती के लिए ओंकरनाथ को शराब पिलाने कि शर्त में )
  • – जब हमारे प्रोफेसरों का यह हाल है, तो यूनिवर्सिटी का ईश्वर ही मालिक है।(खन्ना ने मेहता के बारे में )
  • आपके दर्दे जिगर की दवा मिस मालती ही के पास तो है।(खुर्शेद ने खन्ना  को )
  • जिसकी कलम में जादू है, जिसकी जबान में जादू है, जिसके व्यक्तित्व में जादू है, वह कैसे कहता है कि वह प्रभावशाली नहीं है। (मालती ने ओंकारनाथ को )
  • हममें आज से कोई ब्राह्मण नहीं है, कोई शूद्र नहीं है, कोई हिंदू नहीं है, कोई मुसलमान नहीं है, कोई ऊँच नहीं है, कोई नीच नहीं है। हम सब एक ही माता के बालक, एक ही गोद के खेलने वाले, एक ही थाली के खाने वाले भाई हैं। (मालती ने ओंकारनाथ को कहा,ताकि शराब पिला सकें  )
  • नमक का कानून तोड़ दिया, धर्म का किला तोड़ दिया, नेम का घड़ा फोड़ दिया!(मिर्जा खुरशेद ने मालती को , ओंकारनाथ को पिलाने देने पर )
  • एक अफगान के भेष में मेहता थे । एक हजार रुपये डाका पड़ने की बात करता है. और बदले में मालती को ले जाने की बात कर रहा था . होरी ने उनके भन्दा फोड़ दिया.

गोदान भाग 7

  • मिस मालती मेहता के साथ चलने को तैयार हो गईं।
  • एक लालसर को मेहता ने निशाना मारा।
  • दूसरी टोली रायसाहब और खन्ना की थी।
  • खन्ना रायसाहब से शुगर मिल में १००० हिस्से खरीदने के लिए कह रहा था .
  • मैं कीमियागर हूँ। यह आपको शायद नहीं मालूम।(खन्ना ने रायसाहब को )
  • ‘मैं शिकार खेलना उस जमाने का संस्कार समझता हूँ, जब आदमी पशु था। तब से संस्कृति बहुत आगे बढ़ गई है।’ ( खन्ना ने रायसाहब को )
  • आप बुद्ध और शंकर के नाम पर गर्व करते हैं और पशुओं की हत्या करते हैं, लज्जा आपको आनी चाहिए (खन्ना ने रायसाहब को )
  • तीसरी टोली मिर्जा खुर्शेद और मिस्टर तंखा की थी। मिर्जा खुर्शेद वर्तमान में रहते थे। न भूत का पछतावा था, न भविष्य की चिंता।
  • मिस्टर तंखा दाँव-पेंच के आदमी थे, सौदा पटाने में, मुआमला सुलझाने में, अड़ंगा लगाने में, बालू से तेल निकालने में, गला दबाने में, दुम झाड़ कर निकल जाने में बड़े सिद्धहस्त। मिर्ज़ा ने  एक काला-सा हिरन मारा . और लकडहारा के परिवार को दे दिया.
  • दोनों आदमी जब बरगद के नीचे पहुँचे, तो दोनों टोलियाँ लौट चुकी थीं। । अकेले मिर्जा साहब प्रसन्न थे और वह प्रसन्नता अलौकिक थी।

गोदान भाग 9

  • हीरा ने ही गाय को जहर दिया। होरी ने बिलकुल झूठी कसम खाई
  • दारोगा जी को दातादीन ने पचास का प्रस्ताव किया।
  • पटेश्वरी ने झिंगुरी से कहा – झिंगुरी ने होरी को इशारे से बुलाया, अपने घर ले गए, तीस रुपए गिन कर उसके हवाले किए और एहसान से दबाते हुए बोले – आज ही कागद लिखा लेना। तुम्हारा मुँह देख कर रुपए दे रहा हूँ, तुम्हारी भलमंसी पर।
  • गरीबों का गला काटना दूसरी बात है। दूध का दूध और पानी का पानी करना दूसरी बात. ( धनिया ने दरोगा से )
  • स्त्री के सामने पुरुष कितना निर्बल, कितना निरुपाय है।
  • दिलेर है हुजूर, कर्कशा है। ऐसी औरत को तो गोली मार दे।(पटेश्वरी ने दरोगा से ,धनिया के बारे में )
  • बड़े आदमियों के यही लक्षण हैं। ऐसे भाग्यवानों के दर्शन कहाँ होते हैं? ( दातादीन ने दरोगा से खुसामद की ,जब दरोगा ने ५० रुपये मांगे )
  • चारों सज्जन ( दातादीन, नोखेराम, झिगुरी सिंह, पटेश्वरी ) लौटे, इस तरह मानो किसी प्रियजन का संस्कार करके श्मशान से लौट रहे हों।

