आदर्श छात्र: कक्षा सातवीं विषय संस्कृत पाठ 9

आदर्श छात्र: कक्षा सातवीं विषय संस्कृत पाठ 9

कृष्णवस्त्रमयं दण्डमंडित, छत्रं दक्षिण हस्ते निधाय अध्यापकः सप्तम्यां कक्षायां प्रविशति, छात्रान् प्रति प्रश्नं करोति ।

अध्यापकः • भो भोः छात्राः ! दक्षिण हस्ते इदं किं विधते ?

छात्रा: – मान्याः गुरुवर्याः! भवतां दक्षिणहस्ते छत्र विराजते ।

अध्यापकः साधु, साधु, साधु इति वारस्त्रमुक्त्वा पुनः छात्रान् प्रति प्रश्नं विदधति, अनेन छत्रेण किं क्रियते ?

छात्रा: – वन्दनीया: गुरुवर्याः । अनेन ग्रीष्म काले आतपात् । वर्षाकालेच जलवर्षणात्, अस्माकं शरीररक्षणं क्रियते।

अध्यापकः- शोभनम्, शोभनं, शोभनं इति वारत्रय- मुक्त्वा अध्यापकः छात्रान् उपदिशति यूयं सर्वेछात्राः जानीयः ? छात्र शब्दः अनेनैव छत्रशब्देन् निष्पन्नो विद्यये छत्रशब्दः आवरण वाचकः । इत्थं न गुरोदोबावरणं छत्रं तच्छील यस्य सः छात्रः इतिछात्र शब्द -स्य सुस्पष्टः अर्थ । यूयं सर्वेऽपि छात्राः भारतस्य आदर्शछात्राः भवेत् । इयं मदीया हार्दिकी शुभकामना । येने विद्यालये, समाजे, राष्ट्रे च सर्वम् अनुशासनं प्राचीना गुरुशिष्य परम्परा, सामाजिक सुव्यवस्था, एकता, अखण्डता, साम्प्रदायिकी सद्भावना मानव मूल्यानि च संरक्षितानिभवेयुः ।

शब्दार्थाः— कृष्ण = काला, हस्ते = हाथ में, निधाय = रखकर, विद्यते = है, छत्रम् = छाता, विदधति = करते हैं, आतपात् = धूप से, शोभनं = उत्तम, इत्थम् = इस प्रकार, यूयं = तुमसब, मदीया = मेरी, भवेयुः = हो, गुरूवर्या:= गुरुदेव, प्राचीना = पुरानी।

अनुवाद— काले वस्त्र से युक्त दण्डछत्र (छाते) को दाहिने हाथ में लेकर शिक्षक कक्षा सातवीं में प्रवेश करता है, छात्रों से प्रश्न करता है।

अध्यापक – हे छात्रों ! मेरे दाहिने हाथ में क्या है ?

छात्रगण – माननीय गुरुदेव ! आपके दाहिनी हाथ में छाता है।

अध्यापक- उत्तम, उत्तम, उत्तम तीन बार कहकर शिक्षक फिर छात्रों से प्रति प्रश्न करते हैं, छाते से क्या करते हैं ? क्या उपयोगिता है।

छात्रगण – वन्दनीय गुरुदेव । ग्रीष्म काल में धूप से, वर्षा काल में वर्षा से, यह हमारे शरीर की रक्षा करता है।

अध्यापक – सुन्दर, सुन्दर, सुन्दर ऐसा तीन बार कहकर, शिक्षक छात्रों को उपदेशित करता है—तुम सभी जानते हो ? ‘छात्र’ शब्द इसी ‘छत्र’ (छाता) शब्द से बना है। छत्र’ शब्द आवरण वाचक है। जो गुरुओं के दोष को ढँक दे-वह छात्र है, यही छात्र शब्द का सुस्पष्ट अर्थ है। तुम सभी छात्र भारत के आदर्श छात्र बनो। यही हार्दिक शुभकामना है। जिससे विद्यालय, समाज, राष्ट्र और सभी अनुशासित बनें। प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा, सामाजिक सु- व्यवस्था, एकता अखण्डता, साम्प्रदायिक सद्भावना और मानवीय मूल्य संरक्षित हों।

छात्राः- पूज्या ! गुरुव: ! आदर्श छात्रेषु के के गुणाः अपेक्षिता: भवन्ति ? तत्प्राप्तयर्थम् अस्माभिः किं किं करणीयम् ?

