आदिमानव कक्षा 6 वीं सामाजिक विज्ञान (इतिहास) अध्याय 2

आदिमानव कक्षा 6 वीं सामाजिक विज्ञान

स्मरणीय बिन्दु

1. आदिमानव एक स्थान से दूसरे स्थान तक भोजन की तलाश में घूमते रहते थे, उनका जीवन घुमक्कड़ था। इसलिए इन्हें खानाबदोश कहते हैं

2. पत्थर को पाषाण कहते हैं, क्योंकि इस युग में पत्थरों का प्रयोग किया जाता था, इसलिए इसे पाषाण युग कहते हैं।

3. पाषाण युग के नुकीले व धारदार हथियारों व औजारों को पुरातत्ववेत्ता ‘अश्मोपकरण’ कहते हैं।

4. पाषाण युग लगभग छः हजार वर्षों तक चला। पत्थरों के औजारों के स्वरूपों के आधार पर इस युग को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं- (i) पूर्व पाषाण युग, (ii) मध्य पाषाण युग, (iii) उत्तर पाषाण युग ।

5. उत्तर पाषाण युग में खेती करना प्रारंभ हुआ।

6. आग पैदा करने के लिए जिस पत्थर का उपयोग किया जाता था, उसे चकमक कहते हैं।

रहन सहन


आज से हजारों साल पहले हमारे पूर्वज जंगलों में रहते थे और जंगली कंद-मूल एवं फल, आदि इकट्ठा करके खाते थे। साथ ही वे जानवरों का शिकार करके उनका मांस भी खाते थे। आदिमानव पेड़ों की पत्तियों, छाल तथा जानवरों की खाल से अपने शरीर को ढँकते थे। पुरुष और महिलाएँ आभूषणों का उपयोग करते थे। वे लकड़ी, सीप, शंख, चमकीले पत्थर एवं हड्डी से बने आभूषणों का प्रयोग करते थे। आदिमानवों ने जानवरों का शिकार करने के लिए तीर और भाले भी बनाए. जिनके नोंक पत्थरों के होते थे। वे पशुओं की हड्डियों एवं सींगों से भी हथियार बनाते थे। औजारों का उपयोग आमतौर पर जंगली अनाज इकट्ठा करने, जमीन खोदकर कंद-मूल निकालने तथा जानवरों की खाल उतारने के लिए किया जाता था।

पत्थर का टुकड़ा उनका पहला औजार या हथियार था। छत्तीसगढ़ के वनांचल जैसे बस्तर और सरगुजा में भी कुछ लोगों का जीवन जंगल में शिकार और वनोपज इकट्ठा करने पर आधारित है।

सामूहिक जीवन

आदिमानव छोटे समूह में रहते थे और उनमें आपसी सहयोग की भावना थी। कंद-मूल, फल, अनाज, आदि इकट्ठा करने का काम आमतौर पर महिलाएँ व बच्चे करते थे। पुरुष मिलजुल कर शिकार करते थे। लेकिन कभी-कभी पुरुष और महिलाएँ दोनों शिकार करते थे और कंद-मूल भी इकट्ठा करते थे। इस प्रकार जो कुछ भी उन्हें प्राप्त होता था, उसे सब लोग मिल-बाँट कर खाते थे। किसी भी वस्तु को बचा कर नहीं रखा जाता था। समूह की सभी चीजों पर सबका समान अधिकार था। उनमें कोई अमीर या गरीब नहीं होता था ।

धार्मिक रीति-रिवाज व मान्यताएँ

आदिमानव प्रकृति के बहुत करीब थे और पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि को अपने सगे-संबंधी मानते थे। वे देवताओं में भी विश्वास करते थे। वे मानते थे कि उन्हें खुश करने पर अच्छा शिकार और खाने की अन्य चीजें मिलेंगी। वे अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये समय-समय पर नाच-गान करते थे। इनमें वे जानवरों के शिकार करने का अभिनय करते थे ।

छत्तीसगढ़ में रायगढ़ जिले के कबरा पहाड़ी और सिंघनपुर तथा दुर्ग जिले के चितवाडोंगरी और डौंडीलोहारा की गुफाओं में आदि मानवों के बनाए गए चित्र मिले हैं। ये चित्र रंगीन हैं। इनमें छिपकली, घड़ियाल तथा अन्य पशुओं के चित्र हैं। सिंघनपुर की गुफाओं में गहरे लाल रंग के चित्र हैं।

खेती और पशुपालन की शुरुआत

आज से लगभग दस हज़ार साल पहले जंगल से भोजन इकट्ठा करने वाले इन लोगों के जीवन में काफी बदलाव आने लगा। दुनिया के अलग-अलग भागों में रहने वाले लोग कुछ नए तरह के प्रयोग करने लगे। कहीं वे कुछ जंगली जानवरों को पालतू बनाने लगे तो और कहीं वे तरह-तरह के अनाज और पौधे उगाने लगे। इससे लोगों के जीवन में बदलाव आया।

पालतू जानवर

माना जाता है कि सबसे पहले मनुष्यों ने कुत्तों को पाला । इसके बाद जंगली भेड़, बकरी या गाय आदि जानवरों को भी पाला जाने लगा।

स्थानांतरण खेती या झूम खेती

खेती के लिए पहले कुछ क्षेत्र के जंगलों को जलाकर साफ किया जाता था। फिर उस स्थान पर दो-तीन साल तक लगातार खेती की जाती थी। उसके बाद खेत में पैदावार कम होने लगती थी। फिर उस स्थान को छोड़ कर किसी दूसरे स्थान पर खेती करते थे ।इस किस्म की खेती को स्थानांतरण खेती या झूम खेती कहते हैं। खेती की शुरुआत के कारण इस समय के मनुष्यों के जीवन में काफी बड़ा परिवर्तन आया। इन कारणों से खेती करने वाले लोग स्थाई रुप से अपने खेतों के आस-पास ही घर बनाकर रहने लगे।

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