गोदान भाग 10

  • उसमें अद्भुत साहस है और समय पड़ने पर वह मर्दों के भी कान काट सकती है।( धनिया के बारे में )
  • जैसी तू भोला की बेटी है, वैसी ही मेरी बेटी है। ( होरी ने झुनिया को, गोबर के भाग जाने पर )

गोदान भाग 11

  • झुनिया के दोनों भाई लाठियाँ लिए गोबर को खोजते फिरते थे। होरी से उन्होंने अपनी सगाई की जो बातचीत की थी, वह अब टूट गई।
  • गाँव वालों ने होरी को जाति-बाहर कर दिया।
  • दूध में मक्खी पड़ जाती है, तो आदमी उसे निकाल कर फेंक देता है और दूध पी जाता है।(दातादीन ने धनिया से कहा , झुनिया को घर में रख लेने से )
  • जब तक बिरादरी को भात न दोगे, बाम्हनों को भोज न दोगे, कैसे ‘उद्धार होगा? (दातादीन ने धनिया से कहा)
  • दातादीन का लड़का मातादीन एक चमारिन से फँसा हुआ था।
  • एक प्राण का मूल्य दे कर – एक नहीं दो प्राणों का – वह अपने मरजाद की रक्षा कैसे करती? ( झुनिया के गर्भ में जो बालक है, वह धनिया ही के हृदय का टुकड़ा तो है। )
  • हमको कुल-परतिसठा इतनी प्यारी नहीं है महाराज, कि उसके पीछे एक जीवन की हत्या कर डालते।
  • बड़े आदमियों को अपनी नाक दूसरों की जान से प्यारी होगी, हमें तो अपनी नाक इतनी प्यारी नहीं।((धनिया ने दातादीन से कहा )
  • दातादीन के बारे में :
  • दातादीन गाँव के नारद थे। यहाँ की वहाँ, वहाँ की यहाँ, यही उनका व्यवसाय था।
  • जमींदार को आज तक लगान की एक पाई न दी थी, कुर्की आती, तो कुएँ में गिरने चलते, नोखेराम के किए कुछ न बनता, मगर असामियों को सूद पर रुपए उधार देते थे। किसी स्त्री को आभूषण बनवाना है, दातादीन उसकी सेवा के लिए हाजिर हैं। सभा-चतुर इतने हैं कि जवानों में जवान बन जाते हैं, बालकों में बालक और बूढ़ों में बूढ़े। चोर के भी मित्र हैं और साह के भी। गाँव में किसी को उन पर विश्वास नहीं है, पर उनकी वाणी में कुछ ऐसा आकर्षण है कि लोग बार-बार धोखा खा कर भी उन्हीं की शरण जाते हैं।
  • पटेश्वरी के बारे में :
  • वह गाँव में पुण्यात्मा मशहूर थे। पूर्णमासी को नित्य सत्यनारायण की कथा सुनते, पर पटवारी होने के नाते खेत बेगार में जुतवाते थे,
  • बुखार के दिनों में सरकारी कुनैन बाँट कर यश कमाते थे, कोई बीमार-आराम हो, तो उसकी कुशल पूछने अवश्य जाते थे। छोटे-मोटे झगड़े आपस में ही तय करा देते थे। शादी-ब्याह में अपने पालकी, कालीन और महफिल के सामान मँगनी दे कर लोगों का उबार कर देते थे।
  • दारोगा गंडासिंह थे, जो हाल में इस इलाके में आए थे।
  • होरी नम्र स्वभाव का आदमी था। सदा सिर झुका कर चलता और चार बातें गम खा लेता था। हीरा को छोड़ कर गाँव में कोई उसका अहित न चाहता था,
  • नीच जात, जहाँ पेट-भर रोटी खाई और टेढ़े चले, इसी से तो सासतरों में कहा है! नीच जात लतियाए अच्छा।(दात्दीन ने कहा पंचायत में )
  • झिंगुरी सिंह दो स्त्रियों के पति थे। पहली स्त्री पाँच लड़के-लड़कियाँ छोड़ कर मरी थी। उस समय इनकी अवस्था पैंतालीस के लगभग थी, पर आपने दूसरा ब्याह किया और जब उससे कोई संतान न हुई, तो तीसरा ब्याह कर डाला। अब इनकी पचास की अवस्था थी और दो जवान पत्नियाँ घर में बैठी थीं।
  • ऐसे आदमी को गाँव में रहने देना सारे गाँव को भ्रष्ट करना है। (झिंगुरी ने होरी के लिये )
  • पंडित नोखेराम कारकुन बड़े कुलीन ब्राह्मण थे।
  • इसमें रायसाहब से क्या पूछना है। मैं जो चाहूँ, कर सकता हूँ। लगा दो सौ रुपए डाँड़। (नोखेराम ने होरी के लिए )
  • लेकिन अभी रसीद तो नहीं दी। सबूत क्या है कि लगान बेबाक कर दिया?(नोखेराम ने होरी के लिए)
  • आज ही रात को झुनिया के लड़का पैदा हो गया।  पंचायत ने फैसला किया कि होरी पर सौ रुपए नकद और तीस मन अनाज डाँड़ लगाया जाए।
  • पंच में परमेसर रहते हैं। उनका जो न्याय है, वह सिर आँखों पर। (होरी ने धनिया से )
  • अब भी अपने पसीने की कमाई खाते हैं, तब भी अपने पसीने की कमाई खाएँगे।(धनिया ने होरी से कहा )
  • नकू बन कर जीने से तो गले में फाँसी लगा लेना अच्छा है। आज मर जायँ, तो बिरादरी ही तो इस मिट्टी को पार लगाएगी? बिरादरी ही तारेगी तो तरेंगे। (होरी ने धनिया से कहा )
  • बीस मन जौ था, पाँच मन गेहूँ और इतना ही मटर, थोड़ा-सा चना और तेलहन भी था। (झुनिया को घर में रखने कि वजह से पंचायत की दंड)
  • मैं तुमसे हार जाती हूँ। मेरे भाग्य में तुम्हीं जैसे बुद्धू का संग लिखा था।(धनिया ने होरी से रोष भरे शब्द में कहा )
  • यह पंच नहीं हैं, राच्छस हैं, पक्के राच्छस! (धनिया ने होरी से कहा )
  • वह घर का स्वामी इसलिए है कि सबका पालन करे, इसलिए नहीं कि उनकी कमाई छीन कर बिरादरी की नजर में सुर्खई बने।
  • (धनिया ने होरी से कहा )
  • होरी अपने घर को अस्सी रुपए पर झिंगुरीसिंह के हाथ गिरों रख रहा था।
  • नोखेराम तो चाहते थे कि बैल बिकवा लिए जायँ, लेकिन पटेश्वरी और दातादीन ने इसका विरोध किया।
  • अभागा आप तो चिनगारी छोड़ कर भागा, आग मुझे बुझानी पड़ रही है। (होरी ने धनिया को कहा , गोबर के लिए )
  • मेरे सामने तो बड़े बुद्धिमान बनते हो, बाहर तुम्हारा मुँह क्यों बंद हो जाता है? ( धनिया ने होरी से कहा )

