छत्तीसगढ़स्य पर्वाणि कक्षा सातवीं विषय संस्कृत पाठ 2

छत्तीसगढ़स्य पर्वाणि कक्षा सातवीं विषय संस्कृत पाठ 1

मानवजीवने उत्सवानां महत्वं सर्वविदित मेव। छत्तीसगढ़ राज्ये बहवः उत्सवाः प्रचलिताः तेषु ‘हरेली’, ‘तीजा’, ‘जवारा’, ‘जेठौनी’, ‘छेरछेरा पुन्नी’ इत्यादयः मुख्याः सन्ति ।

एतेषु –

शब्दार्थाः – सर्व=सभी, विदितमेव = परिचित ही हैं, बहवः = बहुत प्रचलिता:= प्रचलित, मुख्याः= प्रमुख, उत्सवानां = त्यौहारों के, एतेषु = इनमें ।

अनुवाद :-

मानव जीवन में त्यौहारों के महत्व से सभी परिचित हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में अनेक त्यौहार प्रचलित हैं। उनमें― हरेली, तीजा, जवारा, जेठवनी, छेरछेरा पुन्नी आदि प्रमुख हैं। ये हैं—

(i) हरेली :-

इत्यस्य विशिष्टं महत्वमस्ति। श्रावणमासस्य अमावस्यायां, ‘हरेली’ उत्सवः भवति। वातावरेण सर्वत्र हरीतिमा लक्ष्यते । कृषकाः क्षेत्रेषु बीजवपनं कृत्वा सर्वाणि उपकरणानि संशोध्य पशूनां पूजनं कुर्वन्ति। पशुनां कृते गोधूमनिर्मितां रोटिकां पाचयन्ति । ताण्डुल निर्मिता चित्रापूपः (चीला) इति खाद्य पदार्थस्य सेवनं कुर्वन्ति जनाः । बालकाः काष्ठनिर्मितया ‘गेड़ी’ नामक क्रीडा उपकरणेन इतस्ततः विचरन्ति हर्ष च अनुभवन्ति ।

शब्दार्था –

इत्यस्य = : इसका, महत्वमस्ति = महत्व है, अमावस्यां= अमावस्या को, उत्सवः त्यौहार, हरीतिमा = हरियाली से युक्त, हरा-भरा, लक्ष्यते = दिखाई देता है, कृत्वा = करके, सर्वाणि = सभी, उपकरणानि= औजारों को, कुर्वन्ति करते हैं, गोधूमनिर्मितां = गेहूँ आटा से बने, पाचयन्ति = पकाते हैं, ताण्डुल निर्मिता = चावल आटे से बना, काष्ठनिर्मितया= लकड़ी से बनी, इतस्तत: = इधर-उधर, विचरन्ति = घूमते हैं।

अनुवाद –

इसका (हरेली त्यौहार) विशेष महत्व है। सावन महीने की अमावस्या को हरेली त्यौहार मनाया जाता है (होता) है)। वातावरण चारों ओर हरियाली से युक्त होता है। किसान खेतों में बीज बोकर सभी औजारों को ठीक कर पशुओं की पूजा करते हैं। पशुओं के लिए गेहूँ आटे से रोटियाँ बनाते हैं। चावल आटे से बने ‘चीला’ नामक खाद्य पदार्थ (रोटी) का लोग सेवन करते हैं। लड़के लकड़ी से बनी ‘गेड़ी’ नामक खिलौने से इधर- उधर घूमते हैं और आनंदित होते हैं।