अध्यापकः :-भो भोः छात्राः ! यूयं सर्वेसावधानाः । छात्राणाममध्ययनं तपः इति आदर्श छात्रस्य मूलभूतो गुणः । अतएव आदर्श छात्रः अध्ययनशीलः भवति । स सच्चरित्रः अनुशासितश्च भवति। स सर्वदा माता पित्रोः गुरोः श्रेष्ठ जनानां च आज्ञा परिपालयति, सामान्य छात्रानाम् अपेक्षया आदर्श छात्रेषु अधिकाः विशिष्टाः गुणाः भवन्ति

आदर्श छात्रः प्रातः समयेनोन्थाय मातापित्रो: चरणौ सादर नमति। शौचा -दिक्रियां समायत ईश्वरस्याशधनं करोति। आदर्श- छात्रः हट्टे पण्यवीथिकायां निष्प्रयोजनं न परिभ्रमति ।

शब्दार्था: – यूयं =तुम सब ,तपः = तपस्या, सच्चरित्रः = सदाचारी, भवति = होता है, सर्वदा = हमेशा, समयेनोत्थाय = समय से उठकर, समायत = मुक्त, हट्टे = बाजार, पण्यवीथिकायां = बाजार के गलियों में, निष्प्रयोजन = बिना काम, परिभ्रमति = घूमता है।

अनुवाद-

छात्रगण – पूज्य गुरुदेव आदर्श छात्रों में कौन-कौन से गुण अपेक्षित हैं? उसकी प्राप्ति के लिए हमें क्या-क्या करना चाहिए ?

अध्यापक – हे छात्रों! तुम सब सावधान हो जाओ। छात्रों के लिए अध्ययन तप है-यह आदर्श छात्र का प्रमुख लक्षण, (गुण) है। इसलिए आदर्श छात्र अध्ययन के प्रति प्रत्यनशील होता है। वह सदाचारी और अनुशासित होता है। वह सदैव माता- पिता, गुरुजनों और श्रेष्ठजनों की आज्ञाओं का पालन करता है, सामान्य छात्रों की अपेक्षा आदर्श छात्रों में विशिष्ट गुण अधिक होते हैं। आदर्श छात्र प्रातः उठकर माता-पिता को आदर पूर्वक प्रणाम करते हैं। शौच आदि क्रियाओं से मुक्त हो, ईश्वर की उपासना (पूजा) करते हैं। आदर्श छात्र बाजार की गलियों में बिना काम के नहीं घूमते हैं।

अथ च यथोपलब्धम् आहारं विधाय अध्ययनोपकणानि पुस्तकादीनि च नीत्वा यथा समयं विद्यालयं गच्छति। स न केवल पाठाभ्यासं करोति, अपितु निखिलमपि सामाजिक कार्य परिश्रमेण सम्पादयति । विद्यालये स गुरुजनान् सादरं सश्रद्धं सविनयं च अभिवादयति, सहपाठिनः मित्राणि च नमस्करोति । प्रार्थना प्रसंगे, अध्ययने, सांस्कृतिक कार्यक्रमे क्रीडासु, सर्वेषु विद्यालयीन कार्य कलापेणु सोत्साहं प्रतिभागं करोति ।

विनम्रता सहिष्णुता, कर्तव्यपरायणता, अनुशासन प्रियताः सत्यनिष्ठा – गुणग्राहिता, विश्वबन्धुत्वादयः आदर्श छात्रस्य विशिष्टाः गुणा भवन्ति । इदानीं छात्रेषु आदर्श गुणानाम् अभावः दृश्यते । युष्माभिः सर्वे: आदर्श छात्राणाम् आदर्शगुणाः अनुकरणीयाः अनुसरणीयाश्च ।

शब्दार्थाः -यथा = जिस प्रकार, आहारं = भोजन, नीत्वा= लेकर, निखिलम् = सम्पूर्ण, प्रतिभागं = सहयोग, अभाव: कमी, सर्वे = सभी, अनुकरणीयाः= अनुकरण करने योग्य, अनुसरणीयाः = अनुसरण करने योग्य।

अनुवाद -और जिस प्रकार का भोजन उपलब्ध हो ग्रहण कर अध्ययन सामग्री व पुस्तक लेकर समुचित समय में विद्यालय जाता है। वह न केवल पाठ का अभ्यास (गृहकार्य ) करता है बल्कि सामाजिक कार्यों को भी श्रमपूर्वक सम्पन्न करता है। विद्यालय में वह गुरुजनों का श्रद्धा व विनम्रतापूर्वक अभिवादन करता है, सहपाठियों व मित्रों को नमस्कार करता है। प्रार्थना, अध्ययन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों खेल आदि सभी विद्यालयीन क्रियाकलापों में उत्साहपूर्वक सहयोग करता है।

विनम्रता, सहिष्णुता, कर्तव्यपरायणता, अनुशासनप्रियता, सत्य निष्ठा, गुणग्राहिता (दूसरों के गुणों को ग्रहण करने वाला) विश्वबन्धुत्व आदि आदर्श छात्र के विशिष्ट गुण हैं। आज के छात्रों में इन गुणों का अभाव दिखता है। तुम्हें भी आदर्श छात्रों के गुणों का अनुकरण और अनुसरण करना चाहिए।

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