गोदान भाग 12

  • माँ-बाप जब तक लड़कों की रक्षा करें, तब तक माँ-बाप हैं। जब उनमें ममता ही नहीं है, तो कैसे माँ-बाप !(गोबर छिपकर सोच रहा है )
  • मजूरी करना कोई पाप तो नहीं है। (गोबर के विचार )
  • गोबर झुनिया को छोड़कर  लखनऊ की ओर भाग गया ।
  • सड़क सरकार की है। किसी के बाप की नहीं है। वह जब तक चाहे, वहाँ खड़ा रह सकता है। वहाँ से उसे हटाने का किसी को अधिकार नहीं है। (गोबर ने कोदई से कहा, जो लखनऊ जाते वक्त मिला  )
  • माता का आदर करना तो सबका धरम ही है भाई। माता से कौन उरिन हो सकता है?(गोबर ने कोदई से कहा)

गोदान भाग 13

  • पुत्र माता के रिन से सौ जनम ले कर भी उरिन नहीं हो सकता, लाख जनम ले कर भी उरिन नहीं हो सकता। करोड़ जनम ले कर भी नहीं…'(गोबर ने कोदई की माँ से कहा)
  • वैद्य एक बार रोगी को चंगा कर दे, फिर रोगी उसके हाथों विष भी खुशी से पी लेगा?
  • नीच माता-पिता की लड़की है, अच्छी कहाँ से बन जाय! तुमको तो बूढ़े तोते को राम-नाम पढ़ाना पड़ेगा। मारने से तो वह पढ़ेगा नहीं, उसे तो सहज स्नेह ही से पढ़ाया जा सकता है। (गोबर ने कोदई की माँ से कहा)