(ii) पोरा :-

भाद्रपदस्य अमावस्यायां पोरा: (पोला ) उत्सवः भवति । कृषि प्रधानस्य छत्तीसगढ़स्य अयं प्रधानः उत्सवः । कृषि कार्य क्षेत्रकर्षणं च बलीबर्दाः कुर्वन्ति । अतः अस्मिन उत्सवे बलीवर्दानां विशिष्टा सज्जा भवति। प्रतीक रूपेण बालकाः अपि मृण्मय (मिट्टी का) वृषभैः (नादिया बैल) क्रीडन्ति । बालिकाः ‘फुगड़ी’ आदि क्रीडया स्वकीचमानंद प्रदर्शयन्ति । तीजापवर्णः अत्र विशेष महत्वमस्ति। स्त्रियः स्वकीयेमातृकुलं गत्वा परिवारजनैः सह सानंदमुपोष्य पत्यु दीर्घायुष्यं कामयन्ति । वतस्य समापने नाना विधं व्यञ्जनं पचन्ति। ‘ठेठरी’, ‘खुरमी’ इति खाद्य पदार्थं परस्परं वितरन्ति । नानाविधानि वस्त्राभूषणानि परिधाय भगवतः पूजनं कृत्वा संतोषमनुभवन्ति भाद्रपदस्य शुक्ल तृतीयायां तिथौ उत्सवोऽयं भवति ।

अनुवाद –

पोला का त्यौहार भादो महीने के अमावस्या को होता है। कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ का यह प्रमुख त्यौहार है। कृषि कार्य हल और बैल करते हैं। इसलिए इस त्यौहार में बैलों को विशेष रूप से सजाया जाता है। बैलों के प्रतीक नादिया बैल से लड़के खेलते हैं। लड़कियाँ फुगड़ी के द्वारा अपनी खुशियाँ प्रदर्शित करती हैं। तीजा (तीज) त्यौहार का यहाँ विशेष महत्व है। महिलाएँ अपने मायके जाकर परिवारजनों के साथ अपने पति के दीर्घायु होने के लिए प्रसन्नतापूर्वक उपवास रखती हैं। व्रत की समाप्ति पर अनेक प्रकार की रसोई (व्यंजन) पकाती है। ठेठरी, खुरमी आदि भोज्य पदार्थों को एक-दूसरे को बाँटती हैं। अनेक प्रकार के वस्त्र, आभूषणों से सजकर भगवान की पूजा कर संतुष्टि का अनुभव करती हैं। भादो महीने की तृतीया तिथि को यह त्यौहार होता है।

(iii) जवारा –

आश्विन मासस्य कृष्णपक्षे नवम्यां तिथौ देव्याः दुर्गायाः विसर्जनोत्सवः ‘जवारा’ इत्युच्यते। अंकुरितान् यवान् आदाय समारोहपूर्वकं गीतवाद्यदिभिः देव्याः पूजन कृत्वा तेषां विसर्जनं क्रियते । हरितवर्णाः जवाराः समृद्धेः प्रतीकभूताः सन्ति ।

शब्दार्थाः –

आश्विन = कुवार, उच्यते = कहते हैं, आदाय = लेकर, देव्याः = देवी का, हरितवर्णा : हरिमा (हरियाली) से युक्त, कृत्वा = करके, यवान् = जौ, क्रियते = करते हैं।

अनुवाद –

आश्विन (कुवार) माह के कृष्ण पक्ष नौमी को देवी दुर्गा के विसर्जन के उत्सव को ही जवारा पर्व कहते हैं। जौ के अंकुरित दानों को समारोहपूर्वक देवी मान पूजा कर गाजे-बाजे के साथ उसका विसर्जन करते हैं। हरिमा से युक्त जवारा संवृद्धि का प्रतीक है।

(iv) जेठौनी –

देवप्रबोधनी एकादशी ‘जेठौनी’ इति उच्यते । अस्मिन पर्वणि सायंकाले तुलसी विवाहः श्री विष्णुना सह समायोज्यते । गोपालकाः स्वकीय पशून् मयूर विच्छादिना भूषयन्ति । कार्तिक पूर्णिमा पर्यन्तम् उत्सवोऽयं प्रचलति ।

