आलसीराम कक्षा 6 हिन्दी

आलसीराम

अंगद उसका नाम था ‘यथा नाम तथा गुण’ वाली कहावत उस पर पूरे सौ पैसे ठीक उतरती थी। जहाँ वह बैठ जाता, फिर उठने का नाम न लेता। न घर की चिंता, न खाने-पीने की बेचारी पत्नी गाँव का – पीसना करके किसी तरह बच्चों का पेट पालती और अपने पति की राह देखा करती। अंगद कभी घर कूटना – ‍ जाता, कभी किसी के चौरे पर ही सोया रहता ।

लोगों को आश्चर्य होता यह देखकर कि गाँव का यह स्वस्थ प्रसन्न युवक इतना आलसी क्यों है ? बात किसी की समझ में न आती। कभी कोई पड़ोसी उसकी पत्नी से कहता कि अब यदि घर आए तो उसे भोजन न देना। कभी उसके लिए दरवाजा बंद रखने की तरकीब की जाती, परंतु अंगद पर उसका भी कुछ असर न होता। न वह जेठ में सूखता और न भादों में हरा होता। किसी ने उसे काम पर बुलाया तो ठीक और न बुलाया तो ठीक । न किसी से रामरमौवल, न किसी से दुश्मनी। बस अंगद अंगद ही था ।

धीरे से एक दिन परऊ ठेठवार ने कहा कि अंगद तो चोर है। कल रात उसकी बाड़ी में कुंदरू चुराने आया था। बात पर किसी को विश्वास नहीं हुआ। अंगद की घरवाली से पूछा गया, तो पता चला कि वह पिछले तीन दिनों से घर नहीं आया। बेचारे ठेठवार की रुसवाई हुई और बस ।

परंतु अब अंगद के पीछे काफी नज़रें लगी होतीं। लोग सोचते कि यह प्रायः घर नहीं जाता। खाने के लिए कभीकभार काम के एवज में कोई कुछ दे देता है, परंतु उतने से ही इस जवान शरीर का पोषण भा कैसे हो सकता है ? परंतु अंगद था कि राग-द्वेष से परे जिए चला जा रहा था। भादों की रात थी। पूर्णमासी थी, परंतु बादलों के कारण धुप अँधियारी छाई हुई थी। कोचरू पटेल अपनी बाड़ी की रखवाली कर रहा था कि सहसा उसे आवाज़ सुनाई पड़ी

खीरा रे, भई खीरा, बड़ सुग्घर रुख हीरा ।

खाँव का दू-चार, खा न गा हजार ।

उसके बाद कुछ खीरे तोड़कर खाए गए और फिर सन्नाटा छा गया। उपर्युक्त कथन का आशय यह था कि ओ खीरे के अनमोल पेड़ ! मैं दो-चार खा लूँ क्या ? (और क्षणिक अंतराल से वही आवाज़ फिर गूंजी कि एक क्या हजार फल खा लो न ।)

सुनकर ‘ कोचरू पटेल दंग रह गया। पहले सोचा कि कहीं भूत-प्रेत न हो बाहर निकलकर ललकारने की हिम्मत न हुई और खीरे खानेवाला खाकर चला गया। प्रातः जब उन्होंने गाँव के लोगों से इस बात की चर्चा की तो किसी ने कहा कि हो न हो सपना देखा होगा। और फिर उस गाँव में तथा आसपास कोई-न कोई ऐसा ही सपना कभी-कभी देखने लगा।

माघ आ गया। कछार में कलिंदर लगाए गए। रखवाली होने लगी। एक रात को महँगू ने अपनी बाड़ी में सुना

कलिंदर रे, भई कलिंदर, पाके हवस ते सुंदर,

खाँव का दू चार खान न गा हजार

(ओ भई कलिंदर, तुम सुंदर हो, पक चुके हो, खा लूँ क्या दो-चार ? एक क्या खाओ न हजार । ) और उसके बाद दो चार कलिंदर तोड़कर भागने की आवाज़। इस घटना ने अंगद को चोर सिद्ध कर दिया। बेचारा ! गाँव में पंचों की बैठक हुई। आखिर इस अंगद को क्या सजा दी जाए ? दिखने में तो यह चोर नहीं दिखता। आखिर पंच साब ने पूछा अंगद से –

“तुमने चोरी की है या नहीं ? “

“मैंने तो पूछकर ही फल तोड़े थे अंगद ने कहा ।

“किससे पूछा था ?”

“पेड़ से अंगद ने कहा।

“पेड़ भी बोलता है क्या?”

अंगद ने इसका कोई जवाब न दिया।

काफी सोच-विचार के बाद अंगद की सजा तय हुई जो गुप्त रखी गई। दूसरे दिन कोचरू पटेल की बाड़ी में गाँव के लोग इकट्ठे हुए। अंगद को एक रस्से से बाँधा गया और आहिस्ते से कुएँ में उतारा गया। जब अंगद पानी की सतह पर पहुँचा तो ऊपर से एक ने आवाज़ दी

कुआँ रे भई कुआँ, तोर नाम ले काँपे रुआँ ।

डुबकनियाँ खवाओं का दू-चार, खवा न गा हजार।

(ओ भई कुआँ, तुम्हारे नाम से ही रोएँ काँप जाते हैं। दो चार डुबकियाँ खवाऊँ क्या ? दो-चार क्या हजार खवाओ न!)

और उसके बाद अंगद को दो-चार डुबकियाँ खिलाई गई और पूछा गया क्यों अंगद अब जी भरा या नहीं? अंगद ने क्षमा-प्रार्थना की। उसे ऊपर लाया गया। लोग खूब हँसे । अंगद चुप । शर्म से उसने सिर नीचा कर लिया।

फिर तो अंगद काम में जुट जुटा स ही गया । पत्नी खुश, बच्चे • खुश और सारा गाँव खुश। परंतु अब भी अंगद ‘आलसीराम’ के नाम से पुकारा जाता, जबकि वह रात-दिन काम में लगा रहता। अंगद को अपने इस नाम की भी परवाह नहीं थी। मानों वह अपने भूतकाल को भूल गया था और जुट गया था स्वर्ग बना में अपने गाँव को, अपनी धरती को ।

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