गोदान भाग 14

  • अमीनाबाद के बाजार में मिर्जा खुर्शेद ने  छ: आने रोज पर कबड्डी खेलने के लिए  सबको बुला लिया ।
  • मिर्जा ने उसे बुला कर पौधे सींचने का काम सौंपा।
  • मिर्ज़ा का स्वभाव , अमीरों से पैसा ले कर गरीबों को बाँट देना ।
  • सूर्यप्रताप सिंह
  • रायसाहब  जैकसन रोड वाली कोठी की कीमत  एक लाख पच्चीस हजार बताए।
  • जिस महिला ने भोग-विलास के सिवा कुछ जाना ही नहीं, जिसने जनता को हमेशा अपनी कार का पेट्रोल समझा, जिसकी सबसे मूल्यवान सेवा वे पार्टियाँ हैं, जो वह गर्वनरों और सेक्रेटरियों को दिया करती हैं, उनके लिए इस कौंसिल में स्थान नहीं है। (
  • मिस्टर तंखा ने मालती को कहा , रानी साहब के लिए )
  • ‘मैं गँवारों के खेल नहीं खेलता। मेरे लिए टेनिस है।'(खन्ना ने मालती से कहा )
  • महिला की सहानुभूति हार को जीत बना सकती है।(मेहता ने मिर्ज़ा से कहा ,मालती के लिए )
  • मेरे जेहन में औरत वफा और त्याग की मूर्ति है, जो अपनी बेजबानी से, अपनी कुर्बानी से, अपने को बिलकुल मिटा कर पति की आत्मा का एक अंश बन जाती है। देह पुरुष की रहती है पर आत्मा स्त्री की होती है।
  • स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान है, शांति-संपन्न है, सहिष्णु है। पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं, तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं, तो वह कुलटा हो जाती है। (मेहता ने मिर्ज़ा से कहा)
  • ‘ऐसी औरतों से मैं केवल मनोरंजन कर सकता हूँ, ब्याह नहीं। ब्याह तो आत्मसमर्पण है।'((मेहता ने मिर्ज़ा से कहा,मालती के लिए )
  • ‘मिर्ज़ा ने पंद्रह रुपए पर गोबर को कम रख लिया .

गोदान भाग 14

  • पुनिया स्वीकार करती थी कि यह होरी का पुरुषार्थ है।
  • बाप को अब वह बाप नहीं शत्रु समझती थी। (झुनिया ने भोला के प्रति )
  • कुलच्छिनी, कुल-कलंकनी कहीं की! अब तेरे लिए डूब मरना ही उचित है।(भोला ने झुनिया को )
  • भगवान मुझे फिर जनम दें, तो तुम्हारी कोख से दें, यही मेरी अभिलाखा है।(झुनिया ने धनिया से )
  • भोला ने गाय के एवज में होरी के दोनों बैल ले लिए.

गोदान भाग 15

  • मालती बाहर से तितली है, भीतर से मधुमक्खी।
  • जब दलाली जब छोटे-छोटे सौदे करते हैं, तो टाउट कहे जाते हैं, और हम उनसे घृणा करते हैं।
  • मालती के पिता मिस्टर कौल को शराब-कबाब का  चस्का था
  • मालती के मँझली बहन सरोज ,सबसे छोटी वरदा थी.
  • वरदा का  सरोज के कथन का विरोध करने का  स्वभाव था।
  • स्त्रियों का पुरुषों के क्षेत्र में आना इस युग का कलंक है। (मेहता के विचार ,सरोज मालती को बताती )।
  • विमन्स लीग इस नगर की नई संस्था है और मालती के उद्योग से खुली है। न
  • आपके पास दान देने के लिए दया है, श्रद्धा है, त्याग है। पुरुष के पास दान के लिए क्या है? वह देवता नहीं, लेवता है। (मेहता के कथन)
  • स्त्री को पुरुष के रूप में, पुरुष के कर्म में रत देख कर मुझे उसी तरह वेदना होती है, जैसे पुरुष को स्त्री के रूप में, स्त्री के कर्म करते देख कर। (मेहता के कथन )
  • हंस के पास उतनी तेज चोंच नहीं है, उतने तेज चंगुल नहीं हैं, उतनी तेज आँखें नहीं हैं, उतने तेज पंख नहीं हैं और उतनी तेज रक्त की प्यास नहीं है। उन अस्त्रों का संचय करने में उसे सदियाँ लग जायँगी, फिर भी वह बाज बन सकेगा या नहीं, इसमें संदेह है, मगर बाज बने या न बने, वह हंस न रहेगा – वह हंस जो मोती चुगता है।'(मेहता के कथन)
  • वोट नए युग का मायाजाल है, मरीचिका है, कलंक है, धोखा है, उसके चक्कर में पड़ कर आप न इधर की होंगी, न उधर की। कौन कहता है कि आपका क्षेत्र संकुचित है और उसमें आपको अभिव्यक्ति का अवकाश नहीं मिलता। हम सभी पहले मनुष्य हैं, पीछे और कुछ। हमारा जीवन हमारा घर है। वहीं हमारी सृष्टि होती है, वहीं हमारा पालन होता है, वहीं जीवन के सारे व्यापार होते हैं। अगर वह क्षेत्र परिमित है, तो अपरिमित कौन-सा क्षेत्र है? क्या वह संघर्ष, जहाँ संगठित अपहरण है? जिस कारखाने में मनुष्य और उसका भाग्य बनता है, उसे छोड़ कर आप उन कारखानों में जाना चाहती हैं, जहाँ मनुष्य पीसा जाता है, जहाँ उसका रक्त निकाला जाता है?(मेहता के कथन)
  • सच्चा आनंद, सच्ची शांति केवल सेवा-व्रत में है। वही अधिकार का स्रोत है, वही शक्ति का उद्गम है। सेवा ही वह सीमेंट है, जो दंपति को जीवनपर्यंत स्नेह और साहचर्य में जोड़े रख सकता है, जिस पर बड़े-बड़े आघातों का भी कोई असर नहीं होता। (मेहता के कथन )
  • मैं आपके शब्दों में खन्ना और गोविंदी के बीच आना चाहती हूँ? (मालती ने मेहता से )

