बालक: ध्रुव: कक्षा छठवीं विषय संस्कृत पाठ 7

कक्षा छठवीं विषय संस्कृत पाठ 7 बालक: ध्रुव:

पुरा उत्तानपादः नाम एकः राजा आसीत्। तस्य द्वे पल्यौ स्तः एका सुनीति: अपरा च सुरुचिः। राज्ञी सुरुचिः राज्ञोऽतीव प्रियासीत्। उत्तमः नाम तस्याः पुत्रः आसीत्। सुनीतिः राजानं नातिप्रियासीत् तस्याः पुत्रः ध्रुवः आसीत्।

शब्दार्था:- पुरा प्राचीन काल में (पहले), द्वेदो, अपरा = दूसरी, राजी= रानी, तस्या:= उसका, नातिप्रिया= अधिक प्रिय नहीं।

अनुवाद-पहले उत्तानपाद नामक एक राजा था। उसकी दो पत्नियाँ थी— एक सुनीति और दूसरी सुरुचि। रानी सुरुचि राजा को अत्यधिक प्रिय थी। उत्तम नामक उसका पुत्र था। सुनीति राजा को अधिक प्रिय नहीं थी, उसका पुत्र ध्रुव था।

एकस्मिन् दिने राजा सुरुचेः पुत्रं उत्तमं अड्डे निधाय स्नेह कुर्वन्नासीत्। तस्मिन् समये सुनीतेः पुत्रः ध्रुवः पितुः अड्डे स्थातुमैच्छत्। तद् दृष्टवा विमाता सुरुचिः अब्रवीत्। वत्स! त्वं राजसिंहासने आरोढुम अयोग्यः असि यतः त्वं अन्य स्त्रीगर्भात् उत्पन्नोऽसि यदि त्वं राजसिंहासने आरोम इच्छसि तर्हिभगवतः नारायणस्य आराधनां कुरु। मम कुक्षौ च आगत्य जन्म गृहाण

शब्दार्था:- अंके= गोद में, निधाय =बैठाकर स्थातुम=  बैठना, ऐच्छत् = चाहा. दृष्ट्वा = देखकर, विमाता = सौतेली माता. अब्रवीत् =बोली, असि= हो, यत:= क्योंकि, त्वं =तुम उत्पन्नोऽसि =उत्पन्न हो, तर्हि =तो मम =मेरा, कुक्षी =कोख में, आगत्य = आकर, गृहाण= लो (ग्रहण करो)।

अनुवाद : -एक दिन राजा सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोद में बैठाकर स्नेह कर रहे थे। उसी समय सुनीति का पुत्र ध्रुव पिता की गोद में बैठना चाहा। वह देखकर विमाता (सौतेली माँ) सुरुचि ने कहा। पुत्र तुम राजसिंहासन पर चढ़ने में अयोग्य हो क्योंकि तुम अन्य स्त्री के गर्भ से उत्पन्न हो। यदि तुम राजसिंहासन पर चढ़ने की इच्छा करते हो तो भगवान नारायण की आराधना करो और मेरी कोख में आकर जन्म ग्रहण करो।

विमाता मुखात् एतानि कटु वचनानि श्रुत्वा बालकः ध्रुवः उच्चस्वरेण रोदनमारभत् । किन्तु राजा उत्तानपादः इदं सर्वं तूष्णी भूत्वा पश्यान्नासीत् । अत्रान्तरे बालकः ध्रुवः रोदनं कुर्वन् मातुः “सुनीतेः पार्श्व गतः अवदत् च विमातुः कटु व्यवहार विषये ।। पुत्रात् सुरुचेः कटुवचनमाकर्ण्य सुनीतिः संयमेन ध्रुवमब्रवीत्। वत्स्! धैर्य शान्ति च धारय

शब्दार्था:- एतानि =इन, श्रुत्वा= सुनकर, आरभत्= शुरू कर दिया, इदं= यह सर्व= सब, तूष्णों= चुप, भूत्वा = होकर, अत्रान्तरे= इसी बीच, कुर्वन्= करता हुआ, पार्श्वे= पास, गतः = गया, बत्तर = हे पुत्र, धारय= धारण करो, च =और |

अनुवाद – विमाता के मुख से इन कटु वचनों को सुनकर बालक ध्रुव उच्च स्वर से रोना शुरू कर दिया, किन्तु राजा उत्तानपाद इन सबको चुप रहकर देख रहे थे। इसी बीच चालक ध्रुव रोते हुए माता सुनीति के पास गया और विमाता के कटु व्यवहार के विषय में बोला। पुत्र से सुरुचि के कटु वचनों को सुनकर सुनीति ने संयम (धीरज) के साथ ध्रुव से बोली, पुत्र धीरज और शान्ति धारण करो।

यद्यपि त्वं विमातुः आचरेण प्रताडितोऽसि तथापि त्वं परार्थे कदापि अमङ्गल कामनां मा कुरु यः पुरुषः अन्यान् खिन्न करोति सः तस्य फलं अवश्यमेव प्राप्नोति। अतः वत्स! त्वं विमातुः कटुसत्यं पालयन् भगवतः नारायणस्य चरणकमलयोः । आराधना कुरु। तपसा तव पूर्वजाः परां शान्ति अलभन्।

शब्दार्था:- आचरेण व्यवहार से प्रताडितोऽसि दुःखी हो, तथापि तो भी, परार्थे दूसरों के लिए, कदापि कभी भी, खिन्नं करोति दुःखी करता है, प्राप्नोति = प्राप्त करता है, विमातुः = सौतेली माँ, तपसा = तपस्या से, तव = तुम्हारा।।

अनुवाद : यद्यपि तुम विमाता के व्यवहार से दुःखी हो, तो भी तुम दूसरे के हित के लिए कभी भी अमंगल की कामना मत करो। जो पुरुष दूसरों को दुःखी करता है वह उसका फल अवश्य ही पाता है। अतः पुत्र! तुम विमाता के कटु सत्य का पालन करते हुए भगवान नारायण के चरण कमलों की आराधना (पूजा) करो। तपस्या से तुम्हारे पूर्वजों ने परम शान्ति को प्राप्त किया।

मातुरादेशेन ध्रुवः ईश-ध्यानं प्रति प्रेरणां गृहीत्वा तद् राजप्रासादं व्यक्त्वा च वनम् अगच्छत् । वने ध्रुवः घोरतपः अकरोत् । तस्य मन्त्रः आसीत् ‘ओम् नमो भगवते वासुदेवाय’। ध्रुवस्य तपसा प्रसन्नो भूत्वा भगवान् विष्णुः तस्य समक्षं प्रकटीभूतः ईप्सितं वरं प्रादात् च। ध्रुवः स्वर्गलोके अचलं पदं प्राप्तवान् ।

शब्दार्था: – मातुरादेशेन = माता के आदेश से, गृहीत्वा लेकर, राजप्रासादं = राजमहल को, त्यक्त्वा = छोड़कर, भूत्वा = होकर, समक्षं = सामने, ईप्सितं इच्छित, वरं वरदान, प्रादात् = = प्रदान किये।

अनुवाद-माता के आदेश से ध्रुव ने ईश्वर के प्रति ध्यान की प्रेरणा लेकर और उस राजमहल को छोड़कर वन गया। वन में ध्रुव ने घोर तपस्या किया। उसका मन्त्र था- “ओम् नमो भगवते वासुदेवाय” (भगवान वासुदेव को नमस्कार है)। ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उसके समक्ष प्रकट हुए और इच्छित वरदान प्रदान किये। ध्रुव ने स्वर्गलोक में अचल पद को प्राप्त किया।

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