भयानक रस

भयानक रस

  • भयानक कारणभेद से व्याजजन्य या भ्रमजनित, अपराधजन्य या काल्पनिक तथा वित्रासितक या वास्तविक नाम से तीन प्रकार का और स्वनिष्ठ परनिष्ठ भेद से दो प्रकार का माना जाता है।
  • भानुदत्त के अनुसार, ‘भय का परिपोष’ अथवा ‘सम्पूर्ण इन्द्रियों का विक्षोभ’ भयानक रस है।
  • भयोत्पादक वस्तुओं को देखने या फिर सुनने से अथवा शत्रु इत्यादि के विद्रोहपूर्ण आचरण की स्थिति में भयानक रस उद्भुत होता है।
  • हिन्दी के आचार्य सोमनाथ ने ‘रसपीयूषनिधि’ में भयानक रस की निम्न परिभाषा दी है-

‘सुनि कवित्त में व्यंगि भय जब ही परगट होय। तहीं भयानक रस बरनि कहै सबै कवि लोय’।

उदाहरण-

एक और अजगरहि लखी एक और मृगराय.

बिकल बटोही बीच ही पर्यो मूरछा खाए.

(भयानक उदाहरण)

इसके शेर और अजगर इसके आलंबन है.

आलंबन –


पाप या पाप कर्म , सामाजिक तथा अन्य बुराइयां , हिंसक जीव जंतु , प्रबल अन्यायकारी व्यक्ति , भयंकर अनिष्टकारी वस्तु , देवी संकट , भूत – प्रेत आदि।

उद्दीपन –


आश्रय की असहाय अवस्था , आलंबन की भयंकर चेस्टाएं , निर्जीव स्थान , अपशगुन , आदि।

अनुभाव –


हाथ – पांव कांपना , नेत्र विकराल होना , भागना , स्वेद , उंगली काटना , जड़ता , स्तब्धता , रोमांच , घिघि बंध जाना , मूर्छा , चित्रकार , स्वेद , विवरण , सहायता के लिए इधर-उधर देखना , शरण ढूंढना , दैन्य प्रकाशन , रुदन आदि।

संचारी भाव –


शंका , आवेद , अमर्ष , स्मृति , आशंका , स्मरण , घृणा , शोक , भ्रम , ग्लानि , चिंता , दैन्य , चपलता , किंकर्तव्यविमूढ़ , निराशा , आशा आदि।

भयानक रस के उदाहरण

तीन बेर खाती थी वो तीन बेर कहती है।

व्याख्या –

प्रस्तुत पंक्ति में मुगल की रानियों के भय का वर्णन है , जो शिवाजी महाराज के भय से व्याकुल है जो इतनी डरी हुई है कि घास – फूस और फल खाने को मजबूर है।

गज की घटा न गज घटनी श्नेह साजे  

भूषण भनत आयो से शिवराज को।

व्याख्या –

उपयुक्त पंक्ति में शिवाजी के भय से आतुर रानियां आपस में काली घटा को घिरते हुए देख बातचीत कर रही है। यह कोई काली घटा घेर के नहीं आ रही है , बल्कि यह शिवाजी अपनी सेनाओं के साथ आ रहे हैं। जिसके कारण पूरा आसमान लाल और काला नजर आ रहा है। यह उनके हाथियों की आवाज है जो हमें बादल की आवाज प्रतीत हो रही है।

उधर गरजती सिंधु लहरियां कुटिल काल के जालों सी

चली आ रही फैन उगलती फन फैलाए व्यालों सी।

व्याख्या –

प्रस्तुत पंक्ति जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखी गई है।

जो भारत में सिंधु नदी की ओर से बढ़ रही आक्रांताओं की ओर इशारा किया गया है।  उन्होंने इन पंक्तियों के माध्यम से उन गिद्धों और कुटिल चालों को जनमानस के सामने रखा है। जो भारत को लूटने और तबाह करने के लिए निरंतर बढ़ती जा रही है।

एक और अजगरहि लखि , एक और मृराय

विकल बटोही बीच ही , परयों मूर्छा खाए। 

व्याख्या –

प्रस्तुत लेख के माध्यम से काल के बीच खड़े व्यक्ति का वर्णन है।

एक ओर से अजगर तथा दूसरी ओर शेर के बीच फंस गया है। उसके भय की स्थिति इस पंक्ति में प्रस्तुत की गई है। इन दोनों के बीच में फसा हुआ व्यक्ति भय से आतुर होता है और मूर्छा खाकर वहीं गिर जाता है।

पद पाताल सीस अजधामा , अपर लोक अंग अंग विश्रामा।

भृकुटि बिलास भयंकर काला , नयन दिवाकर कच धन माला। 

व्याख्या –

प्रस्तुत पंक्ति में रावण की पत्नी मंदोदरी श्री राम को अपने स्वप्न में देखती है। जिनका पैर पाताल में और सिर आकाश में तथा उनके अंग अनेकों लोक में फैले हुए थे। ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर व डर गई और रावण को उनसे बैर मोल न लेने की सलाह दे रही है।

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