गोदान भाग 16

  • ऐसे नमकहराम और दगाबाज आदमी के लिए उनके दरबार में जगह नहीं है।(रायसाहब ने नोखेराम को कहा , होरी के लिए )
  • झूठ से मेरे बदन में आग लग जाती है। मैंने आज तक कभी नहीं सुना कि कोई युवक अपने प्रेमिका को उसके घर से ला कर फिर खुद भाग जाए। (रायसाहब ने नोखेराम को कहा )
  • ब्रह्म बन कर घर का घर मिटा दूँगा। अभी उन्हें किसी ब्राह्मण से पाला नहीं पड़ा।( दातादीन ने रायसाहब के लिए )
  • संपादक अगर अपना कर्तव्य न पूरा कर सके तो उसे इस आसन पर बैठने का कोई हक नहीं है।(ओंकारनाथ ने रायसाहब को कहा )
  • अगर आपने हरिश्चंद्र बनने की कसम खा ली है, तो आपकी खुशी। मैं चलता हूँ।(रायसाहब ने ओंकारनाथ को कहा )
  • ओंकारनाथ की स्त्री का नाम  गोमती था .

गोदान भाग 17

  • बड़ा बेवफा आदमी है। तुम जैसी लच्छमी को छोड़ कर न जाने कहाँ मारा-मारा फिर रहा है। चंचल सुभाव का आदमी है, इसी से मुझे संका होती है कि कहीं और न फँस गया हो। ऐसे आदमियों को तो गोली मार देनी चाहिए। आदमी का धरम है, जिसकी बाँह पकडे, उसे निभाए।(मातादीन ने झुनिया से कहा, गोबर के बारे में )
  • वह तो निरा लफंगा है, घर का न घाट का।(मातादीन ने झुनिया से कहा, गोबर के बारे में )
  • ‘जो अपने को चाहे, वही जवान है, न चाहे वही बूढ़ा है।’ (सोना ने झुनिया से कहा )
  • ‘दैव करे, तुम्हारा ब्याह किसी बूढ़े से हो जाय, तो देखूँ, तुम उसे कैसे चाहती हो। (झुनिया की बात सच हो गयी , सोना को कहा )
  • गिरधर ने पूछा- तुम्हारी ऊख कब तक जायगी होरी काका?
  • पुनिया, झुनिया, कोनिया, सोना सभी खेत में जा पहुँचीं।
  • मँगरू साह,
  • सामने से गिरधर ताड़ी पिए झूमता चला आ रहा था।
  • एक आने में क्या नसा होगा? हाँ, झूम रहा हूँ जिसमें लोग समझें, खूब पिए हुए है। (गिरधर ने होरी को कहा )
  • सिसक-सिसक कर मरने से तो एक दिन मर जाना फिर भी अच्छा है।(धनिया ने होरी को कहा )
  • मजूरी करना कोई पाप नहीं। मजूर बन जाय, तो किसान हो जाता है। किसान बिगड़ जाय तो मजूर हो जाता है। (होरी ने धनिया को कहा )

गोदान भाग 18

  • वह पुरुष का खिलौना नहीं है, न उसके भोग की वस्तु, फिर क्यों आकर्षक बनने की चेष्टा करे?
  • वह उसी प्रेम और निष्ठा से पति की सेवा किए जाती है, जैसे द्वेष और मोह-जैसी भावनाओं को उसने जीत लिया है।
  • खन्ना- गोविंदी का सबसे छोटा पुत्र था.
  • वह तो मरीजों को स्वर्ग भेजने के लिए मशहूर हैं।'(खन्ना ने गोविंदी से कहा, डॉक्टर नाग के बारे में )
  • ‘मेरी दृष्टि में वह वेश्याओं से भी गई-बीती है, क्योंकि वह परदे की आड़ से शिकार खेलती है।'(गोविंदी ने खन्ना को,मालती केलिए )
  • जरा देर में डाक्टर नाग आए और सिविल सर्जन मि. टाड आए और भिषगाचार्य नीलकंठ शास्त्री आए, पर गोविंदी बच्चे को लिए अपने कमरे में बैठी रही।
  • ‘जिसे संसार दु:ख कहता है, वही कवि के लिए सुख है। ( मेहता ने गोविंदी को कहा )
  • पानी मारा-मारा फिरता है और शराब के लिए घर-द्वार बिक जाते हैं, और शराब जितनी ही तेज और नशीली हो, उतनी ही अच्छी। ( गोविंदी ने मेहता से कहा )
  • आज आपके सामने प्रतिज्ञा करता हूँ कि शराब की एक बूँद भी कंठ के नीचे न जाने दूँगा।(मेहता ने गोविंदी को कहा )