शब्दार्था: –

उच्यते= कहा जाता है, पर्वणि =त्यौहार में, सह= साथ, विच्छादिना= पंख से, स्वकीयं =अपने, पर्यन्तम्= तक।

अनुबाद –

देव उठनी (देव प्रबोधनी) एकादशी को हो जेठौनी कहा जाता है। इस त्यौहार में शाम को भगवान विष्णु के साथ तुलसी का विवाह किया जाता है। ग्वाले (राउत जाति के लोग) अपने मवेशियों को मोरपंख से सजाते हैं। कार्तिक महीने की पूर्णिमा तक यह त्यौहार मनाया जाता है।

(v) छेरछेरा पुन्नी –

चातुर्मास्य समाप्यनन्तरं पौष पूर्णिमायां सञ्चितधान्यं भाण्डारगृहात् आदाय आपणे विक्रयार्थ नीयते । अस्मिन पर्वणि बालकाः प्रति गृहं गत्वा – ‘छेर छेरा छेरछेरा- कोठी के धान हेर हेरा जवे-देवे तवे टरन’ इति लोकभाषायां कथयन्तः नवान्नानि याचन्ते । ग्राम्य बालिकाः मध्ये शुकं स्थापित्वा अभितः नृत्यन्ति शुकगीतं गायन्ति च । छत्तीसगढ़ क्षेत्रस्य ग्रामे – ग्रामे मेलापकाः (मंडई) आयोज्यन्ते छत्तीसगढ़ क्षेत्रे एते मेलापकाः अति प्रसिद्धाः सन्ति। अन्यानि अपि अनेकानि पर्वाणि छत्तीसगढ़ राज्ये सोत्साहं आयोजतानि भवन्ति । यथा खमरछट (हलषष्ठी), अक्षय तृतीया (अक्ति), आंवला नवमी, गौरा-गौरी इत्यादीनि । सर्वेषु उत्सवेषु राज्यस्य संस्कृति, लोक परम्परा, जनजीवनं च प्रतिबिम्बितानि भवन्ति । सम्पनाः खलु इयं भूमि उत्सवैः ।

शब्दार्था: –

अनन्तरं= पश्चात् ,सञ्चित = इकट्ठा, धान्यं – धान को, आपणे= बाजार में, देवे= दोगो, तवे= तभी, तरन = जायेंगे, नवान्नानि = नया अन्न, याचन्ते = माँगते हैं, शुकं= तोता, स्थापयित्वा = रखकर, मेलापकाः = मंडई, सोत्साहं – उत्साह पूर्वक सम्पन्नाः =समृद्ध, खलु =निश्चित रूप से।

अनुवाद –

चतुर्मास (बरसात के चार महीने) बीतने के पश्चात् पूस पूर्णिमा को इकटठा किए हुए धान को भंडारण से बेचने के लिए बाजार ले जाया जाता है। इस त्यौहार में बच्चे (लड़के) घर- घर जाकर छेरछेरा- छेरछेरा-कोठी के धान हेर-हेरा जब दोगे तभी जायेंगे- (छेरछेरा छेर छेरा-माई कोठी के धान ल हेरते हेरा, जभे दबे, तभे टरबो) ऐसा लोकभाषा (छत्तीसगढ़ी बोली) में कहकर नव अन्न (नया धान) माँगते हैं। गाँव की लड़कियाँ बीच में तोते (सुआ) को रखकर सुआ गीत गाती और नाचती हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के गाँव-गाँव में मंडई का आयोजन किया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य में मंडई अत्यधिक लोकप्रिय है। छत्तीसगढ़ में इनके अतिरिक्त भी कई त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाए जाते हैं। जैसे- खमरछठ (हलषष्ठी), अक्षय तृतीया (अक्ति), आँवला नवमी, गौरा-गौरी आदि। इन उत्सवों में राज्य की संस्कृति लोक परम्परा और जनजीवन प्रतिबिम्बित होते हैं। समृद्ध हो यह उत्सव भूमि ।

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