गोदान भाग 19

  • गोबर ने इसके पहले भी दो-तीन बार मिर्जा जी को रुपए दिए थे, पर अब तक वसूल न सका था।
  • गोबर जिस कोठरी में रहता है, वह मिर्जा साहब ने दी है। इस कोठरी और बरामदे का किराया बड़ी आसानी से पाँच रूपया मिल सकता है। गो
  • अलादीन को गोबर पाँच रुपए  एक आना रूपया सूद पर दे दिए।
  • भूरे एक्केवाला गोबर को स्टेशन छोड़ने आया .

गोदान भाग 20

  • होरी का परिवार दातादीन की मजूरी करने लगा है।
  • अब न जाने कौन-सा सुख देखने के लिए मुझे जिलाए रखना चाहती है।
  • झिंगुरी बहुत नोच-खसोट करके भी पचीस-तीस से ज्यादा न कमा पाते थे। और यह गँवार लौंडा सौ रुपए कमाने लगा।
  • भवनिया (उनके जेठे पुत्र का नाम था) को भी कहीं कोई काम दिला दो, तो भेज दूँ।
  • मैं भवानी को किसी के गले बाँध तो दूँ, लेकिन पीछे इन्होंने कहीं हाथ लपकाया, तो वह तो मेरी गर्दन पकड़ेगा। संसार में इलम की कदर नहीं, ईमान की कदर है।
  • जनम में लो, मरन में लो, सादी में लो, गमी में लो, खेती करते हो, लेन-देन करते हो, दलाली करते हो, किसी से कुछ भूल-चूक हो जाए, तो डाँड़ लगा कर उसका घर लूट लेते हो। इतनी कमाई से पेट नहीं भरता? क्या करोगे बहुत-सा धन बटोर कर कि साथ ले जाने की कोई जुगुत निकाल ली है?(गोबर ने दातादीन से कहा )
  • बुड्ढा काला साँप है – जिसके काटे का मंतर नहीं। (युवाओं ने गोबर से कहा ,दातादीन के लिए )
  • जंगी ने उसे पहचान कर कहा – अरे, यह तो गोबरधन है।

गोदान भाग 21

  • झिंगुरी बहुत नोच-खसोट करके भी पचीस-तीस से ज्यादा न कमा पाते थे। और यह गँवार लौंडा सौ रुपए कमाने लगा।
  • भवनिया (उनके जेठे पुत्र का नाम था) को भी कहीं कोई काम दिला दो, तो भेज दूँ।
  • मैं भवानी को किसी के गले बाँध तो दूँ, लेकिन पीछे इन्होंने कहीं हाथ लपकाया, तो वह तो मेरी गर्दन पकड़ेगा। संसार में इलम की कदर नहीं, ईमान की कदर है।
  • जनम में लो, मरन में लो, सादी में लो, गमी में लो, खेती करते हो, लेन-देन करते हो, दलाली करते हो, किसी से कुछ भूल-चूक हो जाए, तो डाँड़ लगा कर उसका घर लूट लेते हो। इतनी कमाई से पेट नहीं भरता? क्या करोगे बहुत-सा धन बटोर कर कि साथ ले जाने की कोई जुगुत निकाल ली है?(गोबर ने दातादीन से कहा )
  • बुड्ढा काला साँप है – जिसके काटे का मंतर नहीं। (युवाओं ने गोबर से कहा ,दातादीन के लिए )
  • जंगी ने उसे पहचान कर कहा – अरे, यह तो गोबरधन है।

गोदान भाग 22

  • रायसाहब कौंसिल के मेंबर थे ही, यों भी प्रभावशाली थे। राष्ट्रीय संग्राम में अपने त्याग का परिचय दे कर श्रद्धा के पात्र भी बन चुके थे। शादी तय होने में कोई बाधा न हो सकती थी। और वह तय हो गई।
  • रायसाहब की लड़की की शादी कुँवर साहब से
  • ‘एलेक्शन का सवाल नहीं है भाई, यह इज्जत का सवाल है। क्या आपकी राय में मेरी इज्जत दो लाख की भी नहीं है! मेरी सारी रियासत बिक जाय, गम नहीं, मगर सूर्यप्रताप सिंह को मैं आसानी से विजय न पाने दूँगा।'(रायसाहब ने मेहता से कहा )
  • मालती मुझे उसी तरह नचाती थी, जैसे मदारी बंदर को नचाता है।(खन्ना ने रायसाहब को )
  • पहला नाम राजा सूर्यप्रताप सिंह का था, जिसके सामने पाँच हजार रुपए की रकम थी। उसके बाद कुँवर दिग्विजय सिंह के तीन हजार रुपए थे।
  • मालती ने पाँच सौ रुपए दिए थे और डाक्टर मेहता ने एक हजार रुपए।
  • हमने तय किया है, इस शाला का बुनियादी पत्थर गोविंदी देवी के हाथों रखा जाए।
  • राजा साहब की और अन्य सज्जनों की भी राय थी कि लेडी विलसन से ही बुनियाद रखवाई जाए, लेकिन अंत में यह निश्चय हुआ कि यह शुभ कार्य किसी अपनी बहन के हाथों होना चाहिए। (मेहता ने खन्ना से कहा )
  • गोविंदी कैसे कहे कि यह सम्मान पा कर वह मन में कितनी प्रसन्न हो रही थी। उस अवसर के लिए कितने मनोयोग से अपना भाषण लिख रही थी और कितनी ओजभरी कविता रची थी। उसने दिल में समझा था, यह प्रस्ताव स्वीकार करके वह खन्ना को प्रसन्न कर देगी। उसका सम्मान तो उसके पति का ही सम्मान है।
  • यह पुरुष-प्रकृति है अपवाद नहीं, मगर यह समझ लो कि धन ने आज तक किसी नारी के हृदय पर विजय नहीं पाई, और न कभी पाएगा।(मालती ने खन्ना को कहा )
  • यह मेरे व्यवहार का मूल्य है या व्यायामशाला का चंदा(एक हजार रुपए )?(मालती ने खन्ना को कहा )
  • ‘हाँ, तुम्हारे लिए पहेली हूँ और पहेली रहूँगी।'(मालती ने खन्ना को कहा )

गोदान भाग 23

  • गोबर और झुनिया के पहले बेटा का नाम चुन्नू था  ।
  • दुलारी सहुआइन( बेटी का नाम -कौसल्या)  होरी का भाभी थी । साहजी मर गए, दुलारी ने घर से निकलना छोड़ दिया। सारे दिन दुकान पर बैठी रहती थी
  • पंडित दातादीन का बेटा मातादीन(मतई) -सिलिया (हरखू चौधरी_कलिया की बेटी )

गोदान भाग 24

  • झिंगुरीसिंह, पटेश्वरी और नोखेराम तीनों ही सज्जनों के लड़के छुट्टियों में घर आए थे।
  • पटेश्वरी के सपूत बिंदेसरी तो एक पुत्र के पिता भी हो चुके थे। तीनों दिन भर ताश खेलते, भंग पीते और छैला बने घूमते।
  • होरी और दुलारी सहुआइन का हस परिहास हुसेनी एक पैसे का नमक लेने आने से बंद हो गया।
  • सोना का विवाह(सत्रहवें साल) सोनारी के एक धनी किसान ( गौरी महतो)के लड़के से ठीक हुआ था।
  • गोमती नदी का ज़िक्र हुआ है

गोदान भाग 25

  • जंगी जब से अपनी स्त्री को ले कर लखनऊ चला गया था, कामता की बहू ही घर की स्वामिनी थी।
  • कामता ने बाप को निकाल बाहर तो किया, लेकिन अब उसे मालूम होने लगा कि बुड्ढा कितना कामकाजी आदमी था।
  • भोला की दूसरी  स्त्री नोहरी
  • सोभा बड़ा हँसोड़ था। सारे गाँव का विदूषक, बल्कि नारद।

गोदान भाग 26

  • मँगरू साह गाँव का सबसे धनी आदमी था,एक कुआँ और एक छोटा-सा शिव-मंदिर बनवा लिया था।
  • नोहरी ने सोना की सदी के लिए २०० रुपये देने का वादा किया .

गोदान भाग 27

  • झुनिया का पहला बेटा लल्लू दस्त से मर गया .
  • बाहर वाला लल्लू उसके भीतर वाले लल्लू का प्रतिबिंब मात्र था। प्रतिबिंब सामने न था, जो असत्य था, अस्थिर था। सत्य रूप तो उसके भीतर था, उसकी आशाओं और शुभेच्छाओं से सजीव। (झुनिया )
  • गोबर ने खोंचे से निराश हो कर शक्कर के मिल में नौकरी कर ली थी।
  • गोबर को  शराब का चस्का पड़ा।
  • झुनिया को अब यह शंका होने लगी कि वह रखेली है, इसी से उसका यह अपमान हो रहा है।
  • चुहिया ने सहर में झुनिया का देखभाल की
  • यह पक्का मतलबी, बेदर्द आदमी है, मुझे केवल भोग की वस्तु समझता है। (झुनिया ने गोबर के बारे में सोचा )
  • मिर्जा खुर्शेद संघ के सभापति और पंडित ओंकारनाथ ‘बिजली’ संपादक, मंत्री थे।
  • नए आदमियों को मिल में जाने ही न दिया जाए। बेचारे मिर्जा जी पिट गए और उनकी रक्षा करते हुए गोबर भी बुरी तरह घायल हो गया।
  • जब हम अपने किसी प्रियजन पर अत्याचार करते हैं, और जब विपत्ति आ पड़ने पर हममें इतनी शक्ति आ जाती है कि उसकी तीव्र व्यथा का अनुभव करें, तो इससे हमारी आत्मा में जागृति का उदय हो जाता है, और हम उस बेजा व्यवहार का प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

गोदान भाग 28

  • मेरा नाम खन्ना है, चंद्रप्रकाश खन्ना! मैंने अपना सब कुछ इस मिल में लगा दिया। पहली मिल में हमने बीस प्रतिशत नफा दिया। मैंने प्रोत्साहित हो कर यह मिल खोली। इसमें आधे रुपए मेरे हैं। मैंने बैंक के दो लाख इस मिल में लगा दिए। मैं एक घंटा नहीं, आधा घंटा पहले दस लाख का आदमी था। जी हाँ, दस, मगर इस वक्त फाकेमस्त हूँ – नहीं दिवालिया हूँ! मुझे बैंक को दो लाख देना है। जिस मकान में रहता हूँ, वह अब मेरा नहीं है। जिस बर्तन में खाता हूँ, वह भी अब मेरा नहीं! बैंक से मैं निकाल दिया जाऊँगा। जिस खन्ना को देख कर लोग जलते थे, वह खन्ना अब धूल में मिल गया है। समाज में अब मेरा कोई स्थान नहीं है, मेरे मित्र मुझे अपने विश्वास का पात्र नहीं, दया का पात्र समझेंगे। मेरे शत्रु मुझसे जलेंगे नहीं, मुझ पर हँसेंगे। आप नहीं जानते मिस्टर मेहता, मैंने अपने सिद्धांतों की कितनी हत्या की है। कितनी रिश्वतें दी हैं, कितनी रिश्वतें ली हैं। किसानों की ऊख तौलने के लिए कैसे आदमी रखे, कैसे नकली बाट रखे। (मिल जल जाने के बाद खन्ना ने मेहता को )
  • दौलत से आदमी को जो सम्मान मिलता है, वह उसका सम्मान नहीं, उसकी दौलत का सम्मान है। आप निर्धन रह कर भी मित्रों के विश्वासपात्र रह सकते हैं और शत्रुओं के भी, बल्कि तब कोई आपका शत्रु रहेगा ही नहीं। (मेहता ने खन्ना को कहा)
  • धन के लिए, जो सारे पापों की जड़ है! उस धन से हमें क्या सुख था? सबेरे से आधी रात तक एक-न-एक झंझट-आत्मा का सर्वनाश! लड़के तुमसे बात करने को तरस जाते थे, तुम्हें संबंधियों को पत्र लिखने तक की फुर्सत न मिलती थी। (गोविंदी ने खन्ना से कहा )
  • हमारी सारी आत्मिक और बौद्धिक और शारीरिक शक्तियों के सामंजस्य का नाम धन है।(खन्ना ने गोविंदी से कहा )
  • जीवन का सुख दूसरों को सुखी करने में हैं, उनको लूटने में नहीं।। (गोविंदी ने खन्ना से कहा )

गोदान भाग 29

  • जब हम नेकी करके उसका एहसान जताने लगते हैं, तो वही जिसके साथ हमने नेकी की थी, हमारा शत्रु हो जाता है, और हमारे एहसान को मिटा देना चाहता है। वही नेकी अगर करने वाले के दिल में रहे, तो नेकी है, बाहर निकल आए तो बदी है।
  • किसान और किसान के बैल इनको जमराज ही पिंसिन दें, तो मिले।(मातादीन को होरी ने कहा )
  • सिलिया घर से निकली। वह सोना के पास जा कर यह सुख-संवाद (मातादीन ने अपना लिया )सुनाएगी।
  • मथुरा सोना के पति का नाम ।

गोदान भाग 30

  • एक दिन वह सेमरी तक पहुँच गए और घूमते-घामते बेलारी जा निकले। होरी द्वार पर बैठा चिलम पी रहा था कि मालती और मेहता आ कर खड़े हो गए। मेहता ने होरी को देखते ही पहचान लिया और बोला – यही तुम्हारा गाँव है? याद है, हम लोग रायसाहब के यहाँ आए थे और तुम धनुषयज्ञ की लीला में माली बने थे।
  • वह देह की वस्तु नहीं, आत्मा की वस्तु है। संदेह का वहाँ जरा भी स्थान नहीं और हिंसा तो संदेह का ही परिणाम है। वह संपूर्ण आत्म-समर्पण है। उसके मंदिर में तुम परीक्षक बन कर नहीं, उपासक बन कर ही वरदान पा सकते हो।(मालती ने मेहता को कहा )

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